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जनता घबराई,"अब तो कुछ कीजिए!" वो बोले,"बस एक रैली

जनता घबराई,”अब तो कुछ कीजिए!” वो बोले,”बस एक रैली और,फकीर को पकड़कर लाए, ताज सिर पर रखा !

फकीर का सिंहासन।जब झोला उठाकर भागने की तैयारी हो! एक राज्य था, जहाँ पुराना राजा चल बसा।उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई, तो दरबारियों ने सोचा क्यों न किसी बाहरी को ताज पहना दें। तभी महल के बाहर से एक फकीर गुजर रहा था – न घर, न परिवार, न कोई जिम्मेदारी। “इसे राजा बना दो,” किसी ने सलाह दी, “यह तो सादा जीवन जीता है, राज्य को लूटेगा नहीं!” फकीर को पकड़कर लाए, ताज सिर पर रखा, और घोषणा हो गई नया महाराज! अब फकीर की मौज! सुबह-सुबह सात तरह के पकवान, रेशमी बिस्तर पर नींद, सोने के कपड़े, और दिन भर दरबार में चोपड़ की बाजियां। पड़ोसी राज्य के राजा को खबर लगी “अरे, ये तो फकीर है, जो सिर्फ पासे फेंकता रहता है!” उसने सेना भेज दी – हमला हो गया!सेनापति दौड़ा “महाराज, दुश्मन आ गया, कुछ कीजिए!” फकीर बोला, “अरे, चिंता मत करो, एक बाजी और खेल लूं!” सेनापति फिर आया “महराज, सेना द्वार पर है!” फकीर: “बस एक बाजी और!” आखिर सेनापति चिल्लाया, “महराज, दुश्मन महल में घुस आया!” फकीर मुस्कुराया: “अच्छा। तो मेरे कौन से बाल-गोपाल रो रहे हैं।मैं तो फकीर हूं, झोला उठाकर निकल लूंगा!” और खिड़की से कूदकर फरार! कहानी पुरानी है, लेकिन भारत की राजनीति में आजकल ऐसे फकीरों की भरमार है। चुनाव आते ही कोई ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ वाला चेहरा उभरता है – न कोई पुराना बोझ, न परिवारवाद की जंजीरें। जनता सोचती है: “ये तो हमारा मसीहा है, भ्रष्टाचार मिटा देगा!” वोट डालो, ताज पहनाओ, और शुरू हो जाता है चोपड़ का खेल – नहीं, माफ कीजिए, ‘जनसेवा’ का ड्रामा! पड़ोसी ‘राज्य’ (यानी विपक्ष या कोई संकट) हमला करता है – महंगाई की सेना, बेरोजगारी का घेरा, या भ्रष्टाचार का तूफान। नेता जी चिल्लाते हैं “चिंता मत करो, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और कर लूं!” जनता घबराई,”अब तो कुछ कीजिए!” वो बोले,”बस एक रैली और!” आखिर जब ‘सेना’ सिंहासन तक पहुंचती है – मतलब जनता का गुस्सा सड़कों पर – तो फकीर मुस्कुराते हैं, “अरे, मेरे कौन से वोटर रो रहे हैं। मैं तो ‘फकीर’ हूं, झोला उठाकर अगले राज्य (या पार्टी) चला जाऊंगा! देखिए न, कितने ‘फकीर’ आजकल सत्ता के महल में बैठे हैं। एक कहता है “मैं तो फकीर हूं, झोला लेकर चल दूंगा” – लेकिन झोला तो हीरे-जवाहरात से भरा रहता है! दूसरा ‘आम आदमी’ बनकर आता है, लेकिन सिंहासन पर बैठते ही रेशमी कुर्सी चिपक जाती है। हमला होता है – अर्थव्यवस्था डूबती है, युवा बेरोजगार सड़कों पर – नेता जी: “एक योजना और लॉन्च कर लूं!” जनता चिल्लाए: “अब तो बचाओ!” वो, “बस एक चुनाव और जीत लूं!”कटाक्ष ये कि फकीरों के भरोसे राज्य नहीं चलता, भई! फकीर तो आते हैं, मौज करते हैं, और भाग जाते हैं। असली राजा वो जो जिम्मेदारी निभाए, न कि झोला तैयार रखे। वरना भारत का महल खाली हो जाएगा, और हम फिर किसी नए फकीर की तलाश में लग जाएंगे। संयोग मात्र। हां, बिलकुल – जैसे हर चुनाव में नया ‘मसीहा’ आता है, और पुराना झोला उठाकर फरार। अंत में

,नोट”:इस लेख से भारत की राजनीति से कोई लेना देना नही है यह एक काल्पनिक सोच हैं।

  • इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
    indrayadavrti@gmail.com ……🖊️…..🙏
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