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‘विपक्ष-मुक्त लोकतंत्र’ की लहर: राजनीतिक परिदृश्य में एक खतरनाक प्रवृत्ति

संजय राय, भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान एक ऐसी भाषा और सोच विकसित होती दिखाई दी है, जिसका मूल उद्देश्य व्यवस्था से विपक्ष की प्रभावी भूमिका को धीरे-धीरे समाप्त करना या कमज़ोर करना प्रतीत होता है। इसकी शुरुआत 2013 में उस समय हुई जब गोवा में भाजपा की बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार अभियान का नेतृत्व सौंपा गया और उन्होंने अपने संबोधन में पहली बार “कांग्रेस-मुक्त भारत” का विचार देश के सामने रखा। उसके बाद वही विचार विभिन्न रूपों, नारों और स्वरूपों में बार-बार दोहराया जाता रहा—कभी “कांग्रेस संस्कृति” को खत्म करने की बात, कभी “पंजा-छोड़ो” अभियान, कभी परिवारवाद और भ्रष्टाचार समाप्त करने के नाम पर विपक्ष को लगातार कटघरे में खड़ा करना। हालाँकि 2024 के चुनावों में कांग्रेस ने 99 सीटों के साथ अपनी उपस्थिति दिखाई, फिर भी विपक्ष को कमजोर करने के राजनीतिक प्रयास रुकते नहीं दिखे। उत्साह से भरी भाजपा अब बिहार की जीत के बाद दिल्ली से लेकर दक्षिण भारत तक विपक्षी दलों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने में जुटी है। इसी बीच प्रधानमंत्री द्वारा सूरत में दिए एक बयान ने राजनीतिक विमर्श को फिर गर्मा दिया। उन्होंने विपक्षी सांसदों—खासतौर पर कांग्रेस के युवा नेताओं—के “करियर” को लेकर चिंता जताई और दावा किया कि उन्हें पार्टी में बोलने तक का अवसर नहीं मिलता। लेकिन इस बयान ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या सत्तापक्ष, जो अपने ही वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर धकेलने का लंबा इतिहास रखता है, सच में विपक्षी नेताओं के भविष्य को लेकर चिंतित हो सकता है? राजनीति के भीतर का विरोधाभास प्रधानमंत्री की यह “चिंता” इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि भाजपा के भीतर ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहाँ वरिष्ठ नेताओं को या तो सक्रिय politics से दूर किया गया या ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया गया जहाँ वे औपचारिक रूप से मौजूद तो रहे, पर प्रभावहीन हो गए। 2002 के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को गुजरात की कुर्सी से हटाना चाहते थे, तब लालकृष्ण आडवाणी वह नेता थे जिन्होंने मोदी का बचाव किया। लेकिन आगे चलकर आडवाणी स्वयं ऐसे “मार्गदर्शन मंडल” में पहुँचा दिए गए, जिसकी कोई वास्तविक भूमिका नहीं थी। मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी में मोदी की उम्मीदवारी के लिए सीट छोड़नी पड़ी, बाद में वे भी इसी मंडल का हिस्सा बन गए। यही तर्क 75 वर्ष की उम्र सीमा पर भी लागू हुआ—लेकिन वही सीमा आज स्वयं मोदी के लिए अप्रासंगिक हो चुकी है। दूसरी ओर 80 वर्ष से अधिक उम्र के कई नेताओं को राज्यपाल या मंत्री बनाया गया। परन्तु सुब्रमण्यम स्वामी, शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं को दरकिनार करने में कोई झिझक नहीं दिखाई गई। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि यदि भाजपा अपने ही वरिष्ठों के राजनीतिक भविष्य की परवाह नहीं करती, तो विपक्ष के करियर को लेकर उसकी “विचारशीलता” कैसे वास्तविक हो सकती है? सत्ता बनाम आवाज़: संसद में क्या होता है? प्रधानमंत्री के इस बयान का एक दूसरा पहलू भी है। वे कहते हैं कि विपक्षी सांसदों को बोलने नहीं दिया जाता—पर देश ने कई बार यह भी देखा है कि जब विपक्ष सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष के व्यवधानों के कारण बहस अधूरी रह जाती है। जहाँ तक राहुल गांधी का सवाल है—उनका बोलना इसलिए खटकता है क्योंकि वे भ्रष्टाचार, उद्योगपति-पक्षपात, नोटबंदी, जीएसटी, संस्थाओं पर नियंत्रण, चुनावी प्रक्रियाएँ, किसान आंदोलन, जातीय जनगणना और आर्थिक असमानता जैसे विषयों को खुलकर उठाते हैं। यह वे मुद्दे हैं जिनसे सत्ता पक्ष असहज रहता है। और शायद यही वजह है कि राहुल गांधी के खिलाफ लगातार वैचारिक व राजनीतिक मोर्चेबंदी की जा रही है—नवीनतम उदाहरण 272 पूर्व अधिकारियों के हस्ताक्षर वाला वह पत्र है जिसमें राहुल पर “संविधान-विरोधी” टिप्पणियों का आरोप लगाया गया। लेकिन कांग्रेस ने उसी पत्र में शामिल कई अधिकारियों पर गंभीर अनैतिक आचरण और भ्रष्टाचार के आरोप उजागर कर दिए, जिससे इस कथित नैतिक अभियान की विश्वसनीयता स्वयं संदिग्ध हो गई। परिवारवादी राजनीति पर “रणनीतिक हस्तक्षेप” इन दिनों बिहार की राजनीति में भी यही प्रवृत्ति देखी जा रही है। लालू यादव के परिवार में उठे मतभेदों को हवा देने की कोशिशें साफ दिखाई देती हैं। इन प्रयासों के पीछे विपक्ष को कमजोर करने की उसी बड़ी रणनीति का संकेत मिलता है, जिसकी जड़ें 2013 के “कांग्रेस-मुक्त भारत” नारे में ही छिपी हुई हैं। वास्तविक चुनौती: लोकतंत्र को विपक्ष की आवश्यकता है लोकतंत्र की सेहत तभी मजबूत होती है जब उसमें सत्ता का दुरुपयोग न हो और विपक्ष निर्भय होकर सवाल पूछ सके।आज स्थिति उल्टी दिखती है— विपक्षी दलों को कमजोर करने के प्रयास उनके नेताओं को तोड़ने की राजनीति आलोचनाओं को संस्थागत हमलों के रूप में चित्रित करना असहमति को “देश-विरोध” या “अस्थिरता” से जोड़ना ये सब संकेत हैं कि लोकतंत्र को विपक्ष से नहीं, बल्कि विपक्ष-मुक्त वातावरण बनाने की कोशिशों से खतरा है। प्रधानमंत्री द्वारा विपक्षी सांसदों के “राजनीतिक भविष्य” को लेकर जताई गई चिंता न तो स्वाभाविक लगती है और न ही परिस्थितियों से मेल खाती है। यह उन लगातार चल रहे प्रयासों की अगली कड़ी लगती है जो देश के राजनीतिक संतुलन को एक-दलीय प्रभुत्व की ओर ढकेलना चाहते हैं। विपक्ष, चाहे वह कांग्रेस हो, क्षेत्रीय दल हों या कोई अन्य राजनीतिक शक्ति—लोकतंत्र का सुरक्षा कवच होता है।और यही कारण है कि आज असली खतरा किसी एक नेता या दल में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो विपक्ष-मुक्त राजनीति को लोकतंत्र की उपलब्धि मानती है।

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अब शिकायतों पर होगी ईमानदार कार्रवाई तय:महंत मनोज शर्मा

चंडीगढ़( ईशान राय)।विश्व हिंदू परिषद ,चंडीगढ़(पंजाब प्रांत) के पूर्व सोशल मीडिया प्रभारी महंत मनोज शर्मा ने चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 में शामिल करने के केंद्रीय प्रस्ताव का दमदार और ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए जोरदार स्वागत किया है।महंत मनोज शर्मा ने कहा कि लंबे समय से उठाए जा रहे उनके मुद्दों और भेजी गई शिकायतों पर अब निश्चित, पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई होना तय है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस प्रस्ताव ने उनके विश्वास को और अधिक मजबूत कर दिया है कि अब चंडीगढ़ प्रशासन में जवाबदेही से समझौता नहीं होगा।उन्होंने इसे चंडीगढ़ के भविष्य, सुशासन और जनहित के लिए गेम–चेंजर फैसला बताया और कहा कि यह कदम वर्षों से लंबित समस्याओं के समाधान की गति को कई गुना बढ़ा देगा।

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कैलाश जैन ने चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 में शामिल करने के प्रस्ताव का किया स्वागत

संसद में बार-बार मंजूरी की आवश्यकता समाप्त — राष्ट्रपति द्वारा सीधे नियम बनाए जाने से प्रशासन होगा तेज़, सरल और प्रभावी चंडीगढ़, 23 नवम्बर(ईशान राय)।भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष कैलाश चंद जैन ने चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के अंतर्गत लाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक का गर्मजोशी से स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इस सुधार के बाद चंडीगढ़ से संबंधित किसी भी नियम, विनियम, संशोधन या नीति को लागू करने के लिए संसद में बार-बार प्रस्ताव पारित करवाने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। अब राष्ट्रपति सीधे प्रशासनिक नियम बना सकेंगे, जिससे लंबे समय से लंबित कार्य भी समयबद्ध, सरल और शीघ्रता से पूरे हो सकेंगे। यह कदम शहरवासियों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगा। जैन ने कहा कि अनुच्छेद 240 के अंतर्गत बनने वाले प्रशासनिक नियम चंडीगढ़ के शासन को तेज़, सरल, पारदर्शी और अधिक सक्षम बनाएंगे। नगर निगम, प्रशासनिक स्वीकृतियों और नागरिक सेवाओं से जुड़ी प्रक्रियाएँ अब अधिक प्रभावी एवं समयबद्ध रूप से पूरी की जा सकेंगी, जिससे आम नागरिकों को प्रत्यक्ष सुविधा मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह संशोधन चंडीगढ़ की विकास परियोजनाओं में नई गति और अनुशासन लाएगा। प्रशासनिक ढाँचा, शासन गतिविधियाँ, गुड गवर्नेंस, स्मार्ट सिटी कार्यक्रम, जनहित से जुड़ी आवश्यक माँगों तथा अन्य नागरिक सुविधाओं से संबंधित योजनाओं में अनावश्यक देरी में कमी आएगी। इससे शहर को एक आधुनिक, सुव्यवस्थित, कुशल, स्पष्ट और स्थायी प्रशासनिक ढाँचा प्राप्त होगा। जैन ने यह भी कहा कि मज़बूत और स्पष्ट प्रशासनिक संरचना के चलते निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। आईटी, सेवा, शिक्षा, हेल्थकेयर, औद्योगिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में निवेशकों का विश्वास मजबूत होगा, जिससे युवाओं के लिए नए अवसर उपलब्ध होंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह सुधार चंडीगढ़ को एक मॉडल कैपिटल और विश्वस्तरीय स्मार्ट सिटी के रूप में आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करेगा। नागरिकों को बेहतर प्रबंधन, बेहतर सुरक्षा और बेहतर सुविधाएँ प्राप्त होंगी। अंत में कैलाश चंद जैन ने कहा कि यह प्रस्ताव चंडीगढ़ के भविष्य को नई दिशा देने वाला तथा जनहित को सर्वोपरि रखने वाला निर्णय है, जिससे पूरे शहर को दीर्घकालिक, स्थायी और व्यापक लाभ प्राप्त होंगे।

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नवी मुंबई में राशन माफिया पर बड़ी कार्रवाई: 4.69 लाख का अवैध खाद्यान्न बरामद, ट्रक सहित जप्त

नवी मुंबई में राशन माफिया पर बड़ी कार्रवाई: 4.69 लाख का अवैध खाद्यान्न बरामद, ट्रक सहित जप्त ! गरीब का गेहूँ, अमीर का बिरयानी चावल ! मुंबई/नवी मुंबई के महापे में कल रात को ऐसा धमाका हुआ कि लग रहा था कोई बॉलीवुड मूवी की शूटिंग चल रही है , हीरो पुलिस, विलेन राशन माफिया, और बैकग्राउंड में बज रहा गाना “ये देश है वीर जवानों का… और राशन चोर व्यापारियों का।” मेसर्स सिमोज एंटरप्राइजेस नाम की मिल में छापा पड़ा तो मालिक साहब शायद सोच रहे होंगे , “अरे यार, आज तो हम सिर्फ़ गरीबों का हक मारकर अपना हक बना रहे थे, पुलिस को क्या तकलीफ़ हो गई!” पुलिस ने देखा तो वहाँ टाटा इंट्रा ट्रक खड़ा था, जैसे कोई ईमानदार टैक्सी वाला लाइन में लगा हो। अंदर! पूरा ट्रक गेहूँ-चावल से भरा हुआ। मतलब साहब लोग गरीबों का राशन लेकर बिरयानी बनाने की तैयारी कर रहे थे!3520 किलो खाद्यान्न + एक ट्रक = कुल कीमत 4 लाख 69 हज़ार 213 रुपये। अब ये 213 रुपये अलग से क्यों जोड़े गए, ये तो वही बता सकते हैं जिन्होंने हिसाब किया। शायद वो बोरे में चिपके आखिरी तीन दाने भी तौल लिए होंगे, सरकारी ईमानदारी जो ठहरी!अधिकारी महोदय तो बड़म-बम हुए जा रहे हैं।मा. श्री चंद्रकांत डांगे साहब (भा.प्र.से.) ने शायद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा होगा, “हमने गरीबों का हक बचाया है।” अरे सर, आपने तो सिर्फ़ 3520 किलो बचाया, बाकी 35,20,000 किलो कहाँ जा रहा है रोज़, उसकी भी कोई जाँच कर लो ना! वरना अगली बार ये माफिया वाला ट्रक नहीं, कंटेनर लेकर आएगा, फिर आपकी गाड़ी छोटी पड़ जाएगी।सबसे मज़े की बात , ये जो राशन था ना, वो गरीबों को 2-3 रुपये किलो मिलना था। इन्होंने 30-40 रुपये किलो में बेचने की तैयारी कर रखी थी। यानी सीधा-सीधा 10-15 गुना मुनाफ़ा। भाई, शेयर मार्केट भी शर्मा जाए इतना रिटर्न देखकर!अब अगला प्लान क्या होगा। जो ट्रक पकड़ा है ना, उसपे लिख देंगे ,“गरीब का राशन, गरीब तक” और उसे हर राशन दुकान के बाहर खड़ा कर देंगे। जो दुकानदार फिर भी कालाबाजार करे, उसकी दुकान में यही ट्रक घुसा देंगे। फिर देखते हैं कौन हिम्मत करता है!फिलहाल तो बस यही कहूँगा ज़जय जवान, जय किसान, जय शिधावाटप अधिकारी… और बाकी सबको सावधान! अबकी बार अगर राशन चोरी करते पकड़े गए, तो सीधा जेल नहीं, सीधा “राशन वितरण केंद्र” में ड्यूटी लगा दी जाएगी, खुद 2 रुपये किलो बाँटते फिरना, 5 साल तक।बस इतना ही। बाकी आप अपना राशन कार्ड संभाल के रखिए, वरना कोई सिमोज एंटरप्राइजेस वाला आकर कहेगा, “भाईसाब, आपका गेहूँ हमारी बिरयानी में बहुत अच्छा लगेगा! -Indra Yadav / Ishan Times Group

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मुंबई में बदमाशों ने दिनदहाड़े मारी गोली

मुंबई के चारकोप में दिनदहाड़े गोलीबारी ! कानून-व्यवस्था की खुली पोल! पीड़ित खून से लथपथ सड़क पर गिर पड़ा ! मुंबई ! दुनिया की आर्थिक राजधानी, सपनों का शहर, “सुरक्षित महानगर” कहलाने वाला मुंबई एक बार फिर अपराधियों के हौसले की शिकार बन गया। कांदिवली पूर्व के चारकोप सेक्टर-4 में दोपहर के उजाले में बाइक सवार दो बदमाशों ने एक व्यक्ति पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। पीड़ित खून से लथपथ सड़क पर गिर पड़ा, आसपास के लोग सहम गए, लेकिन बदमाश बेधड़क भाग निकले। पूरा वाकया सीसीटीवी में कैद हो गया और सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। यह कोई पहली घटना नहीं है, पर हर बार की तरह यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है , आखिर मुंबई पुलिस सोई हुई है या अपराधियों को खुली छूट दे दी गई है! दिन के 2-3 बजे, जब सड़कों पर आम लोग, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग आते-जाते हैं, उस वक्त भी बदमाशों को इतना हौसला कि वे बिना मास्क, बिना नंबर प्लेट की बाइक पर आते हैं, गोली चलाते हैं और चले जाते हैं ,यह सिर्फ आपराधिक मानसिकता नहीं, पुलिसिंग की भयंकर नाकामी का प्रमाण है। पिछले कुछ महीनों में मुंबई और उपनगरों में गोलीबारी की दर्जनों घटनाएं हो चुकी हैं , बोरिवली, दहिसर, मलाड, गोरेगांव, कांदिवली… कहीं रंगदारी, कहीं पुरानी रंजिश, कहीं गैंगवार। हर बार पुलिस कहती है “हम जांच कर रहे हैं, जल्द पकड़ लेंगे”। पर बदमाश पकड़े भी जाते हैं तो जमानत पर बाहर आ जाते है। यह सिलसिला कब थमेगा! मुंबई पुलिस के पास दुनिया का सबसे बड़ा पुलिस बल है, हजारों सीसीटीवी कैमरे हैं, हाई-टेक कंट्रोल रूम हैं, फिर भी अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं। इसका सीधा कारण है राजनीतिक संरक्षण और पुलिस-गैंगस्टर नेक्सस। कई गैंग्स के सरगना आज भी जेल से बाहर धंधा चला रहे हैं या जमानत पर घूम रहे हैं। अवैध हथियारों की सप्लाई रुकने का नाम नहीं ले रही। स्थानीय पुलिस स्टेशन स्तर पर खुफिया तंत्र नाममात्र को रह गया है। नाकाबंदी, गश्त, बीट मार्शल सिस्टम ,सब कागजों में हैं, धरातल पर नजर नहीं आते। सवाल सिर्फ पुलिस का नहीं, हमारी पूरी व्यवस्था का है। जब तक अपराधियों को त्वरित और कड़ी सजा नहीं मिलेगी, जब तक गैंगस्टरों को राजनीतिक पार्टियों का खुला संरक्षण मिलता रहेगा, जब तक अवैध हथियार और ड्रग्स का कारोबार फलता-फूलता रहेगा, तब तक ऐसे दिनदहाड़े हमले होते रहेंगे। आम मुंबईकर, जो सुबह घर से निकलता है और शाम को सकुशल लौटना चाहता है, उसकी जान सस्ती हो गई है।मुंबई की जनता अब थक चुकी है। हर घटना के बाद मोमबत्ती मार्च, सोशल मीडिया पर आक्रोश और फिर भूल जाना – यह चक्र बंद होना चाहिए। जरूरत है सख्त कानून की, तेज जांच की, और सबसे ऊपर राजनीतिक इच्छाशक्ति की। अगर महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस अभी नहीं चेती, तो आने वाले दिनों में चारकोप की यह घटना सिर्फ एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगी।क्या हम इंतजार करेंगे अगली गोली का, या अब आवाज उठाएंगे!आम मुंबईकर की सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं। वक्त है कि सरकार और पुलिस महकमे इसे गंभीरता से लें, वरना “सपनों का शहर” धीरे-धीरे “डर का शहर” बनता चला जाएगा।

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अम्बरनाथ तेज रफ्तार कार ने कई बाईकों को मारी टक्कर दो मरे कई घायल

अंबरनाथ में पुल पर भीषण सड़क हादसा ! तेज रफ्तार कार ने कई बाइकों को मारी टक्कर, 2 की मौत, कई घायल ! महाराष्ट्र/ ठाणे जिले के अंबरनाथ में शुक्रवार देर रात एक दिल दहला देने वाला सड़क हादसा हुआ। अंबरनाथ पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाले पुल पर गलत दिशा (wrong side) से आ रही एक तेज रफ्तार कार ने कई दोपहिया वाहनों को जोरदार टक्कर मार दी। हादसे में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुल पर लगा सीसीटीवी कैमरा पूरी घटना कैद कर लिया। फुटेज में साफ दिख रहा है कि कार किस तरह उल्टी दिशा से आकर एक के बाद एक कई बाइकों को रौंदती चली गई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि कुछ बाइक सवार दूर जा गिरे और मौके पर ही दम तोड़ दिया। हादसे की सूचना मिलते ही अंबरनाथ पुलिस और दमकल विभाग की टीमें मौके पर पहुंचीं और राहत-बचाव कार्य शुरू किया। पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और कार चालक के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।स्थानीय लोगों में इस हादसे को लेकर काफी आक्रोश है। उनका कहना है कि इस पुल पर अक्सर गलत दिशा से वाहन चलाने वालों की वजह से हादसे होते रहते हैं, लेकिन प्रशासन कोई स्थायी समाधान नहीं कर रहा। फिलहाल पुल पर यातायात कुछ देर के लिए रोक दिया गया है और वैकल्पिक मार्ग से वाहनों को निकाला जा रहा है। पुलिस आगे की जांच कर रही है।

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बच्चा माँ की लाश के पास रोता रहा !प्रेमी ने कर दी हत्या

प्यार का लेटेस्ट ऑफर ! शादी फ्री, जान एक्स्ट्रा चार्ज ! बच्चा माँ की लाश के पास रोता रहा ! उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में एक और “लव स्टोरी” का दर्दनाक अंत हो गया। नाम है प्रीति, उम्र कोई 25-26 साल, पहले से शादीशुदा, दो साल का मासूम बच्चा भी है। लेकिन दिल तो बच्चा है जी, मानता नहीं। दिल ने कहा , “पति से क्या होता है, असली वाला तो दिलीप भैया हैं।” दिलीप कुमार अग्रहरि, 37 साल के परिपक्व प्रेमी, जो शायद अभी तक “सेटल” होने की उम्र में भी सेटल नहीं होना चाहते थे। प्रीति गर्भवती थीं। अब गर्भवती औरत का दिमाग तो आप जानते ही हैं , या तो आइसक्रीम खाने का मन करता है, या शादी करने का। प्रीति का नंबर दूसरा आया। उन्होंने दिलीप भैया को अल्टीमेटम दे दिया , “शादी करो वरना…”। दिलीप भैया के लिए ये “वरना” सुनना बहुत भारी पड़ गया। वो बोले, “अरे बहन जी (या जो भी संबोधन चलता हो), शादी क्यों! हम तो ऐसे ही अच्छे हैं ना! बच्चा भी हो जाएगा, नाम मेरा डाल देना।” लेकिन प्रीति जी नहीं मानीं। उन्होंने दबाव बढ़ाया। अब दबाव जब प्रेमी पर पड़ता है, तो दो रास्ते होते हैं , या तो हार मानकर घोड़ी चढ़ जाओ, या फिर… चाकू चढ़ा दो। दिलीप भैया ने दूसरा वाला सस्ता और स्थायी विकल्प चुना। फोन किया , “आजो प्रीति, आज भाग चलते हैं, शादी कर लेते हैं।” प्रीति खुशी-खुशी दो साल के बच्चे को गोद में लेकर निकल पड़ीं। सपनों में शायद लाल जोड़े और बैंड-बाजा चल रहा था। पहुँची तो दिलीप भैया ने बड़े प्यार से गले लगाया… फिर चाकू। एक, दो, तीन… जितने लगे, लगते रहे। प्रीति मौके पर ही “हमेशा के लिए दिलीप की” हो गईं। बच्चा माँ की लाश के पास रोता रहा। पुलिस आई, दिलीप भागे, अब तक पकड़े नहीं गए हैं। कहते हैं कहीं नया ठिकाना और नया नकली प्रोफाइल बना रहे हैं। अब समाज के ठेकेदारों की बारी। वो चिल्ला रहे हैं , “देखा! इसलिए लड़कियों को पढ़ाओ-लिखाओ नहीं, शादी के बाद भी प्रेम प्रसंग करेंगी तो यही होगा।” वो भूल गए कि प्रीति को मारने वाला कोई अनपढ़ गुंडा नहीं, 37 साल का “परिपक्व” पुरुष था। वो ये भी भूल गए कि शादी का वादा करके औरत को बुलाना और फिर चाकू घोंप देना, ये कोई “परंपरा” नहीं, कातिलाना मानसिकता है। हमारा समाज बड़ा अजीब है साहब। लड़की अगर अविवाहित प्रेमी के साथ भाग जाए तो “बदचलन”, शादीशुदा होकर भी प्रेम करे तो “चरित्रहीन”, और अगर प्रेमी उसकी हत्या कर दे तो… “लड़की ने दबाव डाला था, उसकी भी गलती है।” यानी औरत चाहे जो करे, अंत में दोष उसका।दिलीप जैसे “आशिक” हमारे यहाँ कम नहीं।वो शादी का लालच देकर सालों संबंध रखते हैं, बच्चे तक पैदा कर लेते हैं, लेकिन जैसे ही जिम्मेदारी की बात आती है , “भाई हम तो मजाक कर रहे थे।” और जब मजाक का खुलासा होता है तो चाकू निकाल लेते हैं। क्योंकि उनके लिए औरत की जान से बड़ी उनकी “आजादी” है। आजादी समझिए , बिना जिम्मेदारी के सेक्स करने की, बिना पापा बने बच्चे पैदा करने की, और जरूरत पड़े तो बिना सजा भुगते हत्या करने की।सबसे बड़ी विडंबना ये कि दो साल का बच्चा अब अनाथ हो गया। माँ मर गई क्योंकि वो माँ बनना चाहती थी। और जिसने माँ बनाया, वही कातिल बन गया। हमारे यहाँ “प्यार” का मतलब ही बदल गया है ,प्यार अब वो नहीं जो जीवन देता है, प्यार वो है जो वादे करता है, इस्तेमाल करता है, और अंत में जान ले लेता है।और समाज! समाज तमाशा देख रहा है। कभी लव जिहाद के नाम पर, कभी ऑनर किलिंग के नाम पर, कभी “उसने दबाव डाला था” के नाम पर। प्रीति अब नहीं है। उसका दो साल का बच्चा जब बड़ा होगा तो पूछेगा ,“मम्मी को किसने मारा?”हम क्या जवाब देंगे! “बेटा, तेरी मम्मी ने शादी माँगी थी… इसलिए मर गई।”बस यही है हमारा “सुसंस्कृत” समाज।जहाँ औरत की सबसे बड़ी गलती ये है कि वो अपने बच्चे के लिए एक पिता चाहती है। और पुरुष की सबसे बड़ी कला ये है कि वो पिता बने बिना भी बच्चे पैदा कर सकता है… और माँ को मारकर भी बच सकता है।

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पंचकूला पुलिस ने टैक्सी लूटकर हिमाचल में हत्या करने जा रहे तीन गैंगस्टर गिरफ्तार

पंचकूला में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए टैक्सी लूटकर हिमाचल प्रदेश में हत्या करने जा रहे तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया पंचकूला (संजय राय,ईशान टाइम्स)।पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए टैक्सी लूटकर हिमाचल प्रदेश में हत्या करने जा रहे तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से दो कंट्री मेड पिस्टल और छह जिंदा कारतूस बरामद किए हैं। आरोपियों को अदालत में पेश कर रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी। डीसीपी क्राइम ब्रांच मनप्रीत कुमार सूदन के अनुसार, 19 नवंबर की सुबह करीब साढ़े पांच बजे बदमाशों ने पंजाब के मोहाली जिले के खरड़ से इन-ड्राइव ऐप के जरिए पंचकूला के रामगढ़ के लिए टैक्सी बुक की। रामगढ़ पहुंचने पर आरोपियों ने सुनसान जगह पर ड्राइवर को पिस्टल दिखाकर कार से उतार दिया और टैक्सी लेकर फरार हो गए। सूचना मिलते ही पंचकूला क्राइम ब्रांच की टीमें सक्रिय हुईं और हिमाचल प्रदेश के पोंटा साहिब निवासी तीन आरोपियों — रोहित धीमान, सतबीर और बिट्टू ठाकुर — को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान रोहित धीमान ने कार को यमुनानगर के किशनगढ़ गांव से बरामद करवाया। बिट्टू ठाकुर ने कार के डैशबोर्ड से एक पिस्टल और चार कारतूस, जबकि सतबीर ने अपने घर से एक पिस्टल और दो कारतूस बरामद करवाए।पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी पोंटा साहिब में ऋषभ नामक युवक की हत्या करने की योजना बना रहे थे

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विदाई से पहले दुल्हन गायब !

उत्तर प्रदेश ! बाराबंकी में एक और शादी का सीजन हिट हो गया, लेकिन इस बार हीरोइन ने क्लाइमेक्स से पहले ही फिल्म छोड़ दी। जयमाला हो गई, सात फेरे पूरे हो गए, मांग में सिंदूर भर दिया गया, साली ने जूते भी चुरा लिए (जो बाद में नीलाम होने थे), पर जैसे ही विदाई का सीन आया, दुल्हन “पता नहीं कहाँ गायब” हो गई। बारात बिना दुल्हन लौट आई। दूल्हा सुशील बेचारा आज भी डायल-112 को फोन मिलाता रहता है कि “मैडम जी, दुल्हन ढूँढ दो, तीन बीघा जमीन तो गिरवी रखवा दी।”अब दूल्हे का दर्द सुनिए, पूरा इंटरव्यू वायरल हो रहा है ! “जयमाला हुई, फेरे हुए। साली ने जूते चुरा लिए। कार ड्राइवर चिल्लाया , ‘जल्दी विदाई करो साहब, दूसरी बुकिंग है, लखनऊ में एक और दुल्हन भागने वाली है।’ हम इंतजार करते रहे। दुल्हन नहीं आई। फिर हमने डायल-112 कर दिया। पुलिस वाला बोला , ‘भाई साहब, दुल्हन भागी है या आपसे डर गई है?’ मैंने कहा , ‘देख लो, मैं तो अभी भी कुर्ता-पायजामा में खड़ा हूँ, दहेज भी नहीं माँगा!’” ये सुनकर पुलिसवाला भी हँस पड़ा और बोला, “अरे सुशील भैया, दहेज न माँगने की सजा तो मिलनी ही थी!” ! अब सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आई हुई है एक मीम में लिखा है: “दुल्हन भाग गई क्योंकि दूल्हा Reel नहीं बना रहा था।” दूसरा, “साली ने जूते चुराए, दुल्हन ने दूल्हा चुरा लिया।”तीसरा सबसे खतरनाक: “तीन बीघा जमीन गिरवी रखी, दुल्हन बोली , ‘भाई, तीन बीघा में शादी नहीं, फार्महाउस चाहिए!’” लोग पूछ रहे हैं कि आखिर दुल्हन गई कहाँ! दुल्हन को विदाई के समय अचानक याद आया कि उसने UPSC प्री भर रखा है, इसलिए सीधा दिल्ली भाग गई। साली ने जूते चुराने के चक्कर में दुल्हन को भी उठा लिया, दोनों मिलकर दुबई घूमने निकल गईं।सबसे मशहूर थ्योरी: दुल्हन ने दूल्हे का फेसबुक प्रोफाइल चेक किया, 2014 से एक भी पोस्ट नहीं। बोली, “इतना बोरिंग आदमी नहीं रहना!”दूल्हा सुशील अब गाँव में घूम-घूम कर कह रहा है, “अबकी बार जो दुल्हन लाऊँगा, पहले उससे पूछूँगा , ‘भागने का इरादा तो नहीं न?’”और हाँ, डीजे वाला अभी भी बिल 25,000 बाकी मांग रहा है। बोला, “दुल्हन नहीं नाची, पैसा तो बनता है भाई!”मैं तो कहता हूं की शादी से पहले दुल्हन का इंस्टाग्राम चेक कर लो, फेसबुक नहीं। और हाँ, विदाई से पहले गाड़ी की डिग्गी में एक रस्सी रख लिया करो, कभी काम आ जाए। बारातियों ने अंत में कहा, “यार सुशील, अगली शादी में हम ड्र नहीं आएँगे।” सुशील बोला, “कोई बात नहीं, अगली बार मैं खुद भाग जाऊँगा। कम से कम खाना तो खा लूँगा!”उत्तर प्रदेश ,जहाँ प्यार भी भागता है, दुल्हन भी भागती है, और बाराती हमेशा भूखे रह जाते हैं। जय हो इंद्र देवता!

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मुंबई में भाषा की मार ! अर्णव की आत्महत्या और हमारी सामूहिक शर्म !

मुंबई में भाषा की मार ! अर्णव की आत्महत्या और हमारी सामूहिक शर्म ! यहाँ मराठी में ही बोलना पड़ेगा ! कल्याण से आई खबर ने दिल को चीर दिया। अर्णव खैरे। उम्र महज बीस के आसपास। कॉलेज का छात्र। सुबह की लोकल ट्रेन में कॉलेज जा रहा था। धक्का लगा। उसने हिंदी में कहा “भाई, थोड़ा आगे हो जाओ।” बस इतनी-सी बात। फिर शुरू हुआ तमाशा। “मराठी बोल ना!” “यहाँ मराठी में ही बोलना पड़ेगा!” थप्पड़। मुक्के। धक्के। चार-पाँच लोग। बाकी यात्री तमाशबीन। अर्णव डर गया। मुलुंड की बजाय ठाणे में उतरकर भागा। घर पहुँचा तो रोते-रोते पापा को बताया। और रात में… फाँसी का फंदा। एक जवान लड़का, जिसका अभी-अभी जीवन शुरू हुआ था, हमारी भाषाई कट्टरता की भेंट चढ़ गया। हम क्या बनते जा रहे हैं! मुंबई। दुनिया का सबसे बड़ा महानगर। यहाँ हर कोने से लोग आते हैं। बिहार से, उत्तर प्रदेश से, गुजरात से, केरल से, तमिलनाडु से, बंगाल से। सबके सपने एक जैसे ,दो वक्त की रोटी, बच्चों का भविष्य, थोड़ी-सी खुशी। हम कहते हैं , मुंबई हमारी है। हाँ, मुंबई मराठी लोगों की भी है। पर क्या सिर्फ मराठी लोगों की है! जो मराठी बोलता है, उसका खून लाल है।जो हिंदी बोलता है, उसका खून लाल है। जो तमिल, तेलुगु, भोजपुरी, मलयालम बोलता है , सबका खून एक ही रंग का है।फिर हम एक-दूसरे को मार क्यों रहे हैं! अर्णव को पीटा गया क्योंकि उसने हिंदी बोली। कल को किसी और को पीटेंगे क्योंकि उसने मराठी नहीं बोली। परसों किसी को मारेंगे क्योंकि वह गुजराती बोल रहा था। और जब सब मर जाएँगे, तब बचेगा कौन जो बोले ,“मुंबई हमारी है”! हम भाषा को हथियार बना रहे हैं।भाषा जो जोड़ने के लिए होती है, हम उसे तोड़ने का औजार बना रहे हैं। माँ अपने बच्चे को पहली बार जो बोल सिखाती है, वह मराठी हो सकती है, हिंदी हो सकती है, कोई और भी। पर माँ का प्यार एक ही भाषा में बोलता है ,ममता की भाषा में।उसे हम भूल गए। अर्णव के पिता का दर्द सुनकर आँखें भर आती हैं। “मेरा बेटा डर के मारे मुझे बता रहा था… वह आगे ऐसी चीजें नहीं होनी चाहिए…” पर अब क्या होगा! अब अर्णव लौटकर नहीं आएगा। उसकी माँ का आँचल खाली रहेगा।उसके पिता की आँखें हमेशा नम रहेंगी। और हम! हम फिर अगली ट्रेन में किसी और को “भाषा सिखाने” निकल पड़ेंगे ! यह सिर्फ अर्णव की मौत नहीं है। यह हमारी इंसानियत की मौत है।हम माँग करते हैं , भाषाई आधार पर हिंसा को गैर-जमानती अपराध बनाया जाए। लोकल ट्रेनों में सख्त निगरानी हो, ताकि कोई अकेला यात्री असुरक्षित न महसूस करे। स्कूलों-कॉलेजों में बच्चों को सिखाया जाए कि भाषाएँ बाँटने के लिए नहीं, मिलाने के लिए होती हैं।अर्णव, माफ करना। हम तुम्हें बचा न सके। पर तुम्हारी याद में वादा करते हैं ,अबकी बार जब कोई ट्रेन में हिंदी, या गुजराती, या भोजपुरी ,हम चुप नहीं रहेंगे। ,हम खड़े होंगे। और बोलेंगे ,“अर्णव को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। और उसकी आत्मा को शांति।

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