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लिट्टी चोखा ग्रामीण परंपरा का प्रतीक

‘लिट्टी’ गेहूं के ‘आटे’ से बनी होती है, जिसे ‘बैगन’ के भरते के साथ सेंका जाता है, यह ग्रामीण परंपरा का प्रतीक है ! भारत एक ऐसा देश है जहाँ मौसम न केवल प्रकृति को बदलता है, बल्कि लोगों की दिनचर्या, संस्कृति और भोजन को भी गहराई से प्रभावित करता है। ठंड का मौसम,उत्तर में हिमालय की चोटियों पर बर्फबारी से लेकर दक्षिण में हल्की सर्दी तक,भारतीय समाज में एक विशेष उत्साह लाता है। यह मौसम केवल ठिठुरन का नहीं, बल्कि गर्मजोशी, परिवारिक मिलन और पौष्टिक भोजन का प्रतीक है। ठंड में भोजन सिर्फ पेट भरने का माध्यम नहीं रहता; यह स्वास्थ्य की रक्षा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का स्रोत बन जाता है। इस लेख में हम देखेंगे कि ठंड के मौसम में भारतीय भोजन कैसे परंपराओं से जुड़ा है, स्वास्थ्य के लिए क्यों जरूरी है और समाज में कैसे बंधन मजबूत करता है। ठंड में भोजन की आवश्यकता: शरीर और मन की गर्माहट ! ठंड का मौसम शरीर की ऊर्जा खपत बढ़ाता है। वैज्ञानिक रूप से, कम तापमान में शरीर थर्मोजेनेसिस (गर्मी उत्पन्न करने की प्रक्रिया) के लिए अधिक कैलोरी जलाता है। आयुर्वेद में इसे ‘शीत काल’ कहा जाता है, जहाँ वात और कफ दोष बढ़ते हैं, इसलिए गर्म, तैलीय और मसालेदार भोजन की सलाह दी जाती है। भारतीय घरों में यह समझ सहज है,माँ की रसोई से निकलती गाजर का हलवा या सरसों का साग शरीर को ऊर्जा देता है, जबकि ठंडी हवाओं से बचाता है। उत्तर भारत में, जहाँ तापमान शून्य से नीचे चला जाता है, भोजन कैलोरी-घना होता है। पंजाब और हरियाणा में मक्की की रोटी और सरसों का साग एक क्लासिक उदाहरण है। मक्की का आटा ग्लूटेन-फ्री और फाइबर युक्त होता है, जबकि साग में पालक, बथुआ और सरसों की पत्तियाँ विटामिन A, C और आयरन से भरपूर होती हैं। इसे घी में तड़का लगाकर परोसा जाता है, जो ठंड में जोड़ों के दर्द से राहत देता है। राजस्थान की गर्मागर्म दाल बाटी चूरमा या उत्तर प्रदेश की गोंड के लड्डू (ज्वार और गुड़ से बने) ऊर्जा का भंडार हैं। ये व्यंजन न केवल पौष्टिक हैं, बल्कि स्थानीय कृषि पर निर्भर कर पर्यावरण-अनुकूल भी।दक्षिण भारत में ठंड हल्की होती है, लेकिन भोजन की गर्माहट कम नहीं। केरल में अप्पम के साथ मटन स्टू या तमिलनाडु में रसम और इडली सांभर शरीर को गर्म रखते हैं। रसम में काली मिर्च, इमली और धनिया एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं, जो इम्यूनिटी बढ़ाते हैं। पूर्वी भारत में बंगाल की माछेर झोल या बिहार की लिट्टी चोखा ठंड में लोकप्रिय हैं। लिट्टी गेहूं के आटे से बनी होती है, जिसे बैगन के भरते के साथ सेंका जाता है—यह ग्रामीण परंपरा का प्रतीक है। सांस्कृतिक विविधता और मौसमीभारतीय भोजन की खूबसूराई उसकी विविधता में है। ठंड में त्योहार जैसे लोहड़ी, मकर संक्रांति और पोंगल भोजन को केंद्र में लाते हैं। लोहड़ी पर पंजाब में रेवड़ी, मूंगफली और तिल के लड्डू बांटे जाते हैं,ये तिल और गुड़ से बने, शरीर को गर्म रखने वाले स्नैक्स हैं। मकर संक्रांति पर खिचड़ी, तिल-गुड़ की गजक या दक्षिण में पोंगल (चावल और दाल की खीर) बनाई जाती है। ये व्यंजन कृषि चक्र से जुड़े हैं: संक्रांति फसल कटाई का उत्सव है, जहाँ नई फसल का भोजन देवताओं को चढ़ाया जाता है।क्षेत्रीय विविधता आश्चर्यजनक है। हिमाचल में ड्राई फ्रूट्स से भरे सिद्दू (भाप में पकाई रोटी) या गुजरात में उंधियू (सर्दियों की सब्जियों का मिश्रण) ठंड में स्टेपल हैं। उंधियू में सुरती पापड़ी, बैंगन और आलू मूंगफली के तेल में पकाए जाते हैं, जो ओमेगा-3 फैटी एसिड प्रदान करता है। ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट हैं, बल्कि मौसमी सब्जियों का उपयोग कर पोषण संतुलन बनाते हैं! ठंड में भोजन स्वास्थ्य की ढाल है। मसाले जैसे अदरक, लहसुन, हल्दी और दालचीनी एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण रखते हैं। अदरक की चाय या गुड़ की गर्माहट सर्दी-खांसी दूर करती है। गाजर का हलवा विटामिन A से भरपूर होता है, जो आंखों और त्वचा के लिए फायदेमंद है। घी और ड्राई फ्रूट्स फैट-सॉल्युबल विटामिन्स अवशोषित करते हैं, जो ठंड में कमजोर इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं। आधुनिक पोषण विज्ञान भी सहमत है,ठंड में कार्बोहाइड्रेट और फैट की अधिक जरूरत पड़ती है। लेकिन संतुलन जरूरी है,अधिक घी से कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है, इसलिए मॉडरेशन में लें। ग्रामीण क्षेत्रों में ये व्यंजन प्राकृतिक हैं, जबकि शहरी जीवन में फास्ट फूड से दूरी बनानी चाहिए। ठंड का भोजन परिवार को एकजुट करता है। शाम को अलाव के पास बैठकर मूंगफली चबाना या गर्मागर्म जलेबी खाना सामाजिक गतिविधि है। बाजारों में भुने शकरकंद या भुट्टे की खुशबू लोगों को जोड़ती है। गांवों में सामूहिक भोज, जैसे पंजाब की लोहड़ी या दक्षिण का पोंगल, समुदाय को मजबूत बनाते हैं। शहरी अपार्टमेंट्स में भी पड़ोसी गाजर का हलवा बांटते हैं, जो ठंड की उदासी दूर करता है।महिलाएँ रसोई में घंटों बिताती हैं, जो पीढ़ीगत ज्ञान का हस्तांतरण है। दादी की रेसिपी आज भी जीवित हैं। लेकिन आधुनिकता में बदलाव आ रहा है,युवा हेल्दी वर्जन अपनाते हैं, जैसे बेक्ड मक्की की रोटी।चुनौतियाँ और भविष्य!-ठंड में भोजन की पहुंच सभी तक नहीं। गरीब परिवारों में पौष्टिक भोजन सीमित होता है, जबकि जलवायु परिवर्तन से फसल प्रभावित हो रही है। सतत कृषि और सरकारी योजनाएँ जैसे मिड-डे मील में सर्दियों के व्यंजन शामिल करना जरूरी है! ठंड का मौसम भारत में भोजन को एक उत्सव बनाता है,यह शरीर को पोषण, संस्कृति को जीवंत और समाज को एकजुट करता है। सरसों का साग से लेकर तिल के लड्डू तक, ये व्यंजन हमें याद दिलाते हैं कि भोजन सिर्फ भूख नहीं, जीवन का सार है। इस मौसम में एक गर्मागर्म प्लेट उठाएँ, परिवार के साथ बैठें और भारतीय परंपरा की गर्माहट महसूस करें। आखिर, ठंड में सबसे बड़ी गर्मी तो अपनों के साथ बिताए पलों में छिपी होती है।

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घरेलू महिलाओं की सुरक्षा के मायने ! महिलाएं घर-गृहस्थी का आधार स्तम्भ हैं !

भारत ! घर-गृहस्थी को संभालने और सजाने-संवारने से लेकर पत्नी और मां के रूप में महिलाओं के समर्पण भाव का कोई विकल्प नहीं है । पुरुष प्रधान समाज महिलाओं के बिना जीवन जीने का कितना भी दंभ भर लें परन्तु महिलाओं के बिना वह कभी पूर्ण नहीं हो सकता । महिलाएं घर-गृहस्थी का आधार स्तम्भ हैं इनके बिना घर की स्थिति को सुदृढ़ रख पाना मुश्किल है । पति , बच्चों और परिवार के बड़े-बुजुर्गों की सेवा सुश्रुषा करने और हर संभव उन्हें खुशी देने के लिए तत्पर रहने वाली महिलाएं अपने कर्तव्यों में इतनी लीन रहती हैं कि वे खुद अपनी खुशियों को तिलांजलि दे देती हैं । ऊषाकाल से देर रात तक घर के काम-काज में लगी रहने वाली महिलाओं को घर की खुशियों के सामने आराम करना भी मुनासिब नहीं होता और अगर यही महिलाएं नौकरीपेशा हैं तो इनकी ज़िम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं । एक तरफ घर-परिवार की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ नौकरी का संवैधानिक अधिकार , दोनों में तालमेल बैठा कर चलना महिलाओं की अद्भुत क्षमता का परिचायक है । एक तरफ जहां महिलाएं अपने व्यवहार , आचरण और कर्त्तव्यपरायणता से पति , बच्चे और परिवार के सदस्यों का बखूबी ख्याल रखती हैं तो वहीं दूसरी तरफ अपनी क्षमता और कार्यकुशलता से कार्यस्थल पर अपनी निर्धारित लक्ष्य पूरा करती हैं । त्याग और समर्पण की अद्भुत मिसाल कायम करने वाली महिलाओं की नैसर्गिक प्रतिभा का लोहा समाज मानने को मजबूर हो जाता है । यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि घर , समाज और देश की प्रगति निश्चित रूप से बहन-बेटियों और महिलाओं की सम्मान और सुरक्षा पर ही केंद्रित है, इसके साथ-साथ उनके मौलिक अधिकारों का संरक्षण भी सामाजिक परिवर्तन के लिए आवश्यक है । घर-परिवार और समाज के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करने वाली महिलाओं की सामाजिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं है जितनी की वे हकदार हैं । घर-परिवार के लिए खुद को समर्पित करने वाली महिलाओं को हर समय उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है, उन्हें अपनी मान-मर्यादा और सुरक्षा के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है । जिस पति और परिवार को खुशियां देकर उन्हें प्रसन्न रखती हैं, वहां भी उन्हें प्रताड़ित और तिरस्कृत किया जाता है । भारत में घरेलू हिंसा का ग्राफ कुछ ज्यादा ही है । किसी महिला का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक, मनोवैज्ञानिक या यौन शोषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना जिसके साथ महिला के पारिवारिक रिश्ते हैं, घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है । यह हिंसा और दुर्व्यवहार के अन्य रूपों के माध्यम से एक रिश्ते में नियंत्रण और भय की स्थापना करता है। यह हिंसा शारीरिक हमला, मनोवैज्ञानिक शोषण, सामाजिक शोषण, वित्तीय शोषण या यौन हमला का रूप ले सकती है । घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानूनी परिभाषाएं निर्धारित की गई हैं । “घरेलू हिंसा के विरुद्ध महिला संरक्षण अधिनियम की धारा, 2005” के अनुसार, “प्रतिवादी का कोई अनैतिक व्यवहार, भूल या किसी और को काम करने के लिए नियुक्त करना, घरेलू हिंसा में माना जाएगा। “विभिन्न कानूनी धाराओं के अनुसार घरेलू हिंसा अलग-अलग समूहों में परिभाषित किया गया है । घरेलू महिला को क्षति पहुँचाना या जख्मी करना या पीड़ित को स्वास्थ्य, जीवन, अंगों या हित को मानसिक या शारीरिक तौर से खतरे में डालना या ऐसा करने की नीयत रखना और इसमें शारीरिक, यौनिक, मौखिक और भावनात्मक और आर्थिक शोषण शामिल है, दहेज या अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध मांग को पूरा करने के लिए महिला या उसके रिश्तेदारों को मजबूर करने के लिए यातना देना, नुकसान पहुँचाना या जान जोखिम में डालना, पीड़ित या उसके निकट‌ सम्बन्धियों को धमकी देना, पीड़ित को शारीरिक या मानसिक तौर पर घायल करना इत्यादि घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है । सुरक्षा की दृष्टि से नौकरीपेशा महिलाओं की कार्यस्थल पर सुरक्षा के लिए “कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडन के विरुद्ध अधिनियम” (द सेक्‍सुअल हैरेसमेंट ऑफ विमेन एट वर्कप्‍लेस‌-2013) घरेलू हिंसा अधिनियम (प्रोटेक्‍शन ऑफ विमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस 2005) हिंदू उत्‍तराधिकार कानून 2005 और दहेज प्रथा निवारण कानून (डाउरी प्रॉहिबिशन एक्ट 1961)‌ आदि कानून भी लागू किया गया है । महिलाओं के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों के बारे में ‘थॉमसन ​रॉयटर्स फाउंडेशन’ के वार्षिक सर्वेक्षण में भारत को पहला दर्जा दिया गया है। जिन मामलों पर विचार किया गया, उनमें यौन हिंसा की श्रेणी में भारत ने सबसे बदहाल देशों में पहले स्थान पर है। गैर-यौन हिंसा की श्रेणी में भारत 10 शीर्ष देशों में तीसरे स्थान पर रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा राष्ट्रीय महिला आयोग और भारत के अनेक विशेषज्ञों ने इस सर्वेक्षण के नतीजों को पक्षपातपूर्ण करार दे कर नकार दिया है , लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा देश की बड़ी समस्याओं में से एक है, जिसका तत्काल हल खोजना अत्यंत आवश्यक है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति की समीक्षा करने वाले लोगों को जागरूक होकर महिलाओं की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। परिवार की मजबूती के लिए जिस आधार स्तम्भ की जरूरत होती है वह और कोई नहीं बल्कि घर देवियां ही हैं । पति के साथ सात फेरे लेकर सात जन्मों तक का साथ निभाने का वचन लेने वाली महिलाएं निश्चित रूप उचित प्यार और सम्मान का हकदार हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व पति, परिवार और समाज पर समान रूप से है ।‌ हालांकि महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कानूनी सलाह और सहयोग का भी प्रावधान है । पीड़ित कानून के तहत किसी भी राहत के लिए पीड़ित संरक्षण अधिकारी से संपर्क कर सकती हैं और निशुल्क क़ानूनी सहायता की मांग कर सकती हैं।‌ पीड़ित भारतीय दंड संहिता के तहत क्रिमिनल याचिका भी दाखिल कर सकती है, इसके तहत प्रतिवादी को तीन साल तक की जेल हो सकती है, इसके लिए पीड़ित को गंभीर शोषण सिद्ध करने की आवश्यकता है lयहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जीवन की गाड़ी के दो पहिए पति-पत्नी को घर- गृहस्थी सजाने-संवारने में ऐसा क्या मतभेद हो जाता है कि उन्हें कानून की शरण में जाना पड़ता है ? यह व्यावहारिक चिंतन और ज्ञान टिकी एक ऐसी स्थिति है जिसे आपसी विचार-विमर्श

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रिपोर्ट दर्ज करवाने को 50हजार दिए ,नहीं दर्ज हुई तो मां झूली फंदे से

मुंबई। सोचिए, एक मां का दिल कितना मजबूत होता है। वह नन्हीं उंगलियों को पकड़कर चलना सिखाती है, रात-रात भर जागकर बीमार बच्चे की सेवा करती है, और हर दुख में खुद को पीछे छोड़कर परिवार को संभालती है। लेकिन जब वही मां अपने घर की चारदीवारी में साड़ी का फंदा गले में डालकर झूलती मिले, तो क्या कहें! यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि समाज की उस क्रूर उदासीनता की चीख है, जो मां-बेटी के रिश्ते को, परिवार की गरिमा को, और इंसानी संवेदना को कुचलती चली जा रही है। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में घटी रेखा जाधव की यह दर्दनाक कहानी हमें झकझोरकर पूछती है, क्या हमारा समाज इतना पत्थर दिल हो चुका है कि एक मां की मौत भी हमें नहीं जगाती ! रेखा जाधव, 50 साल की उस साधारण महिला की जिंदगी, जो राम मंदिर इलाके में रहती थीं, अचानक एक त्रासदी बन गई। उनकी 20 साल की बेटी पूजा, जिसकी पहली शादी तीन साल पहले टूट चुकी थी, फिर दूसरी शादी के बाद भी पुराने प्रेमी के जाल में फंस गई। आठ दिन पहले पूजा प्रेमी के साथ भाग गई। मां ने तुरंत पुलिस थाने का रुख किया, गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने। लेकिन क्या हुआ! पुलिस ने न सिर्फ शिकायत ठुकरा दी, बल्कि 50,000 रुपये मांगा। यह आरोप कितना भयावह है! एक मां, जो अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए रोती-बिलखती थाने पहुंची, उसे पैसे की भेंट चढ़ानी पड़ी। मानसिक रूप से टूटकर रेखा ने घर लौटकर फांसी लगा ली। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। और फिर, गुस्साए परिजनों ने शव को कंधे पर उठाकर सीधे उस्मानपुरा थाने पहुंचा दिया। हंगामा हुआ, पुलिस ने अंत में प्रेमी वैभव बोर्डे और उसके परिवार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज किया। लेकिन क्या यह देर से आई न्याय की जीत है, या सिर्फ एक औपचारिकता! यह घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि हमारे पूरे समाज की विफलता है। सबसे पहले, पुलिस की लापरवाही। क्या थाने अब न्याय के मंदिर नहीं, बल्कि सौदेबाजी की दुकान बन गए हैं! एक मां की पुकार को पैसे से तौलना कितना शर्मनाक है! अगर समय पर कार्रवाई होती, तो शायद पूजा लौट आती, और रेखा का दिल न टूटता। लेकिन नहीं, भ्रष्टाचार की यह जड़ इतनी गहरी है कि वह मांओं की आंसुओं को भी नहीं पिघला पाती। दूसरा, प्रेम और विवाह का यह जटिल जाल। पूजा की कहानी बताती है कि कैसे युवा पीढ़ी प्रेम के नाम पर परिवार की मर्यादा भूल जाती है। पहली शादी टूटने के बाद दूसरी शादी, फिर भी पुराना प्रेमी। यह सिर्फ व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि समाज में बढ़ते विवाहेतर संबंधों की महामारी है। हम बच्चों को संस्कार देते हैं, लेकिन सोशल मीडिया और आधुनिकता के नाम पर उन्हें स्वच्छंद छोड़ देते हैं। प्रेमी वैभव और उसका परिवार क्या वे नहीं जानते कि उनकी हरकतें एक मां की जान ले सकती हैं! सबसे दर्दनाक है मां-बेटी का रिश्ता। रेखा ने अपनी बेटी के लिए दो शादियां कीं, तलाक के दाग को मिटाने की कोशिश की, लेकिन बेटी की जिद ने सब कुछ तबाह कर दिया। क्या बेटियां नहीं समझतीं कि मां का दिल कितना नाजुक होता है! वह मां, जो खुद भूखी रहकर बेटी को खिलाती है, उसी की वजह से फंदे पर झूल गई। यह दर्द हमें याद दिलाता है कि परिवार की नींव मां पर टिकी होती है। अगर बेटी भागती है, तो समाज उसे ‘आधुनिक’ कहकर ताली पीटता है, लेकिन मां की मौत पर चुप्पी साध लेता है। पड़ोसी, रिश्तेदार,सब थाने के बाहर जमा हुए, लेकिन पहले क्यों नहीं बोले! क्यों नहीं बेटी को समझाया, मां को संभाला! यह घटना सामाजिक कुरीतियों की एक लंबी श्रृंखला है। अंतरजातीय या विवाहेतर प्रेम के नाम पर भागने की घटनाएं बढ़ रही हैं, और हर बार परिवार टूटता है। पुलिस सुधार की जरूरत है,तुरंत शिकायत दर्ज हो, बिना पैसे के कार्रवाई हो। युवाओं को शिक्षा दें कि प्रेम जिम्मेदारी मांगता है, न कि भागना। परिवारों में संवाद बढ़ाएं, ताकि बेटियां अपनी बात कह सकें, बिना घर छोड़े। और सबसे जरूरी, मां की भावनाओं का सम्मान। एक मां की मौत हमें सिखाती है कि समाज को संवेदनशील बनना होगा। रेखा जाधव अब नहीं हैं, लेकिन उनकी चीख गूंज रही है। क्या हम सुनेंगे! या फिर अगली मां का फंदा देखकर ही जागेंगे! यह समय है बदलाव का,पुलिस में ईमानदारी, युवाओं में जिम्मेदारी, और समाज में संवेदना। नहीं तो, हर घर में एक रेखा की छाया लटकती रहेगी। हे समाज, जागो! एक मां की आहें व्यर्थ न जाएं।

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SP ऑफिस का एकाउंटेंट रिश्वत लेते गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश शशशश…“पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त…मगर ये तो असली वाला ड्रामा है, भाई! फर्रुखाबाद की कोतवाली फतेहगढ़ में एक सिपाही ने शिकायत की, और लखनऊ से एंटीकरप्शन की टीम हेलिकॉप्टर नहीं, पर स्कॉर्पियो में धड़धड़ाती हुई आई , सीधे पकड़ लिया SP ऑफिस के अकाउंटेंट हरेन्द्र सिंह चौहान को!हीरो बना सिपाही, विलेन गिरफ्तार!अरे, ये तो पूरा मुंबईया मसाला है ,बैठा अकाउंटेंट साहब, पुलिसवालों से ही रिश्वत ले रहा था! मतलब, “अपनों का खून चूसने वाला ड्रैकुला भी शरमा जाए!” सिपाही ने कहा “साब, मेरी तनख्वाह में से भी कटौती हो रही थी!” और बस, एंटीकरप्शन की टीम ने चौहान साहब को पकड़कर बोला “तू तो गया काम से, अब जेल की सलाखों में गिनती कर रिश्वत की!”डायलॉग मार दो भाई! “ये पुलिस की चौकी नहीं, अकाउंटेंट की दुकान थी , जहाँ बिल बनता था, पर पेमेंट रिश्वत में! अब देखो, सिपाही बना हीरो, चौहान साहब बन गए जीरो। और लखनऊ की टीम! वो तो “खाकी के खिलाफ खाकी” वाली स्टाइल में चली गई , सायरन बजाते, धूल उड़ाते! मोरल ऑफ द स्टोरी!“रिश्वत लेगा तो यही होगा… पुलिस भी पकड़ेगी, जनता भी थप्पड़ मारेगी!” अगली खबर तक, “पिक्चर अभी बाकी है…”पर उम्मीद है, अगली बार कोई हीरो बने, न कि कोई अकाउंटेंट विलेन!

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नागा साधु के वेश में लुटेरे

भारत में सरकार के आदमी साधू के वेश में डकैत निकले ! विश्वगुरु भारत का ‘भस्मासुर’ ड्रामा ! भारत ! “ये देश है वीर जवानों का, बाबाओं का, साधुओं का… और अब लुटेरों का! फिल्मी स्टाइल में कहें तो, मध्य प्रदेश के उज्जैन में जो ड्रामा हुआ, वो किसी बॉलीवुड मसाला फिल्म से कम नहीं। नागा साधु बनकर हाईवे पर गाड़ियां रोकना, भभूत लगाना, माला पहनना और फिर धमकी देना ,रुपये नहीं दिए तो भस्म कर दूंगा! ” वाह रे विश्वगुरु भारत! जहां एक तरफ हम योग, ध्यान और गीता का पाठ दुनिया को सिखाते हैं, वहीं हमारे ‘आधुनिक भस्मासुर’ साधु बनकर लूट का धंधा चला रहे हैं। ये है हमारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ , पूरा विश्व परिवार, लेकिन पहले जेब कुटुम्बकम!नकल्पना कीजिए, कालियादेह का मंसूर भाई अपनी बीवी हिना और दो बच्चों के साथ इंदौर जा रहा है। परिवार खुशी-खुशी, गाने बज रहे होंगे “ये देश है विश्वगुरु का…” अचानक नीमनवासा मोड़ पर आ जाते हैं हमारे ‘ नागा बाबा’। शरीर पर भभूत, गले में फूलमाला, हाथ में त्रिशूल (या शायद लूट का हथियार) और मुंह से डायलॉग ,”भस्म कर दूंगा!” डर के मारे मंसूर ने दो सोने की अंगूठियां (एक लाख की) और पचास हजार कैश थमा दिए। अरे वाह! महाभारत में भस्मासुर को शिवजी ने वरदान दिया था, लेकिन यहां तो खुद ही ‘वरदान’ ले रहे हैं , लूट का लाइसेंस! और पुलिस वो तो कमाल की! उज्जैन की लूट के महज 30 मिनट बाद नरवर थाना वाले पालखन्दा चेकपॉइंट पर अर्टिगा कार रोकते हैं। कार में सात ‘साधु’ दिल्ली और हरियाणा के राकेश कुमार (45), मगन नाथ (19), रुमाल नाथ (60), राजेश नाथ (41), बिरजू नाथ (45), अली नाथ (20) और अरुण नाथ (25)। सबके सब भभूत लगाए, माला पहने, लेकिन जेब में लूटा माल! पुलिस ने जेवर-नगदी बरामद कर ली। गिरोह ने उज्जैन, घटिया, देवास, शाजापुर में कई वारदातें कीं। फिल्मी डायलॉग में कहें ,”अपराधी कितना भी चालाक हो, कानून की लाठी अंत में उसकी ही पीठ पर पड़ती है!” लेकिन , विश्वगुरु जी! हम दुनिया को ‘अहिंसा परमो धर्म, सिखाते हैं, लेकिन हमारे हाईवे पर ‘लूट परमो धर्म,’ चल रहा है। एक तरफ हम ‘मेक इन इंडिया’ कहते हैं, दूसरी तरफ ‘फेक इन इंडिया’ , फेक साधु, फेक बाबा, फेक योगी! नागा साधु तो असली वाले कुंभ में ध्यान करते हैं, लेकिन ये वाले हाईवे पर ‘ध्यान’ लगाते हैं, तुम्हारी जेब पर! “भारत माता की जय!” कहते हुए जेब काटना ,ये है हमारा ‘डिजिटल इंडिया’ का एनालॉग वर्जन,अरे, सरकार जी, विश्वगुरु बनने से पहले अपने हाईवे को ‘सुरक्षित गुरु’ बना लो। वरना अगली बार कोई विदेशी टूरिस्ट आएगा, साधु देखकर प्रणाम करेगा, और जेब खाली हो जाएगी। तब डायलॉग बनेगा , “ये क्या हो रहा है, माननीय ये विश्वगुरु है या लुटेरु” हंसते-हंसते रोना आता है, लेकिन सच्चाई यही है। जय हिंद… या जय लूट..!

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इंसान ही इंसान के साथ अन्याय करे, तो किससे शिकाय ! धर्मेंद्र-अमिताभ की मुलाकात से उपजा दर्द !

मुंबई! बॉलीवुड के धाकड़ हीरो धर्मेंद्र अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर लौटे, तो उनकी मुस्कान में छिपी थकान किसी को नजर नहीं आई। लेकिन अगले ही दिन, उनके चिरपरिचित दोस्त अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली, जो दिल को छू गई। “धर्मेंद्र से मिलने के बाद… इंसान ही इंसान के साथ अन्याय करे, तो किससे शिकायत करें! ” ये शब्द सिर्फ एक पोस्ट नहीं, बल्कि एक गहरा दर्द थे। अमिताभ की आंखों में आंसू और आवाज में कंपकंपी, धर्मेंद्र की कमजोर हालत देखकर उमड़ी थी। दो दिग्गजों की ये मुलाकात हमें याद दिलाती है कि जिंदगी की जंग में सबसे बड़ा दुश्मन कभी-कभी हमारा अपना शरीर ही बन जाता है , और उससे लड़ते हुए इंसान अकेला पड़ जाता है।/कल्पना कीजिए, वो धर्मेंद्र जो कभी स्क्रीन पर घोड़ों को दौड़ाते, दुश्मनों को धूल चटाते नजर आते थे, आज अस्पताल की चारदीवारी में कैद हैं। उम्र का बोझ, बीमारियों का साया , ये वो अन्याय है जो प्रकृति करती है, लेकिन अमिताभ का सवाल इससे कहीं गहरा है। इंसान ही इंसान के साथ अन्याय करे… शायद वो उस दर्द की बात कर रहे हैं जो अपनों से मिलता है। बॉलीवुड की चकाचौंध दुनिया में कितने ही सितारे अकेले लड़ते हैं। धर्मेंद्र जैसे योद्धा को देखकर अमिताभ को अपना दर्द याद आया होगा, वो दौर जब वो खुद कोमा में थे, और दुनिया ने उन्हें अलविदा कह दिया था। लेकिन असल अन्याय तो वो है जब अपनों की उदासीनता घाव पर नमक छिड़कती है। दोस्ती की ये मुलाकात बताती है कि सच्ची दोस्ती में दर्द बांटा जाता है, न कि छिपाया। समाज में देखिए तो ये दर्द हर घर में बिखरा पड़ा है। बुजुर्ग माता-पिता अस्पताल के बिस्तर पर तड़पते हैं, और बच्चे फोन पर व्यस्त। पड़ोसी की बीमारी पर हम सहानुभूति जताते हैं, लेकिन मदद की हाथ नहीं बढ़ाते। इंसान का इंसान के साथ अन्याय यही है ,भावनात्मक उपेक्षा। अमिताभ की पोस्ट एक आईना है, जो हमें पूछती है, किससे शिकायत करें! सरकार से! डॉक्टरों से! या खुद से! धर्मेंद्र की डिस्चार्ज की खुशी में भी एक सबक है , जिंदगी क्षणभंगुर है। वो 12 नवंबर का दिन हमें सिखाता है कि स्वास्थ्य खोने के बाद पैसा, शोहरत कुछ नहीं रह जाता। बस अपनों का साथ चाहिए, जो दर्द में साथ खड़ा हो।ये कहानी सिर्फ दो सितारों की नहीं, हम सबकी है। हर उस इंसान की जो अकेले लड़ रहा है। अमिताभ का भावुक संदेश चेतावनी है, अन्याय मत करो, क्योंकि कल तुम्हारा नंबर आ सकता है। धर्मेंद्र को देखकर रोएं नहीं, बल्कि अपने बुजुर्गों से मिलें, दोस्तों को गले लगाएं। क्योंकि इंसानियत का असली धर्म यही है , दर्द में साथ निभाना। वरना, किससे शिकायत करेंगे हम !

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लक्जरी गाड़ी पे लिखा था विधायक, और बजा रहे थे हूटर पुलिस ने किया सीज

‘यूपी’ के ‘छपरी’ युवा के बीएमडब्ल्यू का भौकाल ! बसंतपुर वाला बाबू मैं, जो चाहूं वो करूं! हूटर का हंगामा ! लखनऊ में एक रईसज़ादे की ‘शोले’ वाली सजा! अरे भाई, ये लखनऊ की गोमतीनगर विस्तार की गलियां नहीं, बॉलीवुड की कोई एक्शन फिल्म का सेट लग रहा था! आधी रात, चांदनी रात में एक चमचमाती बीएमडब्ल्यू दौड़ रही है। हूटर बज रहा है – वीं-वूं-वीं! मानो कोई मंत्री जी का काफिला गुजर रहा हो। ऊपर से स्टीकर चिपका, विधायक! अंदर बैठा रईसज़ादा, शीशे नीचे करके हवा खा रहा है, सोच रहा है , “बसंतपुर वाला बाबू मैं, जो चाहूं वो करूं!” लेकिन भाई, यहां तो उत्तर प्रदेश पुलिस का गब्बर सिंह तैनात है , इंस्पेक्टर सुधीर अवस्थी! इंस्पेक्टर साहब कार रोकते हैं। रोशनी की किरणें पड़ती हैं रईसज़ादे के चेहरे पर। इंस्पेक्टर गरजते हैं,”अरे ओ संभाजी… लग्जरी गाड़ी है, हूटर बज रहा है, विधायक लिखा है… कौन हो तुम!विधायक हो! लड़का घबराकर, हाथ जोड़कर,”नहीं सर, गाड़ी खरीदी है… हूटर पहले से लगा है… विधायक भी पहले से लिखा था…”इंस्पेक्टर की आंखें तरेरती हैं,तो हटाया क्यों नहीं!!”लड़का अब रोने की एक्टिंग, “सर गलती हो गई… माफ कर दीजिए…”इंस्पेक्टर मुस्कुराते हैं, लेकिन वो मुस्कान जिसमें दांत दिखते हैं, खतरे की! “ऐसी गलती के लिए तो पुलिस है… पुलिस सिखाएगी तुम्हें कि दोबारा गलती नहीं करनी है… कितने आदमी थे!अरे, सिर्फ तू! चलो, गाड़ी सीज़!” और बस, दरोगा और सिपाही दौड़े। बीएमडब्ल्यू पर ताला! रईसज़ादा की घिग्गी बंध गई। पहले तो भोकाल मचा रहा था, “मेरा बाप कौन है!” वाला सीन। अब, “सर, एक मौका और… मैं सुधर जाऊंगा!” लेकिन इंस्पेक्टर सुधीर अवस्थी तो वो शेर हैं, जो जंगल के राजा नहीं, कानून के राजा हैं। बड़े-बड़े स्टंटबाजों को आसमान के तारे दिखा चुके हैं। फर्जी विधायक बनकर हूटर बजाना! “ये पुलिस की चौकी है, यहां फर्जीवाड़ा नहीं चलता… जय-वीरू भी आ जाएं, तो भी गाड़ी सीज़! सच्चाई है भाई! आजकल के रईसज़ादे सोचते हैं , पैसा है तो भोकाल है। हूटर लगा लो, स्टीकर चिपका लो, रात में राजा बन जाओ। लेकिन यूपी पुलिस के सामने! “तुम्हारा नाम क्या है, बेटा! …फर्जी! अब जाओ, थाने में ‘कुत्ते-बिल्ली’ वाला गाना गाओ!” इंस्पेक्टर सुधीर जैसे अफसर बताते हैं ,कानून अमीर-गरीब नहीं देखता, सिर्फ गलती देखता है। और गलती की सजा! “गाड़ी जब्त, भोकाल खत्म… अब पैदल चलो, विधायक जी! इंस्पेक्टर की जीत! रईसज़ादा की हार! और हम दर्शकों का मनोरंजन। “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर… नहीं, ये गाड़ी मुझे दे दे रईसज़ादे!” लखनऊ की रातें अब सुरक्षित , क्योंकि सुधीर अवस्थी हैं ना! बस, अगली बार हूटर बजाओ तो असली वाला बजाओ… वरना पुलिस का डंडा बज जाएगा! पिछवाड़े!

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होनहार’ दरोगा 30 हजार में बिका, अब जेल में ‘फाइनल रिपोर्ट’ लगेगी!

उत्तर प्रदेश लखनऊ। अरे दरोगा जी, ये क्या, वर्दी पहनकर ‘डॉन’ बनने चले थे, अब तो ‘जेल की रोटी’ खानी पड़ेगी!” फिल्मी अंदाज में कहें तो, शोले का गब्बर होता तो बोलता, “तुम्हारा नाम क्या है, बसंती! नहीं, कर्मवीर! 30 हजार में बिक गए रे!” लखनऊ की चकाचौंध भरी सड़कों पर, फीनिक्स पलासियो मॉल के गेट नंबर 7 के सामने, एक ‘हीरो’ बनने का सपना देख रहा था अमेठी का सब-इंस्पेक्टर कर्मवीर सिंह। पुराना मुकदमा, फाइनल रिपोर्ट (एफआर) का लालच, और गंगाराम भाईसाहब से 30 हजार की ‘डिमांड’! पहले भी मोटी रकम वसूल चुके थे, लेकिन लालच तो देवदास की तरह थमता नहीं, “एक बार और, एक बार और!” धमकी की स्क्रिप्ट रटी हुई: “जेल भेज दूंगा!” अरे भाई, खुद ही जेल की हवा खाने पहुंच गए! “पैसे दो, केस क्लोज! नहीं तो… जेल की सलाखें गिनो!” ये डायलॉग तो सिंघम का लगता है, लेकिन असल में घूसखोर दरोगा का था। गंगाराम तंग आकर एंटी करप्शन टीम के पास पहुंचे। टीम ने जाल बिछाया , सादे कपड़ों में, कोई शक न हो। दरोगा जी मॉल के सामने आए, पैसे लिए, और… “हाथ ऊपर करो! तुम गिरफ्तार हो!” धूम स्टाइल में छापा! घबराए कर्मवीर कुछ बोल भी न पाए, रकम बरामद, और सीधे जेल की ‘एंट्री’! ये कोई अकेला ‘विलेन’ नहीं। पिछले हफ्ते मऊ का अजय सिंह 20 हजार में पकड़ा गया। प्रतापगढ़, प्रयागराज, वाराणसी (मोदी जी का गढ़!) दर्जनों दरोगा-कॉन्स्टेबल घूस के ‘नेक्सस’ में फंसे। “ये पुलिस नहीं, ‘बिजनेस’ है भाई!” , गैंग्स ऑफ वासेपुर की तरह पूरा डिपार्टमेंट ‘फैमिली बिजनेस’ लगता है। ऊपर से ‘मेहरबानी’, नीचे जांच की कमी , भ्रष्टाचार का सांप विभाग की जड़ों तक फैल चुका। शिकायतें आला अफसरों तक पहुंचती हैं, लेकिन कई को ‘दबाव’ में दबा दिया जाता। “कानून के रखवाले खुद कानून तोड़ें, तो जनता क्या करे!भागे या घूस दे,योगी जी सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं , जीरो टॉलरेंस, सख्त कार्रवाई! लेकिन जमीन पर! “बड़े-बड़े दावे, छोटे-छोटे रेट! 30 हजार में दरोगा, 20 हजार में कॉन्स्टेबल!” एंटी करप्शन की टीम तो ‘हीरो’ बन रही, रंगे हाथ पकड़कर। लेकिन सवाल वही, कब तक ऐसे ‘होनहार’ वर्दी पर दाग लगाते रहेंगे!जड़ से खात्मा चाहिए ,पारदर्शी जांच, सख्त सजा, और लालच पर ‘फाइनल रिपोर्ट’!”अंत में, दरोगा जी को सबक, लालच बुरी बला है! अगली बार ‘फ्री’ में केस सॉल्व करना, वरना जेल में ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट’ मिलेगा!”, लगे रहो मुन्नाभाई स्टाइल में कहें तो, गांधीगिरी अपनाओ, घूसगिरी छोड़ो! वरना, योगी राज में ‘बिकना’ महंगा पड़ेगा रे बाबा.

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धीरेंद्र शास्त्री से मिलवाने के नाम पर किया महिला का बलात्कार और ब्लैकमेल का आरोप

बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री से मिलवाने के नाम पर महेंद्र दुबे नें महिला का किया बलात्कर और ब्लैकमेल का आरोप मध्य प्रदेश! छतरपुर की उस 27 वर्षीय महिला की कहानी सुनकर दिल दहल जाता है। धीरेंद्र शास्त्री जैसे आध्यात्मिक नेता से मिलने की आस में उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया,पैसे, सम्मान, शरीर और आत्मा। महेंद्र दुबे नाम का शख्स, जो खुद को बागेश्वर धाम का सक्रिय शिष्य बताता था, ने ठगी का ऐसा जाल बिछाया कि महिला न केवल ढाई लाख रुपये गंवा बैठी, बल्कि दुष्कर्म की शिकार हुई, ब्लैकमेल का सामना किया और अंत में मारपीट-लूट की गवाह बनी। यह सिर्फ एक महिला की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस गहरी बीमारी का आईना है, जहां आस्था को हथियार बनाकर कमजोरों को लूटा जाता है। कितने दर्दनाक है कि भगवान के नाम पर इंसान इंसान का शिकार बन जाता है! सोचिए, उस महिला के मन में क्या चल रहा होगा। आध्यात्मिक सांत्वना की तलाश में वह ऑनलाइन और ऑफलाइन दुनिया में भटक रही थी। शादी का झूठा वादा, मिलने का लालच , ये वे हथकंडे हैं जो रोजाना हजारों महिलाओं को फंसाते हैं। महेंद्र दूबे ने न केवल पैसे ऐंठे, बल्कि चुपके से वीडियो बनाकर ब्लैकमेल की। फिर शनिवार रात बड़े बगराजन में बुलाकर मारपीट की, फोन, चेन और बाली छीन ली। यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक निर्दयी खेल है जहां पीड़िता की चीखें अनसुनी रह जाती हैं। पुलिस ने दो थानों में केस दर्ज किया है, छापेमारी चल रही है, लेकिन क्या गिरफ्तारी से उस महिला का खोया सम्मान लौट आएगा! क्या उसके जख्म भर जाएंगे!यह घटना हमें समाज की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती है। हमारा समाज आस्था का कितना दुरुपयोग करता है! बागेश्वर धाम जैसे स्थान लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण हैं, लेकिन ऐसे ठग उन्हें बदनाम करते हैं। महिलाएं सबसे ज्यादा शिकार बनती हैं क्योंकि सामाजिक दबाव उन्हें चुप रहने पर मजबूर करता है। शादी का वादा, ब्लैकमेल, दुष्कर्म , ये पुरानी कहानियां हैं, लेकिन हर बार नई पीड़ा लेकर आती हैं। क्यों हमारी बेटियां, बहनें सुरक्षित नहीं! क्यों आस्था के नाम पर ठगी को रोकने के लिए सख्त कानून नहीं! पुलिस कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन हमें जागरूकता फैलानी होगी , ऑनलाइन ठगों से सावधान रहें, अजनबियों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।हे समाज, जागो! उस महिला की आंसू हमें जगाने चाहिए। आस्था को मजबूत बनाओ, लेकिन अंधभक्ति को नहीं। पीड़िता को न्याय मिले, आरोपी को सजा। तभी हम कह सकेंगे कि हम इंसानियत के हकदार हैं। यह दर्द हम सबका है! इसे सहते रहें या बदलें!चुनाव तुम्हारा ! इस खबर से संबंधित वीडियो देखिए

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जान से मारने की धमकी,“लश्कर-ए-खालसा और आईएसआई करवा सकते हैं हमला, तुरंत सुरक्षा दी जाए”: महंत मनोज शर्मा

हिंदू नेता महंत मनोज शर्मा को मिल चुकी है,जान से मारने की धमकी,बोले — “लश्कर-ए-खालसा और आईएसआई करवा सकते हैं हमला, तुरंत सुरक्षा दी जाए” चंडीगढ़(संजय राय,ईशान टाइम्स )राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक, विश्व हिंदू परिषद,चंडीगढ़ (पंजाब प्रांत) के पूर्व सोशल मीडिया प्रभारी महंत मनोज शर्मा ने खुलासा किया है कि उन्हें खालिस्तानियों और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा तैयार किए गए आतंकवादी संगठन ‘लश्कर-ए-खालसा’ से जान से मारने की धमकियां मिल चुकी हैं।महंत मनोज शर्मा ने बताया कि इस गंभीर मामले की जानकारी उन्होंने चंडीगढ़ पुलिस को पहले ही दे दी है, लेकिन अब तक उन्हें किसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान नहीं की गई। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में जिस तरह हिंदुओं,विशेष रूप से ब्राह्मणों को टारगेट किया जा रहा है, उससे उन्हें आशंका है कि आतंकवादी किसी भी वक्त उन पर हमला करवा सकते हैं।उन्होंने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि मौजूदा हालात को देखते हुए तुरंत प्रभाव से उन्हें केंद्रीय सुरक्षा, एक बुलेटप्रूफ जैकेट, और रिवॉल्वर जारी की जाए ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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