
संजय राय
सुबह की हल्की ठंड थी। सिर में मामूली दर्द के साथ मैंने रोज़ की तरह किताब खोली — भवदेव पांडेय की ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना के नये मानदंड’। रामचंद्र शुक्ल पर कई लेख लिख चुका हूँ और हर बार यह महसूस करता हूँ कि हिंदी आलोचना में केवल एक ही नहीं, बल्कि दो परंपराएँ हैं —
एक जो शास्त्रों, पुराणों और सनातन विचारधारा की छाया में विकसित हुई, और दूसरी जो लोकजीवन, श्रम और सामाजिक यथार्थ की जमीन से निकली।
आज भारतीय राजनीति भी इन्हीं दो परंपराओं की तरह बंटी हुई है — एक दिखावटी, दूसरी वास्तविक; एक धर्म के नाम पर सजाई गई, दूसरी जनहित के नाम पर भूलाई गई।
जाति – राजनीति की धमनियों में जहर
एक बार मैंने एक पुराने साथी से पूछा — “किसे वोट दोगे?”
उन्होंने बिना झिझक कहा, “अपनी जाति के उम्मीदवार को।”
वह जवाब जितना सरल था, उतना ही डरावना भी।
हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ जाति अब विचार नहीं, पहचान बन चुकी है — और राजनीति ने इस पहचान को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है।
मुझे बचपन की एक घटना याद आती है। बिहार विधानसभा चुनाव चल रहा था। गाँव के एक अनपढ़ गोरखिया से पूछा गया — “किसे वोट दोगे?”
उसने जवाब दिया — “चाँद छाप को।”
क्योंकि उस उम्मीदवार की जाति वही थी।
उसे न उसके विचार मालूम थे, न काम — बस जाति ही उसका चुनावी मानक थी।
अपराध और जाति का गठबंधन
आज यह मानसिकता केवल जनता तक सीमित नहीं है, राजनीति ने इसे पूरी तरह आत्मसात कर लिया है।
बिहार के चुनावों में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह जैसे नेता कुख्यात अपराधी अनंत सिंह के प्रचार में जुटे हैं।
कभी इसी समाज के आदर्श सहजानंद सरस्वती, श्रीकृष्ण सिंह या राष्ट्रकवि दिनकर हुआ करते थे —
अब आदर्श बदल गए हैं।
आज अपराधी नेताओं के पोस्टर लगते हैं, पदक नहीं।
तेजस्वी यादव कहते हैं कि अगर वे मुख्यमंत्री बने तो दो महीने में सभी अपराधी जेल में होंगे —
पर सवाल है, क्या अपनी पार्टी के अपराधी भी जेल जाएंगे, या केवल विरोधियों के?
राजनीति अब अपराध की पनाहगाह बन चुकी है,
जहाँ मुकदमों की संख्या कद बढ़ाने का पैमाना बन गई है।
धर्म और पाखंड की राजनीति
धर्म अब आस्था नहीं, राजनीतिक उत्पाद बन चुका है।
हर दल अपने-अपने भगवान गढ़ रहा है और हर मंच पर धर्म का उद्घोष राजनीति की गूंज में बदल गया है।
नेता मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, पर जनता के दुखों से उनका कोई संवाद नहीं।
गरीब की भूख और बेरोज़गारी को ‘कर्म’ कहकर टाल दिया जाता है।
राजनीति का धर्म अब नैतिकता नहीं, सत्ता की स्थिरता है।
प्रधानमंत्री जब कहते थे — “न खाऊँगा, न खाने दूँगा”,
तो यह एक उम्मीद की तरह लगा था।
लेकिन आज वही लोग अरबों के खेल में शामिल हैं —
जिन्हें कभी जनता ने ईमानदारी का प्रतीक माना था।
कई नेता, जो कल तक साइकिल पर चलते थे, आज करोड़ों में खेल रहे हैं।
सत्ता ने उन्हें न केवल पद दिया, बल्कि संवेदनहीनता की नई चमड़ी भी दे दी।
नैतिकता की लाश पर टिकी राजनीति
अब नेता झूठ बोलते हैं, और झूठ को सच साबित करने के लिए
टीवी चैनल, ट्रोल आर्मी और प्रचार तंत्र झोंक देते हैं।
कभी कहा जाता था कि नेताओं की चमड़ी हाथी जैसी होती है,
लेकिन अब तो हाथी भी शरमा जाए —
क्योंकि नेताओं की चमड़ी न नैतिकता को महसूस करती है,
न जनभावना को।
आज का नेता अलग प्रजाति का प्राणी है —
जिसके लिए सत्ता ही साध्य और साधन दोनों है।
जाति, धर्म और अपराध — ये तीनों उसकी राजनीति के स्थायी स्तंभ हैं।
समाज को सोचना होगा
जब तक नागरिक जाति और धर्म की दीवारों को नहीं तोड़ेगा,
अपराधियों को वोट मिलते रहेंगे, और राजनीति पवित्रता खोती जाएगी।
वोट की शक्ति वही है जो समाज को उठाती भी है और गिराती भी है।
नेताओं से पहले जनता को तय करना होगा कि
वह किसे अपना आदर्श बनाना चाहती है —
एक अपराधी, एक जातिवादी, या एक इंसान।
अगर समाज नहीं बदला, तो अगली पीढ़ियाँ
इसी “अपराधी लोकतंत्र” की विरासत पाएँगी।
और तब इतिहास पूछेगा —
क्या हमने सचमुच आज़ादी पाई थी,
या सिर्फ़ स्वतंत्र अपराधियों का शासन स्वीकार किया था?



