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बिहार में तेजस्वी यादव: युवा नेतृत्व की अनिवार्यता या गठबंधन की विवशता?

-संजय राय

बिहार की राजनीति इन दिनों एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही सियासी गलियारों में हलचल बढ़ गई है। महीनों से जिस घोषणा का इंतज़ार था, आखिरकार वह हो ही गई — महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। साथ ही विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के अध्यक्ष मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया गया है। यह घोषणा कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने की, लेकिन यह स्वीकारोक्ति जितनी राजनीतिक थी, उतनी ही विवशता से भरी हुई भी प्रतीत होती है।

कांग्रेस का यह फैसला किसी उत्साह का नहीं, बल्कि मजबूरी का परिणाम लगता है। लंबे समय से यह चर्चा थी कि क्या कांग्रेस तेजस्वी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने को तैयार होगी। आखिरकार उसने हामी तो भरी, पर इस सहमति में वह आत्मविश्वास नहीं झलकता जो एक मजबूत सहयोगी से अपेक्षित होता है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि बिहार में कांग्रेस की संगठनात्मक और जनाधार की स्थिति कमजोर है।

दरअसल, तेजस्वी यादव के नेतृत्व को स्वीकार करने के पीछे कांग्रेस के पास कोई ठोस विकल्प नहीं था। आज बिहार में विपक्षी राजनीति का केंद्र राजद ही है। नीतीश कुमार के घटते जनाधार और भाजपा-जेडीयू गठबंधन की चुनौतियों के बीच तेजस्वी ही वह चेहरा हैं जो बदलाव का प्रतीक बन सकते हैं। तेजस्वी ने अपने राजनीतिक सफर में उल्लेखनीय परिपक्वता दिखाई है। उन्होंने बेरोज़गारी, पलायन और सम्मान जैसे मुद्दों को जनता की आकांक्षाओं से जोड़ा है। उनकी भाषा में युवाओं की बेचैनी और बेहतर अवसरों की तलाश झलकती है। यह बदलाव बताता है कि वे अब केवल लालू यादव के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बन चुके हैं।

महागठबंधन की इस घोषणा से एनडीए के भीतर भी हलचल तेज हुई है। अब तक एनडीए ने अपना मुख्यमंत्री चेहरा तय नहीं किया है। यह वही एनडीए है जिसने पिछले दो दशकों तक नीतीश कुमार पर भरोसा जताया, लेकिन अब उनके नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। बार-बार गठबंधन बदलना, अवसरवाद और सुशासन की फीकी होती छवि ने नीतीश कुमार की विश्वसनीयता को कमजोर किया है। ऐसे में एनडीए का बिना चेहरे के चुनाव मैदान में उतरना उसके आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है।

दूसरी ओर, महागठबंधन की ओर से तेजस्वी की घोषणा ने युवाओं के बीच नई ऊर्जा पैदा की है। लेकिन यह उत्साह उतना ही सीमित है जितनी गठबंधन की आंतरिक मजबूरियां। कांग्रेस और वामदलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर असहमति की फुसफुसाहट पहले ही शुरू हो चुकी है। महागठबंधन की एकता उतनी मजबूत नहीं दिखती जितनी प्रचार में दिखाई जा रही है। यह भी सवाल उठता है कि अगर महागठबंधन सत्ता में आता है, तो क्या तेजस्वी ही सर्वमान्य मुख्यमंत्री बन पाएंगे?

फिलहाल यह कहना कठिन है कि यह निर्णय महागठबंधन के लिए कितना लाभदायक साबित होगा। लेकिन यह तय है कि इस घोषणा ने बिहार की राजनीति को एक नया विमर्श दे दिया है — युवा नेतृत्व बनाम पारंपरिक सत्ता। तेजस्वी यादव का उदय केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की आवाज़ है जो जातीय राजनीति से आगे बढ़कर विकास, शिक्षा, और रोजगार की बात करना चाहती है।

फिर भी, तेजस्वी के सामने चुनौतियाँ कम नहीं हैं। जनता अब केवल वादों से नहीं, बल्कि काम और विश्वसनीयता से प्रभावित होती है। भ्रष्टाचार, परिवारवाद और अस्थिरता जैसे पुराने आरोप अब भी उनकी छवि पर साया बनकर मंडरा रहे हैं। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल ‘लालू के बेटे’ नहीं, बल्कि बिहार की नई उम्मीद हैं।

कांग्रेस की स्थिति इस चुनाव में कमजोर है। वीआईपी महज 15 सीटों पर लड़ रही है, जबकि कांग्रेस उससे कहीं अधिक सीटों पर, फिर भी उसकी भूमिका गौण है। इससे गठबंधन में असमानता साफ झलकती है। अशोक गहलोत द्वारा यह कहना कि “और भी उपमुख्यमंत्री बनाए जाएंगे” कांग्रेस की कमज़ोरी को छिपाने का एक राजनीतिक बयान मात्र लगता है।

बिहार की राजनीति का यह दौर केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि मानसिकता परिवर्तन का भी सूचक है। अगर तेजस्वी यादव इस बदलाव को जनविश्वास में बदल पाने में सफल हुए, तो यह बिहार की राजनीति में एक नई पीढ़ी के नेतृत्व का युग आरंभ होगा। परंतु यदि यह अवसर केवल चुनावी रणनीति बनकर रह गया, तो यह गठबंधन उसी पुराने चक्र में फंस जाएगा जहाँ समझौते, मतभेद और अवसरवाद सब कुछ निगल जाते हैं।

तेजस्वी यादव का नामांकन बिहार के लिए आशा और अनिश्चितता — दोनों का प्रतीक है। यह निर्णय केवल महागठबंधन की रणनीति नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम भी है। अब देखना यह है कि क्या यह युवा चेहरा सचमुच बदलाव ला पाएगा या फिर यह भी एक और “मजबूरी भरी स्वीकृति” बनकर रह जाएगा।

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