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पंचकूला इंडस्ट्रियल एरिया फेज वन एवं टू की ग्रीन बेल्ट में लाखों रुपये की लगाई गई ग्रिल एवं ईंटों की चोरी – ओ पी सिहाग

चोरों एवं जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए एवं ग्रीन बेल्ट को दोबारा से सुन्दर एवं हरा भरा बनाये जाने की कार्रवाई की जाए । पंचकूला, 23 मार्च (Ishantimes): जननायक जनता पार्टी पंचकूला के जिला अध्यक्ष ओ पी सिहाग ने आज पूर्व पार्षद एवं जजपा पंचकूला के हल्का अध्यक्ष राजेश निषाद के साथ पंचकूला इंडस्ट्रियल एरिया फेज वन एवं इंडस्ट्रियल एरिया फेज टू की ग्रीन बेल्ट जो सेक्टर 14,15 एवं सेक्टर 16 की तरफ लगभग 1.5 किलोमीटर की लम्बाई में बनी हुई है उसका निरीक्षण किया तथा पाया कि तत्कालीन हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा काफी सालो पहले लगाई गई 80 प्रतिशत ग्रिल एवं ईंटे चोरी हो गई हैं । ओ पी सिहाग ने याद करते हुए कहा कि काफी सालों पहले इस ग्रीन बेल्ट में बहुत ज्यादा पेड़ पौधे, सुन्दर घास तथा फ़ूलों के पौधे लगाये गये थे एवं चारों तरफ चारदीवारी करके सुन्दर ग्रिल भी लगाई थी। पिछले कई सालों से सरकार द्वारा इस ग्रीन बेल्ट के रखरखाव का जिम्मा कभी एच एस वी पी तो कभी एच एस आई डी तो कभी पी एम डी ए को सौंपने का काम किया गया। परंतु इन सभी विभागों के अधिकारियों की लापरवाही एवं गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण य़ह ग्रीन बेल्ट उजड़ती गई। ओ पी सिहाग ने कहा कि पिछले 2-3 सालों से तो य़ह ग्रीन बेल्ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों की उपेक्षा की बुरी तरह शिकार हुई है।उन्होंने कहा कि इसी बात का फायदा उठा कर नशेड़ी लोगों तथा चोरों ने इस ग्रीन बेल्ट के चारों तरफ लगाई गई ग्रिल एवं ईंटों को चोरी करना शुरू कर दिया तथा आज लाखों रुपये की 80 प्रतिशत से ज्यादा ग्रिल एवं ईंटों की चोरी हो गई है। उन्होंने कहा कि बड़े ही हैरत की बात है कि अब जो विभाग इस की देख रेख कर रहा है उसके अधिकारियों द्वारा भी इस ग्रीन बेल्ट में हर रोज हो रही चोरी एवं बड़े बड़े पेड़ों के काटे जाने को रोकने को लेकर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। जजपा ज़िला अध्यक्ष ओ पी सिहाग एवं जजपा पंचकूला हल्का अध्यक्ष राजेश निषाद ने प्रदेश सरकार एवं मौजूदा समय पर इस ग्रीन बेल्ट की देख रेख कर रहे पंचकूला मेट्रोपोलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी के वरिष्ठ अधिकारियों से मांग की है कि जो बची हुई ग्रिल, ईंट एवं बड़े पेड़ पौधे है उनकी सुरक्षा की जिम्मेवारी सही ढंग से की जाए, जो लाखों रुपये की ग्रिल, ईंटों एवं पेड़ों की चोरी हुई है उस बारे तुरंत एफ आई आर दर्ज करवा कर चोरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए तथा जिन अधिकारियों की लापरवाही की वजह से ग्रीन बेल्ट के ये हालात हुए हैं उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाए।जजपा ज़िला अध्यक्ष ओ पी सिहाग एवं हल्का अध्यक्ष राजेश निषाद ने पी एम डी ए के मुख्य प्रशासक से अपील की है इस पूरी ग्रीन बेल्ट को फिर से हरा भरा एवं सुन्दर ग्रिल तथा फूलों वाले पौधे लगाने बारे उचित कार्रवाई की जाए तथा इसके बीच-बीच बह रहे बरसाती नाले की साफ सफाई करवा कर गन्दगी को हटाया जाए ताकि आसपास के सेक्टरो एवं कालोनियों के लोग पहले की तरह सुबह श्याम घूम सके ।

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ओ पी सिहाग ने वरिष्ठ नागरिक मंच पंचकूला के सदस्यों के बीच मनाया अपना जन्मदिन।

पंचकूला,5 फरवरी: जननायक जनता पार्टी पंचकूला के जिला अध्यक्ष ओ पी सिहाग ने अपना जन्मदिवस बड़ी ही सादगी से पंचकूला वरिष्ठ नागरिक मंच के सदस्यों के बीच मनाया। इससे पहले वो माता मनसा देवी गौशाला गए तथा गौमाता को हरा चारा डालकर उनका आशीर्वाद लिया। वरिष्ठ नागरिक मंच के अध्यक्ष ओ पी सिंगला , चेयरमैन कर्म सिंह चहल, महासचिव के सी भारद्वाज ने जजपा जिला अध्यक्ष ओ पी सिहाग को जन्मदिन की बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए उनके स्वस्थ व लम्बे जीवन की कामना की । उनके जन्मदिवस पर पंचकूला तथा प्रदेश भर से उनके हज़ारों शुभचिंतकों ने उनको बधाई संदेश भेजे तथा अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। इस अवसर पर वरिष्ठ नागरिक मंच के सदस्यों के साथ जजपा पंचकूला हल्का अध्यक्ष एवं नगर निगम पंचकूला के पूर्व पार्षद राजेश निषाद, जजपा जिला कार्यालय सचिव सुरिन्दर चड्डा, जिला जजपा के प्रधान महासचिव ईश्वर सिंहमार एवं जिला सचिव हीरामन वर्मा ने भी जिला अध्यक्ष सिहाग को जन्म दिन की बधाई देते हुए उनके अच्छे भविष्य की कामना करते हुए कहा कि उन सबकी दुआए हैं कि ओ पी सिहाग पंचकूला की जनता की आवाज़ पूरे जोश के साथ उठाते रहे।

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संसद में उठना चाहिए दम घोंटती हवा का सवाल

संजय राय, देश में वायु प्रदूषण अब किसी मौसम-विशेष की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह एक स्थायी और गहराता हुआ जनस्वास्थ्य संकट बन चुका है। यह वह संकट है जो बिना शोर किए लोगों की उम्र घटा रहा है, बीमारियों को सामान्य बना रहा है और आने वाली पीढ़ियों की सेहत पर स्थायी असर डाल रहा है। विडंबना यह है कि इतना बड़ा खतरा होते हुए भी वायु प्रदूषण पर नीति-निर्माण के उच्चतम मंच—संसद—में वह गंभीर और निरंतर चर्चा नहीं हो पा रही, जिसकी यह मांग करता है। आज शहरों से लेकर गांवों तक हवा में घुले सूक्ष्म जहरीले कण हर सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, निर्माण गतिविधियों की धूल और घरेलू ईंधन से निकलने वाला धुआं—सब मिलकर हवा को धीरे-धीरे ज़हर में बदल चुके हैं। इसकी सबसे भयावह विशेषता यह है कि इसका असर तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन यह शरीर को भीतर से खोखला करता चला जाता है। वायु प्रदूषण को अब केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति है, जिसका बोझ सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ता है जो इसके लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। झुग्गियों में रहने वाले परिवार, सड़क किनारे काम करने वाले मजदूर, औद्योगिक इलाकों के आसपास बसने वाले समुदाय—यही वे लोग हैं जो सबसे जहरीली हवा सांस में लेते हैं। इस तरह वायु प्रदूषण सामाजिक असमानता को और गहरा करता है। आज सांस की बीमारियां जैसे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और सीओपीडी असाधारण नहीं रहीं। दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक जैसे रोगों में भी वायु प्रदूषण की भूमिका तेजी से सामने आ रही है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण रक्त में घुलकर हृदय और मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। बच्चों पर इसका प्रभाव और भी खतरनाक है। उनके विकसित हो रहे फेफड़े प्रदूषित हवा को सहन नहीं कर पाते, जिससे उनकी श्वसन क्षमता जीवनभर के लिए कम हो सकती है। बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय आंकड़े इस संकट की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लगभग 90 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण से जुड़ी होती है। लैंसेट में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2022 में भारत में ही करीब 17 लाख मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं—जो 2010 की तुलना में लगभग 38 प्रतिशत अधिक हैं। इनमें से बड़ी संख्या जीवाश्म ईंधन, विशेषकर कोयले से उत्पन्न प्रदूषण से जुड़ी है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब दिल्ली और उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा एक बार फिर शीतकालीन धुंध की चादर में लिपटा हुआ है। कई इलाकों में पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक दर्ज किया गया है। हरियाणा जैसे राज्यों में प्रदूषण के कारण समय से पहले प्रसव के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जो यह दिखाता है कि वायु प्रदूषण केवल सांसों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन की शुरुआत को भी प्रभावित कर रहा है। भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कानूनों और योजनाओं की कमी नहीं है। वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) जैसे ढांचे मौजूद हैं। लेकिन समस्या नीति के अभाव की नहीं, बल्कि उसके कमजोर क्रियान्वयन की है। स्वीकृत बजट का पूरा उपयोग न होना और लक्ष्य प्राप्ति में ढिलाई यह संकेत देती है कि वायु प्रदूषण अभी भी प्राथमिकता की सूची में ऊपर नहीं है। राज्यों की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में “स्वच्छ शहर” का तमगा पाने वाले नगरों की हवा भी लगातार खराब हो रही है। आदिवासी और वनवासी क्षेत्रों तक प्रदूषण का दायरा फैलना बताता है कि यह संकट अब शहरी सीमाओं से बाहर निकल चुका है। इसके साथ ही, विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी इस समस्या को और गंभीर बना रही है। एक ओर नगर वन जैसी योजनाओं की घोषणा होती है, तो दूसरी ओर हजारों पेड़ों की कटाई के प्रस्ताव सामने आते हैं। यह दोहरा रवैया दर्शाता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन अभी भी नीति-निर्माण में सही जगह नहीं पा सका है। असल सवाल यह है कि क्या हम वायु प्रदूषण को उतनी गंभीरता से ले रहे हैं, जितनी इसकी मांग है? जब तक इसे संसद में स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक समाधान आधे-अधूरे ही रहेंगे। वायु प्रदूषण कोई भविष्य की चुनौती नहीं, बल्कि वर्तमान की आपदा है। यदि नीति, राजनीति और समाज ने मिलकर इसे प्राथमिकता नहीं बनाया, तो आने वाले वर्षों में इसका मूल्य हमें सांसों, जीवन और उत्पादकता—तीनों से चुकाना पड़ेगा। अब समय आ गया है कि दम घोंटती हवा का सवाल संसद के केंद्र में आए—क्योंकि यह केवल पर्यावरण का नहीं, देश के अस्तित्व और नागरिकों के जीवन का प्रश्न है।

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अब हवाई यात्रा भी आफत!

वैश्विक विमानन उद्योग की सबसे बड़ी परीक्षा संजय राय, हवाई यात्रा ने दुनिया को सिकोड़ा है, सीमाओं को छोटा किया है और अर्थव्यवस्था को गति दी है—लेकिन क्या यह उद्योग उतना सुरक्षित और मजबूत है, जितना हम रोज़ मान लेते हैं? एयरबस के ए320 फैमिली विमानों में आए हालिया संकट ने साबित कर दिया है कि उन्नत तकनीक से लैस यह क्षेत्र भीतर से कितना नाजुक है। 2025 की यह घटना न सिर्फ एक सॉफ्टवेयर त्रुटि का मामला है, बल्कि पूरी वैश्विक हवाई व्यवस्था की संरचनात्मक कमियों पर बड़ा सवाल भी खड़ा करती है। ए320 संकट: एक छोटी चिंगारी से वैश्विक हलचल नवंबर 2025 में एयरबस ने स्वीकार किया कि ए320 फैमिली के विमानों में एक गंभीर तकनीकी खामी है। जांच में सामने आया कि तीव्र सौर विकिरण के कारण फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम का महत्वपूर्ण डेटा क्षतिग्रस्त हो सकता है—यानी विमान की सुरक्षा सीधे जोखिम में आ सकती है। दुनिया भर के लगभग 6,000 विमान प्रभावित घोषित हुए और तत्काल सॉफ्टवेयर अपडेट अनिवार्य कर दिया गया। परिणाम साफ थे—● हजारों उड़ानें रद्द● यात्री दुनिया भर के एयरपोर्ट्स पर फंसे● एयरलाइनों को अरबों का नुकसान● और विमानन कंपनियों पर बढ़ता दबाव जब तक दिसंबर की शुरुआत आई, एयरबस ने कहा कि ज्यादातर विमान अपडेट हो चुके हैं, लेकिन अभी भी “जोखिम की छाया” पूरी तरह नहीं हटी है। इसके ठीक बाद, कुछ विमानों में फ्यूज़लेज पैनल की गुणवत्ता संबंधी खामी पाई गई। यह सीमित संख्या का मामला था, पर इसने यह साफ कर दिया कि तकनीकी गड़बड़ियों की श्रृंखला खत्म नहीं हुई है। उद्योग की असली कमजोरी: दो कंपनियों के भरोसे दुनिया दुनिया के 90% से ज्यादा व्यावसायिक विमान सिर्फ दो कंपनियाँ—एयरबस और बोइंग—बनाती हैं। ऐसे में इनमें से किसी एक की गलती पूरी वैश्विक उड़ान व्यवस्था के लिए खतरा बन जाती है। ● 2019 में बोइंग 737 मैक्स का संकट● 2025 में एयरबस ए320 का संकट यानी, दो कंपनियों की तकनीकी त्रुटियाँ—पूरी दुनिया को जकड़ लेती हैं। तकनीकी निर्भरता का साया आधुनिक विमान अब उड़ते कम और “सॉफ्टवेयर” के भरोसे चलते ज्यादा हैं। सेंसर, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स पर बेतहाशा निर्भरता ने उन्हें जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नई चुनौतियों के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। ● सौर विकिरण● चुंबकीय तूफान● साइबर जोखिम● आपूर्ति श्रृंखला का दबाव एक छोटी चूक भी वैश्विक संकट पैदा कर सकती है—ठीक वैसे ही जैसे इस बार हुआ। नियामक एजेंसियों की भूमिका: क्या निगरानी कमजोर पड़ रही है? ईएएसए, एफएए और भारत की डीजीसीए जैसी एजेंसियाँ सुरक्षा मानकों की रक्षा करती हैं। एयरबस मामले में ईएएसए ने तेज़ी से आदेश जारी किए, लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या यह स्थिति पहले टाली जा सकती थी? 737 मैक्स दुर्घटनाओं के बाद एफएए पर भरोसा करने की आलोचना हुई थी। यह घटनाएँ दिखाती हैं कि ● स्वतंत्र जांच● नियमित ऑडिट● उभरते तकनीकी जोखिमों की पहचान इन सभी पर और सख़्ती की ज़रूरत है। भारत में डीजीसीए के लिए भी यह समय है कि वह स्थानीय एयरलाइनों पर मानकों की निगरानी और अधिक मजबूत करे, खासकर तब जब भारतीय हवाई यात्रा दुनिया में सबसे तेज़ बढ़ रही है। एयरलाइंस भी जिम्मेदार—सिर्फ लागत कम करने की दौड़ नहीं एयरलाइंस सिर्फ ग्राहक नहीं, बल्कि सुरक्षा की अंतिम कड़ी हैं। अमेरिकी एयरलाइंस ने तत्काल कदम उठाए, लेकिन भारतीय संदर्भ में— इंडिगो और स्पाइसजेट के लिए बड़ा सबक भारतीय एयरलाइंस ए320 विमानों पर भारी निर्भर हैं। ऐसे में— ● बेड़े का विविधीकरण● स्वायत्त तकनीकी जाँच● पायलट प्रशिक्षण● और यात्रियों के साथ पारदर्शी संचार ज़िम्मेदारी का हिस्सा है। लागत बचाने की होड़ में सुरक्षा को पीछे नहीं धकेला जा सकता। यह समझौता भविष्य में महंगा साबित होगा। भविष्य का रास्ता: मजबूत उद्योग, सुरक्षित उड़ान एयरबस संकट ने एक बड़ी चेतावनी दी है—हवाई यात्रा जितनी सुविधाजनक है, उतनी ही जोखिम भरी भी। तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय दबावों ने इस उद्योग को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हर कदम सावधानी से उठाना होगा। सरकारों को चाहिए— ● अनुसंधान में निवेश● मौसम–सौर विकिरण अध्ययन● स्मार्ट सुरक्षा सिस्टम● और उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने की रणनीति क्योंकि उड़ान सिर्फ एक यात्रा नहीं, भरोसे की ऊँचाई है—और उसमें गिरावट की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

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Bypassing the tradition of meetings between foreign delegations and the Leader of Opposition is dangerous for democratic values:- Kumari Selja

:-The BJP is Attempting to weaken the constitutional role of the Opposition in a democratic system:-Kumari Selja :-The BJP Government is portraying India’s democratic framework as weakened, Through its own functioning:-Kumari Selja Chandigarh / 5th, December.( Sanjay Rai): The General Secretary of All India Congress Committee, former Union Minister and Member of Parliament from Sirsa, Kumari Selja, has said that India has a proud democratic tradition wherein foreign dignitaries visiting the country formally meet the Leaders of Opposition in both the Lok Sabha and Rajya Sabha. This practice is not a mere formality, but a symbol of India’s strong, balanced and participatory democracy. Ignoring this tradition and excluding the Leaders of Opposition from such meetings is detrimental to democratic values. In a statement released to the media, Kumari Selja said that whether it was former Prime Minister Dr. Manmohan Singh or Bharat Ratna Atal Bihari Vajpayee, all respected this tradition and acknowledged the importance of the Opposition. The dignity of Parliament has always been strengthened by this inclusive approach. Unfortunately, the present BJP government has sidelined this crucial democratic practice. Excluding Rahul Gandhi, Leader of Opposition in Lok Sabha, and Mallikarjun Kharge, Leader of Opposition in Rajya Sabha, from meetings held with foreign representatives is not only a violation of parliamentary decorum, but also appears to be an attempt to weaken the constitutional role of the Opposition. Kumari Selja asserted that democracy functions through respect and participation from both the government and the Opposition. The BJP government’s disregard for established traditions is harmful to India’s democratic institutions as well as the nation’s international credibility. She urged the central government to respect democratic conventions, restore parliamentary propriety, and ensure that the Opposition is given the due constitutional space to fulfil its responsibilities. :- Kumari Selja raises issue of severe drinking water shortage in Sirsa in Lok Sabha. Kumari Selja raised the issue of drinking water scarcity in the Lok Sabha, stating that several villages across Sirsa and many parts of Haryana still lack access to even basic drinking water facilities. Despite the BJP being in power at both the Centre and the State, the situation remains unchanged. The government makes big announcements but nothing is visible on the ground. Kumari Selja said that in the Rania region of Sirsa district, more than 40 villages have no access to canal water, while in the border areas of Ellenabad, people are still forced to purchase water for drinking. Kumari Selja urged the government to immediately prioritise the drinking water crisis in Haryana and Sirsa and take concrete steps to resolve it.

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Haryana Police’s ‘Operation Hotspot’: Raids at Over 700 Locations, 165 Arrested, Large Quantity of Drugs and Illegal Weapons Seized

Chandigarh, 5 December (Ishan Rai). Haryana Police conducted a large-scale and intensive campaign under ‘Operation Hotspot Domination’ to strengthen law and order in the state and create fear among criminals. During this special drive conducted on 4 December 2025, various police teams simultaneously raided 707 identified hotspots (crime-prone areas) across the state. As a result of the police’s swift and coordinated action, a total of 92 new criminal cases were registered and 165 accused involved in various offences were arrested and sent behind bars within just one day. Crushing Drug Networks and Arresting Drug Traffickers Reaffirming its resolve to make the state drug-free, the police dealt a major blow to drug dealers during this operation. Ground-level raids led to the recovery of a large quantity of narcotics. Across different districts, police seized a total of 4.33 kg ganja, 218 grams opium, 2 kg doda post, and more than 85 grams heroin. Additionally, 890 intoxicating tablets and 23.5 grams smack were recovered from drug traffickers. The operations in districts like Sirsa and Fatehabad especially inflicted significant damage on drug networks, sending a clear message that there is no place for drug trafficking in Haryana. Major Crackdown on Illegal Liquor and Weapons Illegal liquor and illegal arms remain major challenges in the world of crime, and the operation focused specifically on curbing these. Police teams seized a large quantity of illicit liquor across the state, including 839 bottles of country-made liquor, English liquor, and other illegal liquor—amounting to over 1000 bottles in total. Along with this, 570 litres of lahan was also confiscated. The police achieved success against illegal weapons as well, recovering 3 pistols and 5 live cartridges from criminals. Five new cases under the Arms Act were registered, and 5 accused were arrested. Encircling Gangsters and Violent Criminals Haryana Police’s ‘zero tolerance’ policy against organised crime and gangsters was clearly visible in this campaign as well. Using an active intelligence network, the police succeeded in arresting 22 dangerous and violent criminals. Additionally, inter-state coordination was strengthened with neighbouring states by sharing 15 important intelligence reports to prevent criminals from exploiting state borders. In this sequence, a Look Out Circular (LOC) was issued in Fatehabad, and a proposal was sent to cancel the passport of a violent offender to prevent him from fleeing abroad. Bulldozing Illegal Properties and Attachment of Crime Proceeds The police have not limited their action to arresting criminals but have also begun targeting property earned through crime. Delivering an economic blow, police in Fatehabad attached (seized) the illegally acquired property of a violent criminal. In Hansi district, police and district administration jointly demolished 3 illegal encroachments made by violent offenders. This step aims to dry up criminals’ financial sources and send a strong message that property earned through crime will not remain safe. The Human Face of Khaki: Service Along with Security While the police acted fiercely against criminals, they also extended humanitarian support to those in need. ‘Operation Hotspot’ was not limited to catching criminals; it also highlighted the police’s community responsibility. During duty, police personnel assisted 399 people across the state who were in distress or required help. This demonstrates that while Haryana Police is strict in enforcing the law, it is equally sensitive when it comes to service and public safety. Swift Police Action in Youth Murder Case: Special Detective Unit Arrests a Suspect In a brutal murder case of a youth in the City Police Station area of Kaithal, the district police showed remarkable promptness. According to the police spokesperson, Rakesh Kumar’s 20-year-old son Ashu, a resident of Deha Basti who ran a grocery shop, left home on 4 December after receiving a phone call but did not return. Later, his body was found in bushes near Ramnagar railway crossing, with deep injury marks on his head. Understanding the seriousness of the case, SP Upasana immediately handed over the investigation to the Special Detective Unit (SDU) and CIA-1, directing them to solve the case on priority. The police’s swift action bore fruit and the SDU arrested a suspect, who is now being interrogated thoroughly. Police Action in University Gate Firing and Vandalism Case: 3 Suspects Detained In the daring act of firing and vandalism at the NIILM University gate in Kaithal, police acted swiftly and detained three suspects. Acting on the statement of the victim student, Nitin, the police reported that around noon on 4 December, some youths travelling in a black Scorpio quarrelled with students at the gate, damaged property with sticks, and attempted to run their vehicle over them. During this, the accused opened fire, and a bullet hit Nitin’s left leg. The attackers have been identified as Karan, Arun, Siddhanshu, and Harsh alias Hanny, among others. As soon as information was received, the Special Detective Unit took charge and detained three suspects, who are currently being questioned regarding the incident. Police Strike Against Cyber Fraudsters: 22 Arrested and ₹59 Lakh Saved from Fraud Under the ongoing campaign against cybercrime, police have delivered outstanding performance in the last 24 hours. A total of 309 complaints were received on Cyber Helpline 1930, involving an attempted fraud amount of around ₹88,36,208. The cyber team acted swiftly and intelligently and froze ₹59,14,533 (about 66.94 percent) of the amount before it could reach the fraudsters’ accounts. In one special case, due to timely reporting by the victim, the team held back ₹91,976 (83.25%) out of ₹1,10,476. Additionally, police arrested 22 cyber criminals in separate cases, recovered ₹2.53 lakh from them, and refunded ₹30,51,748 to victims’ bank accounts.

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ममता बनर्जी सिर्फ एक विशेष वर्ग की राजनीति कर रही हैं – नायब सिंह सैनी

पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं को किया जा रहा टारगेट, महिलाओं का हो रहा शोषण – मुख्यमंत्री चंडीगढ़, 3 दिसंबर — हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में उनकी सरकार एक विशेष वर्ग को साधने में लगी हुई है, जबकि आम जनता, विशेषकर महिलाएं लगातार उत्पीड़न और शोषण का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि एक महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल में महिलाओं की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी आज हरियाणा निवास में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में किस प्रकार हिन्दू समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है और राज्य सरकार संवैधानिक दायित्वों का पालन करने के बजाय भेदभाव की राजनीति कर रही है। उन्होंने कहा कि जनता ने वोट देकर उन्हें संवैधानिक पद पर बिठाया, लेकिन वे उसके विपरीत भेदभाव करती हैं और वोट बटोरने की राजनीति में लगी हैं। उन्होंने बाहर के लोगों को सत्ता हासिल करने के लिए प्रदेश में जगह देकर राज्य की सामाजिक संरचना को कमजोर किया है, इसलिए अब SIR का विरोध किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाएँ 140 करोड़ लोगों के कल्याण पर केंद्रित मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि इसके विपरीत प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार की सभी योजनाएँ 140 करोड़ भारतीयों के समग्र कल्याण को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं ताकि आम नागरिकों का जीवन सरल बने और उन्हें योजनाओं का सीधा लाभ मिले। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अपनी राजनीति को एक विशेष वर्ग तक सीमित करने में लगी हैं। आप और कांग्रेस सिर्फ शोर मचाने वाली पार्टियाँ पंजाब सरकार द्वारा महिलाओं के लिए घोषित योजना के बावजूद वहां महिलाओं को अब तक लाभ न मिलने के संबंध में पूछे गए एक प्रश्न पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने आम आदमी पार्टी पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार सिर्फ शोर मचाने वाली सरकार है। कांग्रेस की हालत भी इससे अलग नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ही वास्तविक रूप से लोगों के कल्याण के लिए कार्य कर रही है। कांग्रेस और इंडी गठबंधन वाले दल केवल शोर ज्यादा मचाते हैं, काम कुछ नहीं करते।

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संविधानदिवस पर दिल्ली में ‘तिरंगा’पुस्तक का भव्य विमोचन पूर्व CJI के.जी. बालकृष्णन ने किया

नई दिल्ली(इंद्र यादव,ईशान टाइम्स ग्रुप)।संविधान दिवस के पावन अवसर पर नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में एक गरिमामय कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के.जी. बालकृष्णन ने जगद्गुरु कृष्णानंद सरस्वती एवं अन्य संभ्रांत अतिथियों की उपस्थिति में चर्चित पुस्तक “तिरंगा” का विधिवत विमोचन किया। कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री श्याम जाजू की विशेष उपस्थिति रही। मंच पर जगद्गुरु कृष्णानंद सरस्वती, जस्टिस के.जी. बालकृष्णन तथा अन्य गणमान्य नागरिक एक साथ उपस्थित रहे और सभी ने मिलकर तिरंगे के प्रतीक चिह्न वाली इस पुस्तक का लोकार्पण किया।पुस्तक “तिरंगा” राष्ट्रीय ध्वज के गौरव, उसके इतिहास और भारतीय संविधान में निहित मूल्यों को समर्पित है। विमोचन के बाद उपस्थित लोगों ने इसे राष्ट्रप्रेम और संवैधानिक चेतना को जगाने वाली महत्वपूर्ण रचना बताया। कार्यक्रम में कांस्टीट्यूशन क्लब के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा उपस्थित रहे। संविधान दिवस और “रत्न” थीम के साथ आयोजित इस समारोह ने राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों को फिर से याद दिलाया। पुस्तक के लेखक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट श्री अनिल कुमार यादव जी ने विमोचन के बाद कहा कि “तिरंगा सिर्फ़ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं और बलिदानों का प्रतीक है। इस पुस्तक के माध्यम से नई पीढ़ी तक यह संदेश पहुँचाना मेरा उद्देश्य है।”कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

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‘विपक्ष-मुक्त लोकतंत्र’ की लहर: राजनीतिक परिदृश्य में एक खतरनाक प्रवृत्ति

संजय राय, भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान एक ऐसी भाषा और सोच विकसित होती दिखाई दी है, जिसका मूल उद्देश्य व्यवस्था से विपक्ष की प्रभावी भूमिका को धीरे-धीरे समाप्त करना या कमज़ोर करना प्रतीत होता है। इसकी शुरुआत 2013 में उस समय हुई जब गोवा में भाजपा की बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार अभियान का नेतृत्व सौंपा गया और उन्होंने अपने संबोधन में पहली बार “कांग्रेस-मुक्त भारत” का विचार देश के सामने रखा। उसके बाद वही विचार विभिन्न रूपों, नारों और स्वरूपों में बार-बार दोहराया जाता रहा—कभी “कांग्रेस संस्कृति” को खत्म करने की बात, कभी “पंजा-छोड़ो” अभियान, कभी परिवारवाद और भ्रष्टाचार समाप्त करने के नाम पर विपक्ष को लगातार कटघरे में खड़ा करना। हालाँकि 2024 के चुनावों में कांग्रेस ने 99 सीटों के साथ अपनी उपस्थिति दिखाई, फिर भी विपक्ष को कमजोर करने के राजनीतिक प्रयास रुकते नहीं दिखे। उत्साह से भरी भाजपा अब बिहार की जीत के बाद दिल्ली से लेकर दक्षिण भारत तक विपक्षी दलों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने में जुटी है। इसी बीच प्रधानमंत्री द्वारा सूरत में दिए एक बयान ने राजनीतिक विमर्श को फिर गर्मा दिया। उन्होंने विपक्षी सांसदों—खासतौर पर कांग्रेस के युवा नेताओं—के “करियर” को लेकर चिंता जताई और दावा किया कि उन्हें पार्टी में बोलने तक का अवसर नहीं मिलता। लेकिन इस बयान ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या सत्तापक्ष, जो अपने ही वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर धकेलने का लंबा इतिहास रखता है, सच में विपक्षी नेताओं के भविष्य को लेकर चिंतित हो सकता है? राजनीति के भीतर का विरोधाभास प्रधानमंत्री की यह “चिंता” इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि भाजपा के भीतर ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहाँ वरिष्ठ नेताओं को या तो सक्रिय politics से दूर किया गया या ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया गया जहाँ वे औपचारिक रूप से मौजूद तो रहे, पर प्रभावहीन हो गए। 2002 के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को गुजरात की कुर्सी से हटाना चाहते थे, तब लालकृष्ण आडवाणी वह नेता थे जिन्होंने मोदी का बचाव किया। लेकिन आगे चलकर आडवाणी स्वयं ऐसे “मार्गदर्शन मंडल” में पहुँचा दिए गए, जिसकी कोई वास्तविक भूमिका नहीं थी। मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी में मोदी की उम्मीदवारी के लिए सीट छोड़नी पड़ी, बाद में वे भी इसी मंडल का हिस्सा बन गए। यही तर्क 75 वर्ष की उम्र सीमा पर भी लागू हुआ—लेकिन वही सीमा आज स्वयं मोदी के लिए अप्रासंगिक हो चुकी है। दूसरी ओर 80 वर्ष से अधिक उम्र के कई नेताओं को राज्यपाल या मंत्री बनाया गया। परन्तु सुब्रमण्यम स्वामी, शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं को दरकिनार करने में कोई झिझक नहीं दिखाई गई। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि यदि भाजपा अपने ही वरिष्ठों के राजनीतिक भविष्य की परवाह नहीं करती, तो विपक्ष के करियर को लेकर उसकी “विचारशीलता” कैसे वास्तविक हो सकती है? सत्ता बनाम आवाज़: संसद में क्या होता है? प्रधानमंत्री के इस बयान का एक दूसरा पहलू भी है। वे कहते हैं कि विपक्षी सांसदों को बोलने नहीं दिया जाता—पर देश ने कई बार यह भी देखा है कि जब विपक्ष सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष के व्यवधानों के कारण बहस अधूरी रह जाती है। जहाँ तक राहुल गांधी का सवाल है—उनका बोलना इसलिए खटकता है क्योंकि वे भ्रष्टाचार, उद्योगपति-पक्षपात, नोटबंदी, जीएसटी, संस्थाओं पर नियंत्रण, चुनावी प्रक्रियाएँ, किसान आंदोलन, जातीय जनगणना और आर्थिक असमानता जैसे विषयों को खुलकर उठाते हैं। यह वे मुद्दे हैं जिनसे सत्ता पक्ष असहज रहता है। और शायद यही वजह है कि राहुल गांधी के खिलाफ लगातार वैचारिक व राजनीतिक मोर्चेबंदी की जा रही है—नवीनतम उदाहरण 272 पूर्व अधिकारियों के हस्ताक्षर वाला वह पत्र है जिसमें राहुल पर “संविधान-विरोधी” टिप्पणियों का आरोप लगाया गया। लेकिन कांग्रेस ने उसी पत्र में शामिल कई अधिकारियों पर गंभीर अनैतिक आचरण और भ्रष्टाचार के आरोप उजागर कर दिए, जिससे इस कथित नैतिक अभियान की विश्वसनीयता स्वयं संदिग्ध हो गई। परिवारवादी राजनीति पर “रणनीतिक हस्तक्षेप” इन दिनों बिहार की राजनीति में भी यही प्रवृत्ति देखी जा रही है। लालू यादव के परिवार में उठे मतभेदों को हवा देने की कोशिशें साफ दिखाई देती हैं। इन प्रयासों के पीछे विपक्ष को कमजोर करने की उसी बड़ी रणनीति का संकेत मिलता है, जिसकी जड़ें 2013 के “कांग्रेस-मुक्त भारत” नारे में ही छिपी हुई हैं। वास्तविक चुनौती: लोकतंत्र को विपक्ष की आवश्यकता है लोकतंत्र की सेहत तभी मजबूत होती है जब उसमें सत्ता का दुरुपयोग न हो और विपक्ष निर्भय होकर सवाल पूछ सके।आज स्थिति उल्टी दिखती है— विपक्षी दलों को कमजोर करने के प्रयास उनके नेताओं को तोड़ने की राजनीति आलोचनाओं को संस्थागत हमलों के रूप में चित्रित करना असहमति को “देश-विरोध” या “अस्थिरता” से जोड़ना ये सब संकेत हैं कि लोकतंत्र को विपक्ष से नहीं, बल्कि विपक्ष-मुक्त वातावरण बनाने की कोशिशों से खतरा है। प्रधानमंत्री द्वारा विपक्षी सांसदों के “राजनीतिक भविष्य” को लेकर जताई गई चिंता न तो स्वाभाविक लगती है और न ही परिस्थितियों से मेल खाती है। यह उन लगातार चल रहे प्रयासों की अगली कड़ी लगती है जो देश के राजनीतिक संतुलन को एक-दलीय प्रभुत्व की ओर ढकेलना चाहते हैं। विपक्ष, चाहे वह कांग्रेस हो, क्षेत्रीय दल हों या कोई अन्य राजनीतिक शक्ति—लोकतंत्र का सुरक्षा कवच होता है।और यही कारण है कि आज असली खतरा किसी एक नेता या दल में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो विपक्ष-मुक्त राजनीति को लोकतंत्र की उपलब्धि मानती है।

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सत्य को आत्मसात करना ही वीरेंद्र सेंगर को सच्ची श्रद्धांजलि : सोमपाल शास्त्री

नई दिल्ली, 7 नवम्बर (Ishantimes)। पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री ने कहा है कि वरिष्ठ पत्रकार स्व. वीरेंद्र सेंगर एक खांटी पत्रकार थे। वे बेहद संवेदनशील थे और विपरीत परिस्थितियों में भी कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने हमेशा सच लिखा। उनके लिखे सत्य को आत्मसात करना ही वीरेंद्र सेंगर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सोमपाल शास्त्री ने ये बात निडर और बेबाक पत्रकार स्व. वीरेंद्र सेंगर द्वारा लिखी गई दो पुस्तकों, सच के सिवाय व आगे और आग है के विमोचन के अवसर पर कही। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री ने की। पूर्व डीजीपी सेवानिवृत्त आईपीएस विभूति नारायण राय विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी की इस मौके पर गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रसिद्ध लेखक व विचारक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल मुख्य वक्ता थे। इस अवसर पर वीरेंद्र सेंगर के साथ काम कर चुके पत्रकारों और उनके अत्यंत घनिष्ठ मित्रों द्वारा लिखी गई स्मारिका स्मृतियां वीरेंद्र सेंगर की भी जारी की गई। देश के प्रख्यात पत्रकारों ने इस आयोजन में भाग लिया। इस मौके पर विभूति नारायण राय ने कहा कि सच लिखने में बहुत बाधाएं हैं लेकिन वीरेंद्र सेंगर इन बाधाओं से तनिक भी नहीं घबराए। इस अवसर पर कमर वहीद नकवी ने कहा कि सच न बोलना ठगना है। वीरेंद्र सेंगर सच्चे पत्रकार थे। वे पक्षपाती नहीं थे। दिल्ली के सुधा गोयल हत्याकांड की उन्होंने जो रिपोर्टिंग की वो बेमिसाल है। प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि देश में माहौल ऐसा है कि मूर्ख होना गर्व का विषय हो गया है। विरेंद्र सेंगर ने सच को सच लिखने की हिम्मत की। यही वजह है कि वे कालजयी पत्रकार बन गए हैं। गौरतलब है कि 1955 में उत्तरप्रदेश के कानपुर के गांव खांडेपुर में जन्में वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र सेंगर का 26 मार्च 2025 को उत्तराखंड नैनीताल जिले के नौकिछियाताल में निधन हो गया था। उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत कानपुर से की थी और उसके बाद दिल्ली आकर चार दशक तक उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी निर्भीक पत्रकारिता की धाक जमाई। सेंगर चौथी दुनिया समाचार पत्र के आधार स्तंभ रहे, अमर उजाला व संडे मेल आदि अनेक नामी गिरामी अखबारों में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। जब उत्तरप्रदेश के हाशिमपुरा कांड की खबर को कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं था तब उस खबर को वीरेंद्र सेंगर ने सबूतों के साथ छापा। इससे पूरी दुनिया को आजाद भारत में हुए इस वीभत्स नरसंहार का पता चला। पूरे देश को भी पहली बार इस रिपोर्टिंग से वीरेंद्र सेंगर की प्रतिभा, पत्रकारिता और जज्बे का पता चला। प्रसिद्ध किसान नेता स्व. महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा चलाये गए किसान आंदोलन की वीरेंद्र सेंगर द्वारा की गई रिपोर्टिंग को मील का पत्थर माना जाता है। इसी तरह उन्होंने गुजरात दंगों पर भी बेहतरीन रिपोर्टिंग की थी। वीरेंद्र सेंगर द्वारा लिखी गई दो पुस्तकों सच के सिवाय व आगे और आग विमोचन के अवसर पर उनकी पत्नी रीता भदौरिया, बेटी ऋतंभरा, आलोक भदौरिया, संतोष भारतीय, विनोद अग्निहोत्री, के एम सिंह, धर्मपाल धनखड़, अमरनाथ सिंह, ममता सिंह, अमित नेहरा, अमरेंद्र राय, संजय राय, उमेश जोशी व शिवाजी सरकार आदि अनेक जाने-माने पत्रकारों ने हिस्सा लिया।

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