दोषी को ‘सांसें’ टूटने तक लटकाया जाए, वरना समाज में गलत संदेश जाएगा और ‘न्याय’ पर सवाल उठेंगे !

‘जज’ की सख्त टिप्पणी थी! “दोषी को ‘सांसें’ टूटने तक लटकाया जाए, वरना समाज में गलत संदेश जाएगा और ‘न्याय’ पर सवाल उठेंगे !

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में सात साल की मासूम और उसकी पांच साल की छोटी बहन के साथ हुई क्रूर वारदात ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। 22 फरवरी 2021 को गांव के प्राथमिक स्कूल के नल पर नहाने गईं इन सगी बहनों में से एक की लाश खेत में मिली, सिर से बहता खून और दूसरी बच्ची लहूलुहान हालत में सौ मीटर दूर। शहद बेचने वाले अनिल चमेली को पुलिस ने गिरफ्तार किया और 57 महीनों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने इसे ‘विरलतम श्रेणी’ का मामला मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। जज की सख्त टिप्पणी थी: “दोषी को सांसें टूटने तक लटकाया जाए, वरना समाज में गलत संदेश जाएगा और न्याय पर सवाल उठेंगे। यह फैसला निश्चित रूप से राहत की सांस देता है, लेकिन क्या सिर्फ फांसी की सजा से बच्चियों पर होने वाले अत्याचार रुक जाएंगे! यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता को उजागर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चियां स्कूल जाती हुईं, नल पर नहाती हुईं या खेलती हुईं – ये दैनिक गतिविधियां कितनी असुरक्षित हो गई हैं! शाहजहांपुर जैसी घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं; निर्भया से लेकर हाथरस, कठुआ और अब यह – हर बार हम गुस्से में सड़कों पर उतरते हैं, हैशटैग चलाते हैं, लेकिन अगली वारदात तक सब भूल जाते हैं! सामाजिक चिंता यही है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था बच्चियों को घर के बाहर कदम रखने लायक नहीं बना पा रही। गांवों में स्कूलों के आसपास कोई सीसीटीवी नहीं, कोई सुरक्षित खेल मैदान नहीं। माता-पिता काम पर जाते हैं तो बच्चियां अकेली पड़ जाती हैं। अपराधी जैसे अनिल – जो शहद बेचकर घूमते हैं – आसानी से शिकार बनाते हैं। पोक्सो एक्ट सख्त है, फास्ट-ट्रैक कोर्ट हैं, लेकिन जांच में देरी, गवाहों का डरना और सबूतों की कमी से कितने केस कमजोर पड़ जाते हैं। इस मामले में भी चार्जशीट लगने में समय लगा, लेकिन अदालत ने सजा सुनाकर उदाहरण पेश किया। क्या हम सिर्फ सजा पर निर्भर रहेंगे या समाज बदलेगा! स्कूलों में सेक्स एजुकेशन अनिवार्य हो, जहां बच्चियां ‘गुड टच-बैड टच’ सीखें। गांव स्तर पर महिला स्वयं सहायता समूह और पंचायतें चौकसी करें। पुलिस पेट्रोलिंग बढ़े, हेल्पलाइन नंबर हर बच्ची की जुबान पर हो। माता-पिता को जागरूक करें कि बच्चियों को अकेला न छोड़ें, लेकिन क्या हर पल निगरानी संभव है! नहीं, इसलिए सामुदायिक निगरानी जरूरी है – पड़ोसी, शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सभी की भूमिका। यह फैसला एक संदेश है: अपराधी बख्शे नहीं जाएंगे। लेकिन असली जीत तब होगी जब ऐसी वारदातें ही न हों। बच्चियां सुरक्षित खेलें, पढ़ें और बड़ा हों – यही समाज की सच्ची प्रगति होगी। सरकार, एनजीओ और हम सब मिलकर इस चेन को तोड़ें, वरना फांसी की रस्सी कितनी भी लंबी हो, मासूमों की चीखें नहीं रुकेंगी। जागो समाज, वरना अगली खबर तुम्हारे घर से आएगी!

  • इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
    indrayadavrti@gmail.com ……🖊️…..🙏

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