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महाराष्ट्र सरकार पर बलात्कार का "कलंक" ,सॉफ्टवेयर इंजीनियर गिरफ्तार, सब-इंस्पेक्टर पर दुष्कर्म का आरोप !

सतारा,महाराष्ट्र( इंद्र कुमार यादव ) के सतारा जिले से निकली एक दिल दहला देने वाली खबर ने न सिर्फ समाज को झकझोर दिया है, बल्कि राज्य सरकार की महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर भी काला धब्बा लगा दिया है। फलटण उप-जिला अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी के रूप में सेवा दे रही 28 वर्षीय महिला डॉक्टर की होटल के कमरे में फंदे से लटकी लाश मिली—एक सुसाइड नोट के साथ, जो सीधे-सीधे सरकार की नाकामी की पोल खोलता है। नोट में नामित दो आरोपी—सब-इंस्पेक्टर गोपाल बदाने और सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रशांत बांकर—न केवल व्यक्तिगत अपराधी हैं, बल्कि वे उस सड़ांध भरी व्यवस्था के प्रतीक हैं, जिसे महाराष्ट्र सरकार वर्षों से सुधारने का दावा करती आ रही है। यह घटना कोई संयोग नहीं, बल्कि सरकार की उदासीनता का खुला प्रमाण है! मूल घटना की बात करें तो, डॉक्टर ने अपने सुसाइड नोट में साफ-साफ लिखा कि पिछले पांच महीनों से सब-इंस्पेक्टर गोपाल बदाने द्वारा बार-बार यौन शोषण और सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रशांत बांकर (उनके मकान मालिक के बेटे) द्वारा मानसिक प्रताड़ना ने उन्हें तोड़ दिया। पुलिस ने आखिरकार कार्रवाई की—बांकर को पुणे से गिरफ्तार किया गया, बदाने को निलंबित कर दिया गया, और दोनों के खिलाफ दुष्कर्म व आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज हुआ। लेकिन सवाल वही पुराना: यह कार्रवाई क्यों मौत के बाद? सतारा की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक वैशाली कडुस्कर का बयान—”अगर शिकायत पर तुरंत कार्रवाई हुई होती, तो यह हादसा टाला जा सकता था”—तो सीधे सरकार को आईना दिखाता है। क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं कि खाकी यूनिफॉर्म पहने लोग ही अपराधी बनकर घूम रहे हैं, और सरकार उन्हें संरक्षण दे रही है? महाराष्ट्र सरकार पर यह प्रहार इसलिए जरूरी है क्योंकि यह घटना राज्य की महिलाओं की सुरक्षा नीतियों की पोल खोलती है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार “महिला सशक्तिकरण” का ढोल पीटती है, लेकिन हकीकत में POSH (Prevention of Sexual Harassment) कानून का पालन अस्पतालों और सरकारी कार्यालयों में कागजों तक सीमित है। फलटण जैसे छोटे उप-जिले में एक डॉक्टर—जो खुद दूसरों की जान बचाती थी—अपनी पीड़ा साझा करने के लिए कोई सुरक्षित मंच नहीं ढूंढ पाई। क्यों। क्योंकि सरकार ने पुलिस विभाग में आंतरिक शिकायत तंत्र को मजबूत नहीं किया। क्यों सब-इंस्पेक्टर जैसे अधिकारी बिना डर के अपराध कर सकते हैं? क्योंकि सरकार की “शून्य सहनशीलता” नीति सिर्फ चुनावी जुमला साबित हो रही है।और बात अगर व्यापक हो, तो महाराष्ट्र में महिलाओं पर अपराधों का आंकड़ा चीख-चीखकर सरकार को जगाने की कोशिश कर रहा है। सतारा जैसी घटना इस आंकड़े का जीता-जागता प्रमाण है। डॉक्टर समुदाय का आक्रोश सही है—वे POSH कानून को सख्ती से लागू करने की मांग कर रहे हैं, और चेतावनी दे रहे हैं कि न्याय न मिला तो आंदोलन तेज होगा। लेकिन सरकार क्या कर रही है। बस बयानबाजी! स्वास्थ्य मंत्री या गृह विभाग से कोई ठोस कदम।नामुमकिन! यह उदासीनता न केवल एक डॉक्टर की मौत का कारण बनी, बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र में महिलाओं के लिए असुरक्षा का संदेश दे रही है। क्या सरकार यह स्वीकार करेगी कि उनकी नीतियां महिलाओं को “सुरक्षित” बनाने के बजाय उन्हें “शिकार” बनाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। यह त्रासदी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की महिलाओं के लिए खतरे की घंटी है। सरकार को अब जागना होगा—नहीं तो यह “खाकी पर बलात्कार का कलंक” पूरे प्रशासन पर फैल जाएगा। मांग है। सरकार को चाहिए कि पुलिस सुधारों को तुरंत लागू करें, ताकि आरोपी अधिकारी बिना देरी के सलाखों के पीछे पहुंचें। कार्यस्थलों पर POSH कमिटी को सक्रिय बनाएं, और शिकायतों की गोपनीय जांच सुनिश्चित करें। महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हेल्पलाइन और काउंसलिंग को मजबूत करें, न कि कागजी कार्रवाई तक सीमित रखें। महाराष्ट्र सरकार, अगर आप वाकई “महिला सम्मान” की बात करती हैं, तो इस मामले में न्याय सुनिश्चित करें—नहीं तो इतिहास आपको एक ऐसी सरकार के रूप में याद रखेगा, जिसने एक डॉक्टर की चीख को अनसुना कर दिया। समय आ गया है कि सिस्टम को संवेदनशील बनाएं, वरना अगली त्रासदी आपकी जिम्मेदारी पर होगी!

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