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संजय राय , संपादक
भारत के युवाओं के बीच सरकारी नौकरी की चाहत किसी जुनून से कम नहीं। हाल ही में उत्तराखंड में हुए पेपर लीक आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि सरकारी नौकरी सिर्फ एक रोजगार नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी है। जब परीक्षा में गड़बड़ी हुई, तो युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा और सरकार को अंततः सीबीआई जांच की घोषणा करनी पड़ी। लेकिन यह कहानी केवल उत्तराखंड की नहीं है – यह उस मानसिकता की कहानी है, जिसमें सरकारी नौकरी को जीवन की अंतिम मंज़िल मान लिया गया है।
🎯 नौकरी या सुरक्षा का भ्रम?
देश में सरकारी नौकरियों की संख्या करीब 1.4 करोड़ है, यानी कामकाजी आबादी का सिर्फ 1.4 प्रतिशत हिस्सा ही सरकारी कर्मचारी है। फिर भी हर साल लाखों युवा इसी दिशा में दौड़ लगाते हैं। वजह साफ़ है — सरकारी नौकरी में स्थिरता, पेंशन, सुरक्षा और सम्मान की गारंटी दिखती है।
दूसरी ओर, निजी क्षेत्र में अस्थिरता, लक्ष्य का दबाव और छँटनी का डर हावी है।
लेकिन विडंबना यह है कि जिन सरकारी व्यवस्थाओं को हम “धीमी, भ्रष्ट और अकुशल” कहकर कोसते हैं, उन्हीं में शामिल होने के लिए करोड़ों युवा सालों तक तैयारी करते हैं।
🧩 आंकड़े जो सोचने पर मजबूर करते हैं
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा को ही देखें — हर साल लगभग 15 लाख अभ्यर्थी आवेदन करते हैं। प्रारंभिक परीक्षा से मुख्य परीक्षा तक पहुँचते हैं लगभग 12,000, साक्षात्कार के लिए बुलाए जाते हैं करीब 3,000, और अंत में सफलता पाते हैं मात्र 900 से 1000 उम्मीदवार।
आईएएस जैसे प्रतिष्ठित पदों के लिए यह संख्या 100 के आसपास सिमट जाती है।
यानी सफलता की संभावना 0.006 प्रतिशत से भी कम।
फिर भी हर साल लाखों युवा अपनी युवावस्था, समय और ऊर्जा इसी एक संभावना के पीछे लगा देते हैं।
राजस्थान में हाल ही में ग्रुप–डी की 53,747 नौकरियों के लिए 21 लाख आवेदन आए। इनमें अधिकांश उम्मीदवार स्नातक या परास्नातक थे। यह आँकड़ा बताता है कि आज सरकारी नौकरी केवल आजीविका नहीं रही — यह मानसिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी है।
🧠 कोचिंग संस्कृति और “माई-बाप सरकार” की सोच
भारत में कोचिंग संस्थान अब एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुके हैं। लाखों छात्र सालों तक “सरकारी नौकरी” के लिए तैयारी करते हुए अपनी युवावस्था का सबसे ऊर्जावान दौर कक्षाओं और टेस्ट सीरीज में गुज़ार देते हैं।
समस्या यह है कि शिक्षा और कोचिंग प्रणाली दोनों ने युवाओं में यह धारणा मजबूत की है कि “सरकार ही सब कुछ देगी।” यही “माई-बाप सरकार” वाली सोच आत्मनिर्भर भारत की राह में सबसे बड़ी बाधा है।
🚀 बदलते भारत में बदलनी होगी सोच
भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन अगर हमारे युवा सिर्फ सरकारी कुर्सी की प्रतीक्षा करते रहेंगे, तो देश का निजी क्षेत्र, स्टार्टअप और नवाचार कौन संभालेगा?
सरकारी नौकरी सीमित हैं, पर अवसर असीमित — कृषि, तकनीक, सेवा क्षेत्र, डिजिटल उद्यम और कौशल-आधारित कार्य अब नए करियर मार्ग खोल रहे हैं।
सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह युवाओं को नौकरी की प्रतीक्षा से बाहर निकालकर कौशल विकास, स्व-रोजगार और उद्यमिता की दिशा में मार्गदर्शन दे। वहीं युवाओं को भी समझना होगा कि स्थिरता की चाह अगर प्रगति की गति को रोक दे, तो वह स्थिरता नहीं, ठहराव बन जाती है।
सरकारी नौकरी कोई बुरी चीज़ नहीं, लेकिन उसे जीवन का अंतिम लक्ष्य बना लेना, अपने सामर्थ्य का अपमान है।
समय आ गया है कि युवा सरकारी नौकरी के भ्रम से बाहर निकलें और यह समझें कि असली सफलता किसी पद पर नहीं, बल्कि अपनी योग्यता से अवसर बनाने में है।
“सरकारी नौकरी स्थिर कर सकती है, पर बढ़ा नहीं सकती।
बढ़ना हो, तो जोखिम लेना ही पड़ेगा।”




