वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया मनाई जाती है। अक्षय शब्द का अर्थ है ‘कभी कम न होने वाला’। इसलिए इस दिन कोई भी जप,यज्ञ,पितृ-तर्पण,दान-पुण्य करने का फल कभी कम नहीं होता है।
धरतेरस की तरह अक्षय तृतीया पर भी माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
ज्योतिष आचार्य बीपी आध्यात्मिक गुरूजी के अनुसार वास्तु शास्त्र में भी अक्षय तृतीया का काफी महत्व बताया गया है। अक्षय तृतीया के दिन वास्तु शास्त्र के कुछ उपायों को आजमाने से घर में मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
- अक्षय तृतीया के दिन घर की साफ-सफाई अच्छे से की जानी चाहिए। घर में कहीं भी मकड़ी की जाल और झूठे व टूटे बर्तन घर में बिल्कुल नहीं होने चाहिए। घर के प्रवेश द्वार हमेशा साफ होने चाहिए अशोक के पेड़ आम के बन्दनवार,घी के दीपक जलाने चाहिए,, रात्रि को लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ किसी वैदिक विद्वान ब्राह्मण से कराना चाहिए नवग्रह शांति पूजा करके आरती के बाद भोग लगाकर कीर्तन करना चाहिए।
- अक्षय तृतीया के दिन आप अपने घर में लगे सारे नल को पूरी तरह से जांच लें…अगर कहीं भी कोई लीकेज हो रहा हो तो उसे फौरन सही कर लें। वास्तु शास्त्र के मुताबिक नल से पानी टपकना अशुभ माना जाता है।
- घर हो,दुकान हो,या दफ्तर हो, हर जगह कोशिश करें कि पैसे को उत्तर या पूर्व दिशा में रखें। घर की तिजौरी या कोई कीमती सामना का बॉक्स भी हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा में ही रखना चाहिए। वास्तु के मुताबिक इस दिशा में धन रखने से आर्थिक समस्याएं नहीं होती है।
- अक्षय तृतीया के दिन घर में उत्तर दिशा में दर्पण (शीशा) लगाना शुभ माना जाता है। वास्तु के मुताबिक दिशा में दर्पण रखने से सकारात्मक ऊर्जा घर पर बनी रहती है, जिससे आयु और धन में भी बढ़ोतरी होती है।
- अक्षय तृतीया पर घर में शाम के मुख्य द्वार के दोनों ओर घी के दीपक जलाने चाहिए। दीपक लगाते वक्त ये ध्यान रखें कि दीपक दक्षिण दिशा की तरफ होना चाहिए। ऐसा करने से घर में माता लक्ष्मी आती हैं।
अक्षय तृतीया के दिन जल, कुल्हड़, पंखे, छाता, नमक, घी, मौसमी फल जैसे खरबूजा तरबूज आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इन चीजों का दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है और धन संबंधी परेशानियां दूर होती हैं।
अक्षय तृतीया के दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा का विधान है. इसके साथ ही इस दिन सोना, चांदी या नई चीजों की खरीदारी करना बेहद शुभ माना जाता है।
अक्षय तृतीया का दिन ये करे
- इस दिन समुद्र या गंगा स्नान करना चाहिए।
- प्रातः पंखा, चावल, नमक, घी, शक्कर, साग, इमली, फल तथा वस्त्र का दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनी चाहिए।
- ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
- इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए।
- आज के दिन नवीन वस्त्र, शस्त्र, आभूषणादि बनवाना या धारण करना चाहिए।
- नवीन स्थान, संस्था, समाज आदि की स्थापना या उद्घाटन भी आज ही करना चाहिए।
शास्त्रों में अक्षय तृतीया
- इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है।
- इसी दिन श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं।
- नर-नारायण ने भी इसी दिन अवतार लिया था।
- श्री परशुरामजी का अवतरण भी इसी दिन हुआ था।
- हयग्रीव का अवतार भी इसी दिन हुआ था।
- वृंदावन के श्री बाँकेबिहारीजी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण-दर्शन होते हैं अन्यथा पूरे वर्ष वस्त्रों से ढँके रहते हैं।
व्रत कथा : प्राचीनकाल में सदाचारी तथा देव-ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से इस व्रत के माहात्म्य को सुना। कालांतर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूँ, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार-बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म-कर्म और दान-पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना।
अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई।
अक्षय तृतीया का माहात्म्य
- जो मनुष्य इस दिन गंगा स्नान करता है, उसे पापों से मुक्ति मिलती है।
- इस दिन परशुरामजी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है।
- शुभ व पूजनीय कार्य इस दिन होते हैं, जिनसे प्राणियों (मनुष्यों) का जीवन धन्य हो जाता है।
- श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि यह तिथि परम पुण्यमय है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम, स्वाध्याय, पितृ-तर्पण तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है।
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