
राजस्थान के जैसलमेर बस हादसा सरकार की घोर लापरवाही और सिस्टम की नाकामी का खौफनाक सबूत। जैसलमेर में 14 अक्टूबर 2025 को हुई बस आगजनी की दर्दनाक घटना ने न सिर्फ 20 से अधिक निर्दोष जानें लील लीं, बल्कि राज्य सरकार की सड़क सुरक्षा, परिवहन नियमन और आपदा प्रबंधन में भयानक नाकामी को उजागर कर दिया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की भाजपा सरकार, जो चुनावी वादों में “सुरक्षित राजस्थान” का ढोल पीटती रही, अब इस हादसे के सामने बेनकाब हो गई है। मुआवजे के ऐलान और जांच के आदेश महज खानापूरी हैं, जबकि असल सवाल यह है कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं? यह हादसा कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सरकारी उदासीनता का परिणाम है, जो यात्रियों की जान को सस्ता समझती है। सरकार हमेशा से ही सड़क सुरक्षा की अनदेखी करती है,जुगाड़ संस्कृति को बढ़ावा बस में लगा जुगाड़ वाला एसी, जो शॉर्ट सर्किट का मुख्य कारण माना जा रहा है, कोई नई बात नहीं। राजस्थान में निजी बस ऑपरेटरों की मनमानी जगजाहिर है। परिवहन विभाग की फिटनेस सर्टिफिकेट प्रक्रिया महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है। यह बस अपना चौथा फेरा चला रही थी, लेकिन क्या सरकार ने कभी जांच की ,कि ऐसी नई बसों में भी अवैध संशोधन क्यों हो रहे हैं? दिवाली के मौसम में पटाखों की अफवाहें उड़ रही हैं, लेकिन असल मुद्दा है बसों की मेंटेनेंस का अभाव। केंद्र और राज्य सरकार की “स्मार्ट सिटी” योजनाओं में अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन हाईवे पर चलने वाली बसों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं। परिणाम।, 57 यात्रियों में से 20 की जलकर मौत, जिसमें एक ही परिवार के 5 सदस्य शामिल। यह सरकार की नीतिगत विफलता है, जहां लाइसेंस देने से पहले सख्त चेकिंग नहीं होती। बचाव कार्यों में देरी ये साबित करने के लिए काफी है कि सरकार की एम्बुलेंस और फायर सर्विस तंत्र पूरी तरह खत्म है। हादसे के बाद का दृश्य और भी शर्मनाक है। फायर ब्रिगेड 10 मिनट में पहुंची, लेकिन तब तक बस जल चुकी थी। घायलों को ले जाने वाली एम्बुलेंस पुरानी, धीमी और सुविधाहीन थीं, जैसा कि खुद घायलों ने बताया। जैसलमेर से जोधपुर तक 300 किलोमीटर का सफर तय करने में घंटों लग गए, और एक घायल रास्ते में दम तोड़ दिया। ग्रीन कॉरिडोर का दावा किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत क्या थी। राजस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं। भाजपा सरकार ने आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का ढिंडोरा पीटा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में एम्बुलेंस की कमी और ट्रेनिंग की कमी ने जानें ले लीं। मृतकों की बॉडीज 4 घंटे बाद भी इतनी गर्म थीं कि निकालना मुश्किल था—यहां डीएनए टेस्ट की बात हो रही है, लेकिन प्रिवेंटिव मेजर्स पर सरकार खामोश क्यों। ऊपर से सरकार मुआवजे का ढोंग करके जांच के नाम पर टालमटोल कर रही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मौके पर पहुंचकर फोटो सेशन किया और 10 लाख रुपये मुआवजे का ऐलान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2 लाख रुपये की सहायता दी। लेकिन यह क्या बदलेगा। पिछले हादसों में भी वही हुआ जैसे कि कोटा बस दुर्घटना या जोधपुर रोड एक्सीडेंट्स—में हुआ, और कोई सबक नहीं लिया गया। जांच के आदेश दिए गए, लेकिन बस ऑपरेटर पर कार्रवाई कब होगी। पुलिस और परिवहन विभाग की जांच महज दिखावा है, क्योंकि भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। बस का दरवाजा जाम होना यात्रियों को फंसाने का कारण बना—क्या यह फिटनेस चेक में नहीं पकड़ा गया? विपक्ष के आरोप सही हैं कि मौतों के आंकड़े छुपाए जा रहे हैं। (कुछ स्रोत 21 मौतें बता रहे)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की संवेदना अच्छी है, लेकिन केंद्र सरकार की रोड सेफ्टी पॉलिसी कहां है? 2024 के रोड ट्रांसपोर्ट बिल में वादे किए गए थे, लेकिन अमल शून्य। जनता चाहती है कि सिस्टम बदलो, नहीं तो जवाब दो
यह हादसा साबित करता है कि राजस्थान सरकार जनता की सुरक्षा से ज्यादा बस ऑपरेटरों के हित साध रही है। सड़क सुरक्षा पर बजट बढ़ाओ, अवैध संशोधनों पर बैन लगाओ, एम्बुलेंस फ्लीट को अपडेट करो और फायर सर्विस को मजबूत बनाओ। अन्यथा, ऐसी घटनाएं दोहराई जाएंगी। शोक संतप्त परिवारों को न्याय चाहिए, न कि मुआवजे का लॉलीपॉप। सरकार जागो, वरना जनता आपको वोट की आग में जला देगी।

इंद्र यादव




