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खोखली होती जड़ें: क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को नशे के हवाले कर रहे हैं!

मुंबई (इंद्र यादव) हाल ही में राजस्थान के श्रीगंगानगर और असम के गुवाहाटी में हुई बड़ी कार्रवाई—जिसमें ₹32 करोड़ से अधिक की हेरोइन और गांजा जब्त किया गया—महज पुलिस की एक सफलता नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के भीतर गहरे तक धंसे उस नासूर की चेतावनी है जो हमारी आने वाली पीढ़ियों को चाट रहा है। एक तरफ पाकिस्तान की ‘ड्रोन वाली साजिश’ है, तो दूसरी तरफ देश के भीतर ‘गुप्त चैंबर’ वाले ट्रक। यह नशा केवल सरहदों को पार नहीं कर रहा, बल्कि हमारे घरों की दहलीज लांघकर युवाओं की नसों में जहर घोल रहा है।

सामाजिक दर्द: चूल्हे की आग बुझाता नशा

इस ₹32 करोड़ की हेरोइन को सिर्फ एक आंकड़े की तरह न देखें। इसके पीछे उन हजारों पिताओं का दर्द छिपा है जिनकी कमाई नशे की भेंट चढ़ गई, उन मांओं की सिसकियाँ हैं जिनके जवान बेटे अंधेरी गलियों में सुइयां लगा रहे हैं, और उन बच्चों का भविष्य है जिनके हाथ में किताब की जगह पुड़िया थमा दी गई है। जब श्रीगंगानगर के खेतों में 6 किलो हेरोइन मिलती है, तो वह केवल पाउडर नहीं है, वह पंजाब और राजस्थान के सीमावर्ती गांवों के विनाश का सामान है। नशा आज समाज के उस ‘सामाजिक ताने-बाने’ को छिन्न-भिन्न कर रहा है जिसे बुनने में सदियां लगी थीं।

व्यवस्था पर सवाल: क्या सिर्फ प्यादे ही पकड़े जाएंगे!

सुरक्षा एजेंसियों की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का स्वागत है, लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या हमेशा सिर्फ ड्राइवर, कूरियर और छोटे तस्कर ही पकड़े जाएंगे? मणिपुर के जंगलों से चलकर पश्चिम बंगाल तक पहुँचने वाला ट्रक कई राज्यों की सीमाओं और चेकपोस्टों को पार करता है, फिर भी वह ‘सीक्रेट चैंबर’ सुरक्षित कैसे रहता है!
क्या बिना स्थानीय संरक्षण और तंत्र की मिलीभगत के इतना
बड़ा सिंडिकेट फल-फूल सकता है!
कानूनी व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम ‘सप्लाई’ की पूंछ तो काट देते हैं, लेकिन उस ‘मगरमच्छ’ तक नहीं पहुँच पाते जो एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर इस मौत के व्यापार का रिमोट कंट्रोल थामे हुए है।

चुनाव के समय ‘नशा मुक्त समाज’ का नारा देने वाले हमारे माननीय नेता अक्सर कार्रवाई के बाद प्रेस नोट जारी कर अपनी पीठ थपथपाते हैं। लेकिन चिंतन का विषय यह है कि समाजसेवा का चोला ओढ़े इन नेताओं की जिम्मेदारी क्या सिर्फ बयानबाजी तक सीमित है!
वोट बैंक की राजनीति: कई बार स्थानीय रसूखदार लोग ही इन तस्करों के ‘ढाल’ बन जाते हैं। क्या हमारे नेता अपने क्षेत्र के ऐसे ‘काले भेड़ों’ को बेनकाब करने का साहस जुटा पाएंगे!
पुनर्वास का अभाव: सिर्फ नशा पकड़ना काफी नहीं है। जो युवा इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं, उनके लिए सरकारी नशामुक्ति केंद्रों की हालत किसी जेल से बदतर है। नेताओं को बजट और नीतियों में इन केंद्रों को प्राथमिकता देनी होगी।
नैतिक नेतृत्व: समाजसेवा का अर्थ केवल सड़कें बनवाना नहीं, बल्कि समाज के चरित्र का निर्माण करना भी है। यदि क्षेत्र का युवा नशे में डूबा है, तो वह विकास किसके लिए है!

NCB और पुलिस की यह स्ट्राइक सराहनीय है, लेकिन इसे ‘निर्णायक जंग’ तब माना जाएगा जब नशे की इस अर्थव्यवस्था की जड़ यानी ‘फाइनेंसिंग’ पर चोट होगी। समाज को केवल पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जब तक माता-पिता जागरूक नहीं होंगे, शिक्षक सतर्क नहीं होंगे और जनसेवक अपनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक सरहद पार से आने वाले ड्रोन हमारी नस्लों को तबाह करते रहेंगे।
आज सवाल हमारी सुरक्षा का नहीं, हमारे वजूद का है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक ‘नशा मुक्त’ सुबह दे पाएंगे या फिर ये सुर्खियां हर हफ्ते यूँ ही आती रहेंगी

  • Mr. Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times/indrayadaveditor@gmail.com/Open information..🙏..✍️..

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