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बच्ची' के साथ 'दुष्कर्म'! बच्ची की चीख ने पूरे गांव को हिला दिया!

नौ साल की अनूसूचित जाति की ‘बच्ची’ के साथ ‘दुष्कर्म’! बच्ची की चीख ने पूरे गांव को हिला दिया!

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में, मगोर्रा थाना क्षेत्र के एक छोटे से गांव में, जहां मंदिर की घंटियां शांति की ध्वनि देती हैं, वहां एक नौ साल की अनूसूचित जाति की बच्ची की चीख ने पूरे गांव को हिला दिया। शनिवार की दोपहर, साढ़े तीन बजे, जब बच्ची खेलते-खेलते मंदिर के पास पहुंची, तो कुछ दरिंदों ने उसे कमरे में खींचकर सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दे दिया। खून से लथपथ बच्ची की पुकार पर ग्रामीण पहुंचे, पुलिस आई, अस्पताल में भर्ती किया गया। सीसीटीवी में तीन संदिग्ध दिखे, गांव में तनाव, पुलिस बल तैनात। लेकिन ये सिर्फ एक खबर नहीं, ये हमारे समाज की उस काली सच्चाई का आईना है, जो हर बार मासूमों की लाश पर लिखी जाती है। कल्पना कीजिए, एक नन्ही बच्ची, जो अभी दुनिया की रंगीनियां सीख रही है, खेल रही है, हंस रही है। मंदिर – वह पवित्र स्थान जहां लोग पूजा करते हैं, देवताओं से मांगते हैं – वही जगह बन गई अपराध की गवाह। तीन युवक, शायद गांव के ही, या आसपास के, जिन्होंने इंसानियत को ताक पर रखकर एक बच्ची की जिंदगी को हमेशा के लिए दागदार कर दिया। बच्ची चीखी, लेकिन उसकी चीख सिर्फ उस कमरे तक नहीं रुकी; वो पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर रही है। क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि मंदिर के पास भी सुरक्षा नहीं? क्या बचपन अब सिर्फ किताबों में बचा है। ये घटना जाति की उस पुरानी जंजीर को भी उजागर करती है। अनूसूचित जाति की बच्ची – ये शब्द ही दर्द देते हैं। हमारे समाज में दलित बच्चियां अक्सर दोहरी मार झेलती हैं: गरीबी और जातिगत भेदभाव। अपराधी शायद इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं। निर्भया के बाद हाथरस, कठुआ, उन्नाव, और अब मथुरा। हर बार वही कहानी: गरीब, दलित, बच्ची। हर बार वही आक्रोश, वही तनाव, वही पुलिस की तलाश। लेकिन कितने अपराधी पकड़े जाते हैं? कितनी बार न्याय मिलता है। एसपी कहते हैं, “जल्द गिरफ्तार करेंगे।” लेकिन जल्द कितना जल्द। बच्ची की जिंदगी तो पहले ही बर्बाद हो चुकी। ये सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, पूरे समाज का कलंक है। हम मंदिर बनाते हैं, पूजा करते हैं, लेकिन इंसानियत को मारते हैं। गांव के ग्रामीण आरोपियों की तलाश में जुटे हैं – ये अच्छी बात है, लेकिन क्यों हमें हर बार सड़क पर उतरना पड़ता है? क्यों स्कूलों में, घरों में, गांवों में बच्चों को सुरक्षा की शिक्षा नहीं दी जाती? क्यों सीसीटीवी सिर्फ घटना के बाद काम आते हैं? क्यों लड़कियों को “सावधान रहो” कहा जाता है, न कि लड़कों को “इंसान बनो”। समाज के रूप में हमें सोचना होगा। माता-पिता, शिक्षक, नेता – सब जिम्मेदार हैं। बच्चों को सुरक्षित खेलने का हक दो। जाति के नाम पर भेदभाव खत्म करो। कानून सख्त बनाओ, लेकिन लागू भी करो। फास्ट-ट्रैक कोर्ट, कड़ी सजा, और सबसे जरूरी – नैतिक शिक्षा। अपराधी इंसान नहीं, राक्षस होते हैं, लेकिन उन्हें राक्षस बनाने वाला हमारा समाज है। अगर हम चुप रहे, तो अगली बच्ची कौन। उस नन्ही बच्ची की चीख हमें जगाए। अस्पताल के बिस्तर पर वो लड़ रही है जिंदगी की जंग। हमारी प्रार्थना उसके साथ है, लेकिन प्रार्थना काफी नहीं। कार्रवाई चाहिए। न्याय चाहिए। एक ऐसा समाज चाहिए जहां मंदिर के पास बच्ची खेल सके, बिना डर के। नहीं तो ये चीखें कभी थमेंगी नहीं। ये दर्द हम सबका है। उठो, बोलो, बदलो। वरना हम सब अपराधी हैं।

  • इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
    indrayadavrti@gmail.com ……🖊️…..🙏
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