यू पी पुलिस’ की ‘तलाश’ में यूपी ‘पुलिस’ तात्पर्य ! जब अपराधी पुलिस मिल जाएं तो कृपया हमें भी बताना..

व्यंग लेख

कल्पना कीजिए, एक ऐसा शहर जहां अपराधी पुलिस स्टेशन के ठीक बाहर चाय की टपरी पर बैठे हुए हों, और पुलिस वाले उन्हें ढूंढते फिरें जैसे कोई खजाना हो। लेकिन यूपी में ये कल्पना नहीं, हकीकत है! सिद्धार्थनगर जिले में एक कांस्टेबल की ‘गायब’ होने की खबर ने पूरे इलाके को हिला दिया – या कम से कम सोशल मीडिया को तो हिला ही दिया। आखिर, जब पुलिस खुद को ‘खोज’ रही हो, तो अपराधी तो हंसते-हंसते पेट पकड़ लेंगे।

खबर के मुताबिक, कांस्टेबल राम हरजाई नाम के एक जांबाज योद्धा (जिन्हें अब ‘गायब योद्धा’ कहना ज्यादा सटीक होगा) 27 अक्टूबर को गश्त पर निकले। अगले दिन सुबह-सुबह वो गायब! पुलिस ने तुरंत तलाशी अभियान शुरू कर दिया – जी हां, वही पुलिस जो अपराधियों को पकड़ने में कभी-कभी ‘तलाश’ ही करती रह जाती है। लेकिन यहां ट्विस्ट ये कि राम हरजाई को न घर में मिले, न मोहल्ले में, न ही पड़ोसियों के पास। आखिरकार, दो दिनों की कड़ी मशक्कत (जिसमें चाय-पानी और रिपोर्ट लिखना शामिल था) के बाद पता चला कि वो तो घर ही लौट आए थे! हां, बिल्कुल सही सुना आपने। गायब होने का राज था – एक ‘फिल्म देखने का बहाना’। जी हां, वो फिल्म जो इतनी रोमांचक थी कि पुलिस की तलाशी से भी ज्यादा। अब सोचिए, यूपी पुलिस का ये ‘ड्रामा’ कितना परफेक्ट है।

एक तरफ अपराधी रातों-रात गायब हो जाते हैं, और पुलिस वाले? वो तो दो दिनों में घर लौट आते हैं, बस थोड़ा सा ‘फिल्मी बहाना’ देकर। सिद्धार्थनगर के एसपी ने बयान दिया कि ‘अपराधिक रिकॉर्ड नहीं है’, मानो ये कोई सर्टिफिकेट हो कि ‘गायब होना वैध है अगर फिल्म देखी हो’। और वो ‘मोहल्ला चार सिपाही’ का सर्कस? पड़ोसी रत्नेश पटेल ने तो पुलिस को बुलाया ही इसलिए कि ‘कांस्टेबल घर लौट आया, लेकिन फिल्म का स्पॉइलर न बताए’। हाहा, अगर अपराधी भी ऐसे ‘लौट’ आएं, तो यूपी में क्राइम रेट जीरो हो जाए! ये घटना तो बस टिप ऑफ द आइसबर्ग है। याद कीजिए, यूपी पुलिस का वो ‘विशेष अभियान’ जहां चोर पकड़ने के लिए ड्रोन उड़ाए जाते हैं, लेकिन ड्रोन खुद ही ‘गायब’ हो जाते हैं। या वो ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ जो अपराधियों को ट्रैक करती है, लेकिन कभी-कभी खुद ही ट्रैक से भटक जाती है। यहां तो कांस्टेबल साहब ने तो कम से कम ‘फिल्म’ का बहाना तो दिया, वरना सोचिए अगर वो कहते ‘नेटफ्लिक्स देख रहा था’ – तो पुलिस की ‘तलाश’ कितने दिनों की चलती? व्यंग्य ये है कि जब पुलिस अपराधी ढूंढ रही होती है, तो अपराधी तो पुलिस की ही तरह ‘घर लौट’ आते हैं। लेकिन कांस्टेबल हरजाई का केस तो मील का पत्थर है – ये साबित करता है कि यूपी में ‘गायब’ होना कोई क्राइम नहीं, बल्कि एक ‘फिल्मी अवकाश’ है। सरकार को चाहिए कि ऐसे ‘गायब योद्धाओं’ के लिए ‘फिल्म टिकट अलाउंस’ शुरू कर दे। कम से कम तलाशी अभियान पर खर्च तो बचेगा! अंत में, सिद्धार्थनगर की जनता को बधाई – आपकी पुलिस इतनी ‘क्रिएटिव’ है कि अपराध से ज्यादा ‘ड्रामा’ पैदा करती है। अगली बार अगर कोई कांस्टेबल गायब हो, तो सीधे मल्टीप्लेक्स चेक करें। कौन जानता है, शायद ‘पठान’ का सीक्वल देखते हुए मिल जाएं। जय हिंद, जय यूपी – जहां पुलिस की तलाश हमेशा ‘हैपी एंडिंग’ पर खत्म होती है!

  • इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
    indrayadavrti@gmail.com ……🖊️…..🙏

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