भारत के युवा ‘प्रेम’ की आग में जल रहे हैं ! अन्य देशों की प्रगति से तुलना में सरकार की लापरवाही समाज को ‘अंधकार’ की ओर धकेल रही है !
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की उस दर्दनाक घटना ने जहां दो युवाओं की जान ले ली, वहीं पूरे देश को झकझोर दिया। प्रेम के नाम पर ट्रेन के आगे कूदना कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन सवाल वही पुराना—क्या सिर्फ परिवार की जिद जिम्मेदार। या सरकार की नीतियां, जो अश्लील कंटेंट और नशे के जाल को खुला छोड़ रही हैं, युवाओं को इतना कमजोर बना रही हैं कि वे मौत को ही अंतिम सहारा मान लें। जब हम अन्य प्रगतिशील देशों की तुलना करते हैं, तो भारत की तस्वीर और भी काली नजर आती है। सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने सख्त कानूनों और सक्रिय नीतियों से युवाओं को मानसिक अंधकार से बचाया है, जबकि भारत में ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा तो है, लेकिन व्यावहारिक कदमों की कमी समाज को अंधकारमय जीवन जीने पर मजबूर कर रही है। सरकार ही मुख्य जिम्मेदार है, जो प्रगति के नाम पर आंकड़ों का ढोंग कर रही है। देखिए सिंगापुर को—एक छोटा सा देश, लेकिन इंटरनेट सेंसरशिप में सख्ती का बेजोड़ उदाहरण। वहां मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MDA) के तहत पॉर्नोग्राफी और अश्लील वेबसाइटों पर कड़ी निगरानी है। सरकारी स्तर पर ब्लॉकिंग सिस्टम इतना मजबूत कि युवा आसानी से विकृत कंटेंट तक न पहुंच सकें। नतीजा? युवा सुसाइड रेट्स में कमी, और समाज में मानसिक स्वास्थ्य बेहतर। भारत में क्या। पॉर्न साइट्स पर बैन का ऐलान तो होता है, लेकिन एक्जीक्यूशन नाममात्र का। लाखों युवा स्मार्टफोन पर जहर पी रहे हैं, जहां प्रेम की बजाय शारीरिक विकृतियां ही कल्पनाओं का आधार बन गई हैं। इसी तरह, नशे के खिलाफ सिंगापुर की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी ने युवाओं को ड्रग्स के दलदल से दूर रखा है। जापान और दक्षिण कोरिया की बात करें, तो इन देशों ने युवा सुसाइड को राष्ट्रीय संकट मानकर नीतियां बनाईं। जापान में सुसाइड रेट्स में गिरावट आई है, क्योंकि वहां मेंटल हेल्थ प्रोग्राम्स स्कूलों से शुरू होकर वर्कप्लेस तक फैले हैं। दक्षिण कोरिया में ड्रग एब्यूज पर सख्त कानून और जागरूकता अभियान चलते हैं, जहां युवाओं को नशे के खतरों से बचाने के लिए कम्युनिटी लेवल पर काम होता है। इन देशों में सुसाइड रेट्स (जैसे जापान में युवाओं के लिए 1.37 प्रति लाख) भारत के बढ़ते आंकड़ों (देशभर में प्रेम-विवाद से जुड़ी आत्महत्याओं में उछाल) से कहीं बेहतर हैं। वहां सरकारें सक्रिय हैं—इंटरनेट फिल्टरिंग, ड्रग स्मगलिंग पर बॉर्डर कंट्रोल, और काउंसलिंग सेंटर्स हर जगह। लेकिन भारत। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में नशे का जाल फैला है, चरस-गांजा से लेकर सिंथेटिक ड्रग्स तक, और सरकार के पास सिर्फ आंकड़े हैं। युवा भावुकता में उन्माद की हद पार कर लेते हैं, क्योंकि कोई मजबूत सपोर्ट सिस्टम नहीं। अन्य देशों की तुलना में भारत की विफलता साफ झलकती है। जहां सिंगापुर और जापान ने साइबर लिटरेसी को ग्रामीण स्तर तक पहुंचाया, वहां भारत में करोड़ों का बजट डिजिटल इंडिया पर खर्च होता है, लेकिन कंटेंट रेगुलेशन पर सोई हुई नींद। अश्लीलता का जहर युवाओं के मन में विकृत प्रेम की परिभाषा भर रहा है—जैसे गोरखपुर के विश्वकर्मा कुमार और उनकी प्रेमिका का मामला, जहां वर्चुअल दुनिया का असर असल जीवन में टूट गया। नशे का तो कहना ही क्या; दक्षिण कोरिया में युवा ड्रग एब्यूज पर पब्लिक परसेप्शन मजबूत है, सख्त सजा और रोकथाम से समस्या काबू में। भारत में बॉर्डर स्मगलिंग रुकने का नाम नहीं लेती, और ग्रामीण इलाकों में युवा नशे के शिकार हो रहे हैं। ये सब सरकार की जिम्मेदारी है—जो समाज को अंधकारमय जीवन जीने पर मजबूर कर रही। प्रेम सुंदर हो सकता है, लेकिन जब वह नशे और अश्लीलता के जाल में फंस जाए, तो युवा पीढ़ी टूट रही है। सुसाइड रेट्स बढ़ रहे हैं, मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा, और देश का भविष्य खतरे में। जागने का समय है हमें अन्य देशों से सीखना होगा, वरना अंधकार गहराएगा चिताओं की लपटें सिर्फ परिवारों का दर्द नहीं, बल्कि सरकार की नींद टूटने की चेतावनी हैं। सिंगापुर जैसी सेंसरशिप, जापान जैसी मेंटल हेल्थ नीतियां अपनाओ। सख्त कानून बनाओ अश्लील वेबसाइट्स और नशे के खिलाफ, साइबर लिटरेसी को हर गांव तक पहुंचाओ। अगर नहीं जागी सरकार, तो प्रगतिशील देशों की तरह तरक्की का सपना चूर हो जाएगा। युवाओं को बचाओ, वरना समाज अंधकार में डूबेगा—और जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की होगी! क्या अब भी वक्त है सुधार का, या ऐसे दर्दनाक अंत ही देश की नियति बनेंगे!
- इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
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