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राजेश निषाद बनाये गये जननायक जनता पार्टी के पंचकूला हल्का अध्यक्ष ।

पंचकूला, 4 नवंबर (Ishantimes): जननायक जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने पंचकूला नगर निगम के वार्ड नंबर 9 के पार्षद राजेश कुमार निषाद को पंचकूला हल्के का अध्यक्ष नियुक्त किया है। उल्लेखनीय है कि जजपा लगातार अपने संघठन में कुछ बदलाव के साथ विस्तार कर रही है इसी कड़ी में अपने मोजूदा हल्का प्रधान सोहन लाल गुर्जर को पार्टी के किसान प्रकोष्ठ का प्रदेश सचिव नियुक्त किया है तथा जिले में संगठन की ज्यादा मजबूती के लिए पंचकूला के प्रमुख एवं प्रखर जजपा नेता एवं जिले में रहने वाले हज़ारों पूर्वांचल के लोगों में विशेष रूप से लोकप्रिय राजेश निषाद को पंचकूला हल्के की कमान सौंपी है। राजेश निषाद ने हल्का अध्यक्ष बनाये जाने पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अजय सिंह चौटाला, पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं पार्टी के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दुष्यंत चौटाला, पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष बृज शर्मा, पंचकूला जिला अध्यक्ष ओ पी सिहाग तथा शीर्ष नेतृत्व का धन्यवाद किया।नवनियुक्त हल्का अध्यक्ष ने शीर्ष नेतृत्व को विश्वास दिलाया कि वो पार्टी को पंचकूला में आगे ले जाने के लिए अपनी तरफ से कोई कोर- कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। वो सबको साथ लेकर दिन रात संगठन की मजबूती के लिए काम करेंगे।

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राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने गुरुग्राम में “इंटरनेशनल रिलेशंस” पुस्तक का द्वितीय संस्करण किया लॉन्च

21वीं सदी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण: राज्यपाल गुरुग्राम, 4 नवंबर (Sanjay Rai): हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने मंगलवार को गुरुग्राम स्थित साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर आधारित पुस्तक “इंटरनेशनल रिलेशंस – सिविल सेवा एवं राज्य सेवा परीक्षाओं हेतु” के दूसरे संस्करण का विमोचन किया। कार्यक्रम में भारत सरकार के पूर्व विदेश मंत्रालय सचिव दामु रवि विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस पुस्तक के लेखक हैं स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी हरियाणा के कुलपति प्रो. अशोक कुमार और गुरुग्राम के डीसीपी ट्रैफिक डॉ. राजेश मोहन। विमोचन से पहले राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि 21वीं सदी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। उन्होंने बताया कि भौगोलिक सीमाओं के बावजूद आज की दुनिया अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, संचार और पर्यावरण के स्तर पर आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब किसी भी देश तक सीमित नहीं रह गए हैं। राज्यपाल ने पुस्तक को केवल एक शैक्षणिक मार्गदर्शिका नहीं बताया, बल्कि इसे जीवन दृष्टिकोण और नेतृत्व कौशल विकसित करने वाली कृति कहा। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक युवाओं को विवेकशील सोच, विचारशीलता और राष्ट्र सेवा के भाव से प्रेरित करेगी। प्रो. घोष ने आगे कहा कि पुस्तक में अनुभवसंपन्न प्रशासनिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों की ज्ञान संपदा निहित है, जो विद्यार्थियों और नीति निर्माताओं के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगी। विशिष्ट अतिथि दामु रवि ने पुस्तक के नवीनतम संस्करण की सराहना करते हुए इसे समसामयिक और अत्यंत उपयोगी बताया। उन्होंने कहा कि इसमें भारत की विदेश नीति में आए नए बदलाव और वैश्विक घटनाक्रमों का समावेश किया गया है। यह न केवल सिविल सेवा अभ्यर्थियों, बल्कि नीति निर्माता, शोधकर्ता और आम पाठकों के लिए भी लाभकारी होगी। पुस्तक के सह लेखक प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि पुस्तक भारत की विदेश नीति, इंडो-पैसिफिक रणनीति, क्वाड सहयोग, कोविड संकट में मानवीय नेतृत्व और बहुपक्षीय मंचों जैसे जी-20 और ब्रिक्स पर भारत के बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण करती है। वहीं, डॉ. राजेश मोहन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंध अब केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि डिजिटल युग में यह निरंतर बदलती प्रक्रिया बन गई है। विमोचन समारोह में राज्यपाल की धर्मपत्नी श्रीमती मित्रा घोष, हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान के महानिदेशक मनोज यादव, साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय की प्रोवोस्ट प्रोफेसर एलायस फिलिप्स, गुरुग्राम विश्वविद्यालय के वीसी डॉ. संजय कौशिक, मैकग्रा हिल एजुकेशन के प्रोडक्ट डायरेक्टर तनवीर अहमद, एसडीएम बादशाहपुर संजीव सिंगला, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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गांधी कैम्प क्षेत्र में नगर निगम की सख्त कार्रवाई – डेयरी सील कर पशु लिए गए कब्जे में

डेयरी काम्पलैक्स में प्लाट आवंटित होने के बावजूद डेयरी सिफ्ट नहीं करने वालों के खिलाफ निगम आयुक्त आनंद शर्मा का एक्शन रोहतक (ईशान टाइम्स )। रोहतक नगर निगम आयुक्त डा0 आनंद कुमार शर्मा ने बताया कि गांधी कैम्प क्षेत्र में नगर निगम की सख्त कार्रवाई करते हुए एक डेयरी को सील किया गया तथा छोटे व बड़े 6 पशुओ को कब्जे में लिया गया। पूर्व में डयेरी संचालक को डेयरी सीलिंग के नोटिस जारी किए जा चुके थे तथा गंदगी फैलाने व गोबर बहाने के कारण सीवर ऑवरफलो होने की बार-बार शिकायते प्राप्त हो रही थी। वार्ड के निरीक्षण के दौरान भी वहां के नागरिको द्वारा डयेरी की शिकायत की थी। वर्तमान में भी डेयरी काम्पलैक्स में बहुत डेयरियां संचालित है, परन्तु कुछ डेयरी संचालक अपनी डेयरियों को स्थानांतरित नहीं कर रहे है। जिससे आस-पास के नागरिकों को दुर्गंध, गंदगी और जलभराव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। निगम द्वारा डेयरी काम्लैक्स में डेयरी संचालको को सुविधा हेतु आवश्यक सुविधाएं जैसे कि जल व्यवस्था, अपशिष्ट जल निकासी प्रणाली, पशुओं के लिए उचित स्थान, गलियां, चारा मण्डी, लाईट इत्यादि की समुचित व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है तथा वहां पर विकास कार्य करवाये जा रहे है।नगर निगम आयुक्त डा0 आनंद कुमार शर्मा ने कहा कि नगर निगम उन डेयरी संचालको पर विशेष सख्ती रहेगी जिनको कन्हेली डेयरी काम्पलैक्स में प्लाट आवंटित है परन्तु डेयरी संचालको द्वारा डेयरियो को कन्हेली डेयरी काम्पलैक्स में शिफ्ट नहीं किया गया है। वे तुरंत अपनी डेयरी को डेयरी काम्पलैक्स में शिफ्ट करने के लिए कार्य आरंभ करें अन्यथा नगर निगम द्वारा उनकी शहर में चल रही डेयरी को सील किया जायेगा। जिसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगें।

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बीजेपी सरकार बजाय किसानों की सुध लेने के बिहार चुनावों में है व्यस्त: चौधरी अभय सिंह चौटाला

किसानों की आवाज बुलंद करने के लिए सोमवार को प्रदेश के सभी 22 जिलों में इनेलो नेताओं की अगुवाई में विरोध प्रदर्शन किए गए, उपायुक्तों को गवर्नर के नाम सौंपे ज्ञापन इनेलो के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अभय सिंह चौटाला ने रोहतक, इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष रामपाल माजरा ने जींद एवं कैथल में किया जोरदार प्रदर्शन बीजेपी सरकार ने प्रदेश के अन्नदाता को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है: रामपाल माजरा चंडीगढ़, 3 नवंबर(संजय राय)। प्रदेश के कई जिलों में हजारों एकड़ में जलभराव के पानी की निकासी न होने, सरकार द्वारा अभी तक बर्बाद हुई फसलों की विशेष गिरदावरी न करवाने, बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा न देने, मंडियों में धान और बाजरे की फसल को एमएसपी से कम दामों में खरीद कर किसानों को लूटने, खाद की किल्लत कर कालाबाजारी करने और हजारों करोड़ रूपए के किए जा रहे धान घोटाले के विरोध में सोमवार को प्रदेश के सभी 22 जिलों में इनेलो नेताओं की अगुवाई में विरोध प्रदर्शन किए गए। इनेलो के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अभय सिंह चौटाला ने रोहतक, इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष रामपाल माजरा ने जींद एवं कैथल, वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शेर सिंह बडशामी ने कुरूक्षेत्र, राष्ट्रीय प्रधान महासचिव प्रकाश भारती ने अंबाला, संगठन सचिव उमेद लोहान न हिसार, डबवाली से विधायक अदित्य देवीलाल ने सिरसा, प्रदेश महिला प्रभारी सुनैना चौटाला ने फतेहाबाद में धरने प्रदर्शन की अगुवाई की।चौधरी अभय सिंह चौटाला ने कहा कि भारी बारिश की वजह से पूरे प्रदेश में किसान की फसल बर्बाद हुई। लगातार प्रदेश की बीजेपी सरकार से आग्रह किया कि किसान के खेतों में खड़ा पानी निकाले और किसानों को बर्बाद हुई फसल का प्रति एकड़ 50 हजार रूपए मुआवजा दिया जाए ताकि किसान अपनी अगली फसल की बुआई कर सके। प्रदेश की बीजेपी सरकार ने बजाय किसानों की सुध लेने के बिहार चुनावों में व्यस्त हो गई। जहां आज प्रदेश का किसान दुखी और परेशान है वहीं बीजेपी सरकार जश्न मनाने में व्यस्त है। किसानों की आवाज बुलंद करने के लिए इनेलो पार्टी आज सभी 22 जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर रही है और उपायुक्त को गवर्नर के नाम पर ज्ञापन सौंपे हैं। अभय सिंह ने कहा कि सरकार को एक हफ्ते का समय दिया है ताकि सरकार जलभराव के पानी की निकासी, बर्बाद हुई फसलों का 50 हजार रूपए प्रति एकड़ मुआवजा, मंडियों में धान और बाजरे की फसल जो कम दामों पर खरीदी गई है उसकी भरपाई करने जैसी मांगों को माने अन्यथा हमारी पार्टी और भी कड़े कदम उठाएगी।जींद में इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष रामपाल माजरा की अगुवाई में जोरदार प्रदर्शन किया गया। रामपाल माजरा ने कहा कि बीजेपी सरकार ने प्रदेश के अन्नदाता को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। बीजेपी सरकार की कुनीतियों के कारण किसान कर्जे में डूब चुके हैं। यह हरियाणा की विडंबना है कि प्रदेश में किसान और मजदूर विरोधी सरकार बनी है। सरकार तुरंत किसानों खेतों में खड़ा पानी निकाले और खराब हुई फसल का मुआवजा दे।सिरसा में इनेलो के विधायक अदित्य देवीलाल ने मोर्चा संभालते हुए बीजेपी सरकार को चेताया कि किसानों की अनदेखी बहुत महंगी पड़ेगी। प्रदेश के किसान और मजदूर बीजेपी की सरकार को हरियाणा से चलता करेंगे और किसान मजदूर हितैषी इनेलो की सरकार बनाएंगे।इनेलो के संगठन सचिव उमेद लोहान ने हिसार में प्रदर्शन की अगुवाई की और कहा कि बीजेपी सरकार में किसान आज खून के आंसू रो रहा है।इनेलो की महिला प्रदेश प्रभारी सुनैना चौटाला ने फतेहाबाद में कहा कि बीजेपी सरकार में किसान, मजदूर समेत सभी वर्ग बेहद दुखी और परेशान है।

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पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग पहुंचे भाजपा नेता, ममता सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

–चुनाव सह प्रभारी बिप्लब कुमार देब, अमित मालवीय, समिक भट्टाचार्य आदि नेताओं ने चुनाव के दौरान अन्य राज्यों के मुकाबले अतिरिक्त सुरक्षा उपाय करने की मांग भी की नई दिल्ली, 3 नवंबर, 2025(ईशान टाइम्स)।पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के संबंध में सोमवार को भारतीय जनता पार्टी का एक पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में चुनाव आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त से मिलने पहुंचा। पश्चिम बंगाल के चुनाव सह प्रभारी एवं त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब, पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिट भट्टाचार्य, भाजपा आईटी एवं सोशल मीडिया विभाग के राष्ट्रीय संयोजक अमित मालवीय, शांतनु ठाकुर आदि नेताओं ने पांच पन्नों का पत्र चुनाव आयोग को सौंपा।एसआईआर के संबंध में चुनाव आयुक्त से मिलने के बाद बिप्लब देब, अमित मालवीय और समिट भट्टाचार्य ने पत्रकारों को बताया कि क्यों पश्चिम बंगाल में एसआईआर की आवश्यकता है।चुनाव आयोग को सौंपे पत्र मेंभाजपा की तरफ से कहा गया कि हम आयोग के ध्यान में लाना चाहते हैं कि निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से संबंधित कुछ गंभीर मुद्दे सामने आए हैं। सबसे पहले, हम यह स्वीकार करते हैं कि SIR प्रक्रिया मतदाता सूचियों की पवित्रता और शुद्धता सुनिश्चित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। मतदान न केवल एक संवैधानिक अधिकार है, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की नींव भी है। तथापि, यह हमारे संज्ञान में आया है कि वर्तमान पश्चिम बंगाल की परिस्थिति में मतदाता पंजीकरण हेतु उपयोग किए जा रहे दस्तावेजों के निर्गमन और प्रमाणीकरण में गंभीर अनियमितताएँ देखी जा रही हैं।राज्य की जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति और दस्तावेज़ी तंत्र में व्यापक हेरफेर को देखते हुए, यह आवश्यक है कि SIR प्रक्रिया अत्यधिक सावधानी, निष्पक्षता और सत्यापन के साथ की जाए। भाजपा ने चुनाव आयोग को बंगाल की परिस्थितियां बताते हुए कुछ सुझाव भी दिए हैं।भाजपा की तरफ से कहा गया है कि बिहार में SIR के अंतर्गत पंजीकरण के लिए 11 विशिष्ट दस्तावेजों को स्वीकार्य प्रमाण के रूप में पहचाना गया है। किंतु पश्चिम बंगाल की जमीनी वास्तविकताएँ भिन्न हैं। राज्य में व्यापक पैमाने पर पुराने दिनांक के और जाली दस्तावेजों का निर्गमन हुआ है, विशेष रूप से ‘दुआरे सरकार’ जैसी सरकारी योजनाओं के माध्यम से, जो नागरिक कल्याण के नाम पर वास्तव में सीमापार से आए अवैध प्रवासियों को दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए उपयोग की गई हैं। अनेक क्षेत्रीय रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि 2020 से अब तक इन अभियानों के तहत प्रमाणपत्रों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है। इन दस्तावेजों का उपयोग नागरिकता और निवास के झूठे प्रमाण के रूप में किया जा रहा है, जिससे SIR प्रक्रिया का मूल उद्देश्य वास्तविक नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना विफल हो रहा है।अतः हम आयोग से अनुरोध करते हैं कि पश्चिम बंगाल की स्थिति को एक विशेष मामला मानते हुए अन्य राज्यों की तुलना में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए जाएँ।भाजपा की तरफ से कहा गया कि जन्म प्रमाणपत्रों को स्वीकृत दस्तावेज़ के रूप में मान्यता मिलने के बाद पूरे राज्य में विलंबित पंजीकरणों में अचानक वृद्धि हुई है। अनेक मामलों में स्थानीय अधिकारियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मिलीभगत से पुराने दिनांक के प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। कई बार लोग पुलिस स्टेशन में झूठे सामान्य डायरी प्रविष्टियाँ करवाकर “डुप्लिकेट” प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेते हैं। वर्तमान में ऐसे प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए कोई प्रभावी तंत्र उपलब्ध नहीं है, जिससे दुरुपयोग बढ़ा है।भाजपा ने सुझाव दिया है कि 24 जून 2025 के बाद जारी जन्म प्रमाणपत्र SIR प्रक्रिया के लिए स्वीकार न किए जाएँ। यदि आवश्यक हो, तो इन्हें बूथ स्तर अधिकारी (BLO) द्वारा मामले-दर-मामले सत्यापित किया जाए।स्थाई निवास प्रमाणपत्र स्थानीय अधिकारियों द्वारा राजनीतिक नियंत्रण में अंधाधुंध जारी किए जा रहे हैं। कई मामलों में ये केवल आधार या EPIC कार्ड पर आधारित हैं, जिनकी प्रामाणिकता पर ही प्रश्नचिह्न है, इसलिए केवल समूह-ए अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र ही स्वीकार किए जाएँ। प्रत्येक प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता और निवास की पुष्टि जारीकर्ता प्राधिकारी से कराई जाए।वन अधिकार प्रमाणपत्र में 2 अप्रैल 2025 को वन सचिव की अनियमित नियुक्ति के बाद से इन प्रमाणपत्रों के निर्गमन में हेरफेर बढ़ा है, इसलिएकेवल 2 अप्रैल 2025 से पहले जारी प्रमाणपत्र ही वैध माने जाएँ। इसके बाद जारी प्रमाणपत्र तभी स्वीकार हों जब सक्षम अधिकारी द्वारा नियमों के अनुसार प्रमाणित किए गए हों।‘दुआरे सरकार’ शिविरों में बिना क्षेत्रीय जांच के बड़ी संख्या में जाति प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। अनेक प्रमाणपत्र केवल शपथ पत्रों के आधार पर जारी किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को बड़ी संख्या में OBC-A प्रमाणपत्र दिए गए हैं, जिनमें से कई के अवैध प्रवासी होने के आरोप हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पहले ही OBC-A श्रेणी को अवैध घोषित किया है और मामला न्यायालय में लंबित है, इसलिए बिना जांच जारी प्रमाणपत्र स्वीकार न किए जाएँ।भाजपा नेताओं द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में मांग की गई है कि 2011 से 2024 के बीच जारी OBC-A प्रमाणपत्रों को अंतिम न्यायिक निर्णय तक स्वीकार्य दस्तावेज़ों से बाहर रखा जाए।भाजपा ने आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल में परिवार रजिस्टर व्यवस्थित रूप से तैयार नहीं किए गए हैं। आशंका है कि अवैध नाम जोड़ने हेतु बाद में नकली रजिस्टर तैयार किए जा रहे हैं। मनरेगा के अंतर्गत तैयार रजिस्टर विशेष रूप से अविश्वसनीय हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने अनियमितताओं के कारण राज्य की निधि निलंबित कर दी थी, इसलिए 24 जून 2025 के बाद तैयार परिवार रजिस्टर और सभी मनरेगा रजिस्टर SIR हेतु अमान्य माने जाएँ।भाजपा ने आगे लिखा है कि पश्चिम बंगाल राज्य सरकार ने (17 दिसंबर 2024) और भूमि पट्टा वितरण जैसी योजनाएँ शुरू कीं, जो लाखों लोगों को कवर करती हैं। ये योजनाएँ प्रधानमंत्री आवास योजना के केंद्रीय धन बंद होने के बाद चलाई गईं। आशंका है कि ये प्रमाणपत्र निवास और नागरिकता के झूठे प्रमाण के रूप में उपयोग हो रहे हैं, इसलिए योजना के अंतर्गत जारी सभी प्रमाणपत्र अस्वीकार किए जाएँ। भूमि पट्टे केवल 24 जून 2025 से पूर्व जारी किए गए हों तो ही स्वीकार हों।भाजपा ने मांग की है कि 1.1.2002 के बाद जारी सभी प्रमाणपत्रों (जन्म, निवास, जाति, वन अधिकार आदि) का डेटाबेस जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तैयार कर मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सत्यापन हेतु भेजा जाए। आयोग उन अधिकारियों की

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मोकामा हत्याकांड में अनंत सिंह की गिरफ्तारी, एनडीए को बड़ा झटका

मोकामा हत्याकांड में अनंत सिंह की गिरफ्तारी, एनडीए को बड़ा झटका; सीआईडी जांच तेज, विपक्ष ने लगाए ‘जंगलराज’ के आरोप बिहार। पटना विधानसभा चुनाव के बीच मोकामा सीट पर सियासी तापमान अचानक चरम पर पहुंच गया है। पटना पुलिस की विशेष टीम ने शनिवार (1 नवंबर) देर रात बाढ़ के कारगिल मार्केट में छापेमारी कर पूर्व विधायक और एनडीए समर्थित जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह को दुलारचंद यादव हत्याकांड के मामले में गिरफ्तार कर लिया। एसएसपी कार्तिकेय शर्मा के नेतृत्व वाली टीम ने अनंत सिंह को उनके दो सहयोगियों—रंजीत सिंह और मणिकांत ठाकुर—के साथ हिरासत में लिया और उन्हें तुरंत पटना ले जाया गया। गिरफ्तारी की इस कार्रवाई ने न केवल मोकामा में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि पूरे बिहार की चुनावी राजनीति को हिला कर रख दिया है।यह घटना 30 अक्टूबर को मोकामा के टाल इलाके में हुई हिंसक झड़प से जुड़ी है, जहां जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह और जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पियूष प्रियदर्शी के समर्थकों के बीच पथराव और गोलीबारी हुई थी। इसी दौरान 75 वर्षीय स्थानीय निवासी दुलारचंद यादव की मौत हो गई। दुलारचंद के पोते की शिकायत पर भदौर थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 110/25 में अनंत सिंह को मुख्य आरोपी बनाया गया है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि अनंत सिंह के समर्थकों ने पहले फायरिंग की और फिर गाड़ी चढ़ाकर हत्या की। दूसरी ओर, अनंत सिंह ने भी पियूष प्रियदर्शी सहित पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है, जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए हमले का शिकार होने का दावा किया है। एसएसपी शर्मा ने रविवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए कहा, “यह कार्रवाई खुफिया सूचनाओं के आधार पर की गई। अनंत सिंह सरेंडर करने वाले थे, लेकिन हमारी टीम ने पहले ही उन्हें हिरासत में ले लिया। जांच में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।” उन्होंने बताया कि घटनास्थल से बरामद पत्थरों का फोरेंसिक परीक्षण कराया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए बिहार सरकार ने जांच सीआईडी को सौंप दी है, जबकि चुनाव आयोग ने तत्काल रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने मोकामा के घोसवारी और भदौर थाना प्रभारी समेत कई अधिकारियों को निलंबित और स्थानांतरित कर दिया है। गिरफ्तारी के तुरंत बाद विपक्ष ने सरकार पर हमला बोल दिया। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने इसे “जंगलराज की वापसी” करार देते हुए कहा कि सत्ताधारी दल का प्रत्याशी खुद हिंसा का आरोपी है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है। जन सुराज पार्टी के पियूष प्रियदर्शी ने गिरफ्तारी का स्वागत तो किया, लेकिन पुलिस की देरी पर सवाल उठाते हुए कहा, “दुलारचंद की मौत के बाद ही कार्रवाई क्यों? यह साजिश का हिस्सा लगता है।” वहीं, जेडीयू ने अनंत सिंह को “राजनीतिक साजिश का शिकार” बताया और कहा कि वे कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।नमोकामा सीट पर भूमिहार-यादव जातीय समीकरण पहले से ही संवेदनशील हैं। अनंत सिंह की गिरफ्तारी से एनडीए को बड़ा नुकसान हो सकता है, खासकर जब 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि पूरे पटना जिले की 14 सीटों पर असर डालेगी। रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पटना रोड शो से पहले हुई यह गिरफ्तारी एनडीए की छवि को और धूमिल कर सकती है। मोकामा में रविवार सुबह से ही सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। दुकानें बंद हैं और भारी पुलिस बल तैनात है। घटना के बाद से इलाके में तनाव बना हुआ है, और अंतिम संस्कार के दौरान भी पथराव की घटनाएं हुई थीं। पुलिस ने अपील की है कि शांति बनाए रखें, अन्यथा सख्त कार्रवाई होगी। यह गिरफ्तारी बिहार चुनाव 2025 के लिए एक नया मोड़ ला सकती है, जहां 243 सीटों पर 14 नवंबर को मतगणना होनी है। क्या यह एनडीए की हार का संकेत है या विपक्ष की रणनीति का हिस्सा। आने वाले दिनों में सियासी घमासान और तेज होने की पूरी संभावना है।

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मुंबई की सड़कों का ‘खूनी’ खेल! एक चालक की ‘कराह’, शहर की ‘नींद’ टूटी!

मुंबई। वो सुबह की चहल-पहल, जहां हॉर्न की ध्वनि और इंजनों की गर्जना एक साथ मिलकर शहर की धड़कन बनाती है। ठाणे के उत्सव होटल के ठीक सामने, कैडबरी ब्रिज के निकास पर, नासिक की ओर जाने वाले चैनल पर, अचानक सब कुछ थम सा गया। अशोक लेलैंड का वो विशाल कंटेनर, नंबर डीडी 01 एम 9905, जो कलंबोली से गुजरात की ओर लदा हुआ था, अचानक डगमगा गया। चालक श्री कामता पाल ने स्टीयरिंग पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन नियति ने कुछ और लिखा था। वाहन डिवाइडर से टकराया, धातु की चीखें गूंजीं, और सड़क पर खून की लकीरें खिंच गईं। मालिक श्री रमेश पांडे का ये ट्रक, जो रोजाना सैकड़ों किलोमीटर निगलता है, आज खुद निगला गया।कामता पाल, उम्र महज 50 साल। एक आम चालक, जिसकी जिंदगी ट्रक की सीट और सड़क की धूल में कैद है। परिवार का सहारा, सपनों का बोझ ढोता हुआ। सिर पर गहरी चोट, खून से लथपथ शरीर। घटनास्थल पर पहुंची राबोडी पुलिस की टीम, हाइड्रा मशीन लिए यातायात पुलिस के जवान, आपदा प्रबंधन के कर्मी और अग्निशमन दल के बहादुर – सब ने मिलकर उसे बाहर निकाला। सिविल अस्पताल की एम्बुलेंस में ले जाया गया, जहां डॉक्टरों की लड़ाई शुरू हुई। लेकिन वो दर्द! वो कराह जो ट्रक की टक्कर में नहीं, दिल में उतर गई। कामता की आंखों में क्या था! डर! पछतावा! या बस थकान भरी जिंदगी का अंतिम सवाल – क्यों! मुंबई से नासिक जाने वाला मार्ग धीमा पड़ गया, गाड़ियां रेंगती रहीं, लोग बेचैन। कोई ऑफिस जा रहा था, कोई घर लौट रहा, कोई सपनों की तलाश में। लेकिन सड़क ने सबको रोक लिया। वो डिवाइडर, जो सुरक्षा का प्रतीक है, आज खून से सना। क्या ये सिर्फ एक दुर्घटना थी, या हमारी लापरवाही की कहानी! सोचिए, कामता जैसे हजारों चालक रोज सड़कों पर दांव पर लगाते हैं। नींद की कमी, खराब सड़कें, ओवरलोडिंग – ये सब मौत का न्योता। पुलिस और बचाव दल ने तुरंत काम किया, यातायात बहाल किया, लेकिन वो घाव! वो सिर की चोट जो कामता को अस्पताल पहुंचा गई, वो परिवार की चिंता जो घर में बैठी रो रही होगी। शहर की रफ्तार में हम भूल जाते हैं इन चेहरों को। ट्रक नहीं, इंसान ढोते हैं ये लोग। गुजरात का माल, कलंबोली का बोझ – सब कुछ रुक गया एक पल में। ये दर्द सिर्फ कामता का नहीं, हम सबका है। सड़कें जो जोड़ती हैं, कभी-कभी तोड़ भी देती हैं। काश, हम जागें। काश, सुरक्षा के नियम सख्त हों, चालकों की नींद पूरी हो, सड़कें मजबूत बनें। कामता जल्दी ठीक हो, ये दुआ है। लेकिन अगली दुर्घटना! वो कब रुकेगी? शहर की नींद टूटी है आज, शायद अब जागने का वक्त है। वरना, हर मोड़ पर ऐसी कराह गूंजती रहेगी।

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बच्ची’ के साथ ‘दुष्कर्म’! बच्ची की चीख ने पूरे गांव को हिला दिया!

नौ साल की अनूसूचित जाति की ‘बच्ची’ के साथ ‘दुष्कर्म’! बच्ची की चीख ने पूरे गांव को हिला दिया! उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में, मगोर्रा थाना क्षेत्र के एक छोटे से गांव में, जहां मंदिर की घंटियां शांति की ध्वनि देती हैं, वहां एक नौ साल की अनूसूचित जाति की बच्ची की चीख ने पूरे गांव को हिला दिया। शनिवार की दोपहर, साढ़े तीन बजे, जब बच्ची खेलते-खेलते मंदिर के पास पहुंची, तो कुछ दरिंदों ने उसे कमरे में खींचकर सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दे दिया। खून से लथपथ बच्ची की पुकार पर ग्रामीण पहुंचे, पुलिस आई, अस्पताल में भर्ती किया गया। सीसीटीवी में तीन संदिग्ध दिखे, गांव में तनाव, पुलिस बल तैनात। लेकिन ये सिर्फ एक खबर नहीं, ये हमारे समाज की उस काली सच्चाई का आईना है, जो हर बार मासूमों की लाश पर लिखी जाती है। कल्पना कीजिए, एक नन्ही बच्ची, जो अभी दुनिया की रंगीनियां सीख रही है, खेल रही है, हंस रही है। मंदिर – वह पवित्र स्थान जहां लोग पूजा करते हैं, देवताओं से मांगते हैं – वही जगह बन गई अपराध की गवाह। तीन युवक, शायद गांव के ही, या आसपास के, जिन्होंने इंसानियत को ताक पर रखकर एक बच्ची की जिंदगी को हमेशा के लिए दागदार कर दिया। बच्ची चीखी, लेकिन उसकी चीख सिर्फ उस कमरे तक नहीं रुकी; वो पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर रही है। क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि मंदिर के पास भी सुरक्षा नहीं? क्या बचपन अब सिर्फ किताबों में बचा है। ये घटना जाति की उस पुरानी जंजीर को भी उजागर करती है। अनूसूचित जाति की बच्ची – ये शब्द ही दर्द देते हैं। हमारे समाज में दलित बच्चियां अक्सर दोहरी मार झेलती हैं: गरीबी और जातिगत भेदभाव। अपराधी शायद इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं। निर्भया के बाद हाथरस, कठुआ, उन्नाव, और अब मथुरा। हर बार वही कहानी: गरीब, दलित, बच्ची। हर बार वही आक्रोश, वही तनाव, वही पुलिस की तलाश। लेकिन कितने अपराधी पकड़े जाते हैं? कितनी बार न्याय मिलता है। एसपी कहते हैं, “जल्द गिरफ्तार करेंगे।” लेकिन जल्द कितना जल्द। बच्ची की जिंदगी तो पहले ही बर्बाद हो चुकी। ये सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, पूरे समाज का कलंक है। हम मंदिर बनाते हैं, पूजा करते हैं, लेकिन इंसानियत को मारते हैं। गांव के ग्रामीण आरोपियों की तलाश में जुटे हैं – ये अच्छी बात है, लेकिन क्यों हमें हर बार सड़क पर उतरना पड़ता है? क्यों स्कूलों में, घरों में, गांवों में बच्चों को सुरक्षा की शिक्षा नहीं दी जाती? क्यों सीसीटीवी सिर्फ घटना के बाद काम आते हैं? क्यों लड़कियों को “सावधान रहो” कहा जाता है, न कि लड़कों को “इंसान बनो”। समाज के रूप में हमें सोचना होगा। माता-पिता, शिक्षक, नेता – सब जिम्मेदार हैं। बच्चों को सुरक्षित खेलने का हक दो। जाति के नाम पर भेदभाव खत्म करो। कानून सख्त बनाओ, लेकिन लागू भी करो। फास्ट-ट्रैक कोर्ट, कड़ी सजा, और सबसे जरूरी – नैतिक शिक्षा। अपराधी इंसान नहीं, राक्षस होते हैं, लेकिन उन्हें राक्षस बनाने वाला हमारा समाज है। अगर हम चुप रहे, तो अगली बच्ची कौन। उस नन्ही बच्ची की चीख हमें जगाए। अस्पताल के बिस्तर पर वो लड़ रही है जिंदगी की जंग। हमारी प्रार्थना उसके साथ है, लेकिन प्रार्थना काफी नहीं। कार्रवाई चाहिए। न्याय चाहिए। एक ऐसा समाज चाहिए जहां मंदिर के पास बच्ची खेल सके, बिना डर के। नहीं तो ये चीखें कभी थमेंगी नहीं। ये दर्द हम सबका है। उठो, बोलो, बदलो। वरना हम सब अपराधी हैं।

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अवैध’ संबंध और उससे उत्पन्न अपमान के चलते पति नें जहर खाकर आत्महत्या की

‘पत्नी’ जानकी के कथित ‘अवैध’ संबंध और उससे उत्पन्न अपमान के चलते पति नें जहर खाकर आत्महत्या कर ली ! उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में घाट कोटरा गांव की यह घटना एक सामान्य पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि समाज की गहरी जड़ों में फैले विश्वासघात, लैंगिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दर्दनाक प्रमाण है। डालचंद अहिरवार नामक युवक ने अपनी पत्नी जानकी के कथित अवैध संबंध और उससे उत्पन्न अपमान के चलते जहर खाकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले बनाए वीडियो में उसने पत्नी को दोषी ठहराते हुए कहा, “जानकी, मेरे जैसा धोखा किसी को मत देना।” यह वाक्य न केवल व्यक्तिगत पीड़ा की चीख है, बल्कि समाज में बढ़ते वैवाहिक धोखे और उसके परिणामों पर एक करारा तमाचा है। इस घटना से हमें सामाजिक स्तर पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है – क्यों वैवाहिक संस्था टूट रही है? क्यों पुरुषों की मानसिक पीड़ा को अनदेखा किया जाता है? और क्यों परिवार, कानून तथा समाज मिलकर ऐसे हादसों को रोकने में असफल हो रहे! भारतीय समाज में विवाह को पवित्र बंधन माना जाता है, जहां विश्वास और निष्ठा आधारस्तंभ हैं। लेकिन आधुनिकता के नाम पर बढ़ते अवैध संबंध इस बंधन को खोखला कर रहे हैं। डालचंद की कहानी में पत्नी का मकान मालिक से अफेयर, पति को पिटवाना और मोबाइल छीनना – ये केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि वैवाहिक विश्वासघात की उस श्रृंखला के अंग हैं जो तलाक, हिंसा और आत्महत्या को जन्म दे रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल हजारों आत्महत्याएं पारिवारिक विवादों से जुड़ी होती हैं, जिनमें वैवाहिक धोखा प्रमुख कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां डालचंद जैसे मजदूर वर्ग के पुरुष प्रवास पर जाते हैं, पत्नियां अकेली रहती हैं – वहां अवसरवाद और सामाजिक दबाव मिलकर धोखे को बढ़ावा देते हैं। समाज को चिंतन करना चाहिए क्या हमारी शिक्षा और संस्कार प्रणाली युवाओं को निष्ठा सिखा रही है, या सोशल मीडिया और शहरीकरण के प्रभाव में नैतिकता खो रही है। मीडिया और समाज अक्सर महिलाओं की घरेलू हिंसा पर चर्चा करता है, लेकिन पुरुषों का अपमान, धोखा और मानसिक यातना कहां दर्ज होती है। डालचंद ने हरियाणा में नौकरी की, परिवार को साथ रखा, पत्नी के नाम जमीन खरीदी – फिर भी विरोध करने पर पिटवाया गया। उसका रोना, एक महीने पहले ममेरे भाई के पास आकर फूटना, बताता है कि वह टूट चुका था। भारतीय कानून में दहेज प्रताड़ना या घरेलू हिंसा के प्रावधान महिलाओं के लिए मजबूत हैं, लेकिन पुरुषों के लिए कोई विशिष्ट संरक्षण नहीं। क्या यह लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं। समाज को स्वीकार करना होगा कि पुरुष भी भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुष आत्महत्या की दर महिलाओं से दोगुनी है, क्योंकि वे अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते – “मर्द को दर्द नहीं होता” वाली मानसिकता उन्हें अंदर से खा जाती है। समझौते की कमीघटना में ससुराल वालों का पत्नी का साथ देना और जमीन बेचने का दबाव दर्शाता है कि परिवार अब संयुक्त नहीं, स्वार्थी इकाई बन गए हैं। डालचंद के बच्चे – 8 साल का बेटा और 7 साल की बेटी – अब अनाथ हो गए। क्या यह केवल पति-पत्नी का विवाद था, या परिवार की विफलता। ग्रामीण भारत में पंचायतें और बुजुर्ग समझौते कराते थे, लेकिन आज कानूनी हथियार और सामाजिक अलगाव बढ़ रहा है। पत्नी का मायके चले जाना और पति का अकेले रहना – यह प्रवासी मजदूरों की जिंदगी की कड़वी सच्चाई है। समाज को चिंतन करना चाहिए क्या हम परिवारों में संवाद की संस्कृति खो रहे हैं। काउंसलिंग सेंटर, सामुदायिक मध्यस्थता और स्कूलों में वैवाहिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। पुलिस ने जांच शुरू की है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है। आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC 306) के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, सरकार को वैवाहिक धोखे को गंभीर अपराध मानना चाहिए, पुरुषों के लिए हेल्पलाइन शुरू करनी चाहिए और मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय एजेंडा बनाना चाहिए। NCRB डेटा बताता है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पारिवारिक विवाद से आत्महत्याएं सबसे अधिक हैं – यह चेतावनी है। डालचंद की मौत एक व्यक्ति की नहीं, समाज की हार है। यह हमें सिखाती है कि विश्वास टूटने पर जीवन नहीं टूटना चाहिए। आइए, हम वैवाहिक निष्ठा को मजबूत करें, लैंगिक पूर्वाग्रह त्यागें और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। तभी ऐसी घटनाएं रुकेंगी, वरना हर “जानकी” और “डालचंद” की कहानी समाज की किताब में काली स्याही बनकर रहेगी। यह चिंतन का समय है – सुधार का नहीं, तो कम से कम संवेदना का।

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दोषी को ‘सांसें’ टूटने तक लटकाया जाए, वरना समाज में गलत संदेश जाएगा और ‘न्याय’ पर सवाल उठेंगे !

‘जज’ की सख्त टिप्पणी थी! “दोषी को ‘सांसें’ टूटने तक लटकाया जाए, वरना समाज में गलत संदेश जाएगा और ‘न्याय’ पर सवाल उठेंगे ! उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में सात साल की मासूम और उसकी पांच साल की छोटी बहन के साथ हुई क्रूर वारदात ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। 22 फरवरी 2021 को गांव के प्राथमिक स्कूल के नल पर नहाने गईं इन सगी बहनों में से एक की लाश खेत में मिली, सिर से बहता खून और दूसरी बच्ची लहूलुहान हालत में सौ मीटर दूर। शहद बेचने वाले अनिल चमेली को पुलिस ने गिरफ्तार किया और 57 महीनों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने इसे ‘विरलतम श्रेणी’ का मामला मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। जज की सख्त टिप्पणी थी: “दोषी को सांसें टूटने तक लटकाया जाए, वरना समाज में गलत संदेश जाएगा और न्याय पर सवाल उठेंगे। यह फैसला निश्चित रूप से राहत की सांस देता है, लेकिन क्या सिर्फ फांसी की सजा से बच्चियों पर होने वाले अत्याचार रुक जाएंगे! यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता को उजागर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चियां स्कूल जाती हुईं, नल पर नहाती हुईं या खेलती हुईं – ये दैनिक गतिविधियां कितनी असुरक्षित हो गई हैं! शाहजहांपुर जैसी घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं; निर्भया से लेकर हाथरस, कठुआ और अब यह – हर बार हम गुस्से में सड़कों पर उतरते हैं, हैशटैग चलाते हैं, लेकिन अगली वारदात तक सब भूल जाते हैं! सामाजिक चिंता यही है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था बच्चियों को घर के बाहर कदम रखने लायक नहीं बना पा रही। गांवों में स्कूलों के आसपास कोई सीसीटीवी नहीं, कोई सुरक्षित खेल मैदान नहीं। माता-पिता काम पर जाते हैं तो बच्चियां अकेली पड़ जाती हैं। अपराधी जैसे अनिल – जो शहद बेचकर घूमते हैं – आसानी से शिकार बनाते हैं। पोक्सो एक्ट सख्त है, फास्ट-ट्रैक कोर्ट हैं, लेकिन जांच में देरी, गवाहों का डरना और सबूतों की कमी से कितने केस कमजोर पड़ जाते हैं। इस मामले में भी चार्जशीट लगने में समय लगा, लेकिन अदालत ने सजा सुनाकर उदाहरण पेश किया। क्या हम सिर्फ सजा पर निर्भर रहेंगे या समाज बदलेगा! स्कूलों में सेक्स एजुकेशन अनिवार्य हो, जहां बच्चियां ‘गुड टच-बैड टच’ सीखें। गांव स्तर पर महिला स्वयं सहायता समूह और पंचायतें चौकसी करें। पुलिस पेट्रोलिंग बढ़े, हेल्पलाइन नंबर हर बच्ची की जुबान पर हो। माता-पिता को जागरूक करें कि बच्चियों को अकेला न छोड़ें, लेकिन क्या हर पल निगरानी संभव है! नहीं, इसलिए सामुदायिक निगरानी जरूरी है – पड़ोसी, शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सभी की भूमिका। यह फैसला एक संदेश है: अपराधी बख्शे नहीं जाएंगे। लेकिन असली जीत तब होगी जब ऐसी वारदातें ही न हों। बच्चियां सुरक्षित खेलें, पढ़ें और बड़ा हों – यही समाज की सच्ची प्रगति होगी। सरकार, एनजीओ और हम सब मिलकर इस चेन को तोड़ें, वरना फांसी की रस्सी कितनी भी लंबी हो, मासूमों की चीखें नहीं रुकेंगी। जागो समाज, वरना अगली खबर तुम्हारे घर से आएगी!

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