एस.सी./एस.टी. कानून अंतर्गत दर्ज केस में जांच अधिकारी न्यूनतम डी.एस.पी. रैंक का, अग्रिम ज़मानत का प्रावधान भी लागू नहीं
सुप्रीम कोर्ट के एक ताज़ा फैसले अनुसार अग्रिम ज़मानत तभी संभव जब प्रथम दृष्टया कोई मामला न बनता हो – एडवोकेट हेमंत
चंडीगढ़(ईशान टाइम्स) – हरियाणा कैडर के इंस्पेक्टर-जनरल (आई.जी.) अर्थात पुलिस महानिरीक्षक रैंक में कार्यरत दिवंगत आई.पी.एस. अधिकारी वाई. पूरण कुमार द्वारा गत 7 अक्टूबर को की गई आत्महत्या के दो दिन बाद 9 अक्टूबर की रात चंडीगढ़ सेक्टर 11 पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी (एफ.आई.आर.), जो उनकी धर्मपत्नी और हरियाणा कैडर की आई.ए.एस. अधिकारी अमनीत पी. कुमार द्वारा सौंपी गई लिखित शिकायत और मृतक पूरण कुमार द्वारा आत्महत्या के पूर्व लिखे गए तथाकथित फाइनल नोट के आधार पर दर्ज की गई, जिस पर अमनीत द्वारा हालांकि लिखित शिकायत देकर आपत्ति भी दर्ज कराई गई कि वह अधूरी एफ.आई.आर. है चूँकि उसके कॉलम नंबर सात में तथाकथित आरोपियों के नाम नहीं डाले गए हैं एवं इसके साथ साथ आरोपियों विरूद्ध अनूसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (एस.सी/एस.टी कानून) की धारा 3 (2) (वी) नहीं जोड़ी गई है.
बहरहाल, चंडीगढ़ पुलिस के डी.जी.पी. सागर प्रीत हुड्डा द्वारा 10 अक्टूबर को इसी मामले में एक 6 सदस्ययी एस.आई.टी. गठित कर दी गई है जिसके प्रमुख चंडीगढ़ पुलिस आई.जी. पुष्पेन्द्र कुमार और सदस्यों में चंडीगढ़ एस.एस.पी. कंवरदीप कौर, एस.पी. सिटी के.एम. प्रियंका, दो डी.एस.पी. स्तर के पुलिस अधिकारी नामत: चरणजीत सिंह और गुरजीत कौर और साथ साथ सेक्टर 11 पुलिस स्टेशन के एस.एच.ओ. जयवीर सिंह राणा शामिल है.
इसी बीच एस.सी/एस.टी. कानून, 1989 में कानूनी कार्रवाई की मौजूदा प्रक्रिया पर जानकारी देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया कि उक्त 1989 एस.सी/एस.टी कानून की धारा 23 (1 ) के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा मार्च, 1995 में आवश्यक नियम बनाये गए जो देश के हर राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश जैसे चंडीगढ़ पर लागू होते हैं जिनमें समय समय पर केंद्र सरकार द्वारा संशोधन भी किया जाता रहा है. उपरोक्त नियमावली के नियम संख्या 7 के अनुसार एस.सी./एस.टी. कानून के तहत दर्ज केसों में जांच अधिकारी (आई.ओ.) न्यूनतम डी.एस.पी. (पुलिस उपाधीक्षक ) स्तर का अधिकारी ही हो सकता है. इसी कारण 10 अक्टूबर को चंडीगढ़ डी.जी.पी. द्वारा गठित एस.आई.पी. में चरणजीत सिंह, डी.एस.पी..ट्रैफिक चंडीगढ़ को सदस्य के साथ साथ जांच अधिकारी (आई.ओ.) भी दर्शाया गया है. बहरहाल, उपरोक्त 1995 नियमो में ऐसा भी स्पष्ट उल्लेख है कि इन मामलों में जांच अधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार/डी.जी.पी./पुलिस अधीक्षक द्वारा उसके पूर्व अनुभव, ऐसे मामलों की पेचीदगियों को समझने और मामले की जांच सही दिशा में कम से कम समय में जांच करने की योग्यता और न्याय की भावना को रखकर की जायेगी.
हेमंत ने बताया कि साढ़े नौ वर्ष पूर्व अप्रैल, 2016 में उपरोक्त एस.सी/एस.टी. नियमो में केंद्र की मोदी सरकार द्वारा संशोधन किया गया जिसमें नियम 7 भी शामिल है जिसके अनुसार ऐसे मामलों में जांच अधिकारी प्राथमिकता के तौर पर मामले में अन्वेषण /जांच पूरी कर उसकी रिपोर्ट सम्बंधित एस.पी. को सौंपेगा जो उसे तत्काल आगे राज्य के डीजीपी (या पुलिस कमिश्नर ) को भेजेगा.
वहीं सम्बंधित पुलिस स्टेशन (थाने) के इंचार्ज द्वारा 60 दिनों के भीतर ऐसे मामलो की चार्ज-शीट (आरोप पत्र ) राज्य सरकार द्वारा पदांकित की गयी विशेष कोर्ट में फाइल करने का उल्लेख है. अगर इस अवधि में किसी भी कारण से विलम्ब हुआ तो, तो जांच अधिकारी को लिखित तौर पर उसे भी स्पष्ट करना होगा.
बहरहाल, हेमंत ने यह भी बताया की अगस्त, 2018 में भारत की संसद द्वारा अनूसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून, 2018 पारित किया गया जो 20 अगस्त, 2018 से पूरे देश में लागू किया गया. यह संशोधन कानून सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार नामक निर्णय को पलटने के लिए बनाया गया. संशोधन कानून द्वारा 1989 कानून में नई धारा 18(क) जोड़ी गयी जिसमे यह साफ़ तौर पर वर्णित है कि इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अभियुक्त के विरूद्ध एफ.आई.आर. दर्ज करने से पहले पुलिस अधिकारी द्वारा किसी प्रकार की प्रारम्भिक जांच करने की आवश्यकता नहीं होगी.
इसके अतिरिक्त इस कानून के अंतर्गत दर्ज केस के जांच अधिकारी (आई.ओ.) को अगर किसी अभियुक्त की गिरफ्तारी करने अनिवार्य प्रतीत होता है, तो इस सम्बन्ध में उसे किसी उच्च या अन्य अधिकारी से पूर्व स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं होगी. यह भी प्रावधान किया गया है किसी न्यायालय के निर्णय, आदेश या निर्देश होने के बावजूद एस.सी./एस.टी. कानून के अधीन किसी भी केस में सी.आर.पी.सी. (दंड प्रक्रिया संहिता) की धारा 438 (अग्रिम जमानत सम्बन्धी), जो हालांकि 1 जुलाई 2024 से सी.आर.पी.सी. के स्थान पर देशभर में लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एस.एस.), 2023 की धारा 482 है, लागू नहीं होगी जिसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति जिस पर इस कानून के अंतर्गत मामला दर्ज हो गया है या हो सकता है, उसे कोर्ट द्वारा एंटीसीपेटरी बेल नहीं मिल पाएगी. हेमंत ने कहा एस.सी./एस.टी. संसोधन कानून को फरवरी, 2020 में सुप्रीम कोर्ट के 3 जज बेंच द्वारा पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत सरकार नामक फैसले में सही ठहराया गया है.
हेमंत ने एक और रोचक परन्तु महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि पिछले माह 1 सितम्बर 2025 को ही सुप्रीम कोर्ट के एक तीन जज बेंच जिसमें भारत के मुख्य न्यायधीश बी.आर.गवई भी शामिल थे, ने किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन केस में एस.सी./एस.टी. कानून की धारा 18 के तहत इस कानून में अंतर्गत आरोपियों को अग्रिम ज़मानत न दिए जाने के प्रावधान को सही ठहराया और बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा इसी कानून के अंतर्गत दर्ज एक केस में आरोपी को दी गई अग्रिम ज़मानत के फैसले को ख़ारिज कर दिया था. हेमंत ने बताया कि हालांकि ऐसा नहीं है कि एस.सी./एस.टी. कानून के अंतर्गत नामित आरोपियों को अग्रिम ज़मानत मिल ही नहीं सकती है, परन्तु सुप्रीम कोर्ट अनुसार ऐसी राहत तभी प्राप्त हो सकती है जब उक्त कानून के अंतर्गत आरोपियों के विरूद्ध कोई प्रथम दृष्टया मामला न बनता हो.





