: ‘हाय मोदी’ के शोर में कहीं राख न हो जाए जनतंत्र के चिराग!

मुंबई (इंद्र यादव) देश आज एक अजीबोगरीब चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ वैश्विक सुर्खियों में ‘एपस्टीन’ जैसे कांडों का शोर है, जो सत्ता और रसूख के काले चेहरों को बेनकाब कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत की गलियों में गैस-पेट्रोल की बढ़ती कीमतें आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जनता जब अपनी बदहाली पर सवाल पूछती है, तो उसे जवाब में ‘पकौड़ा दर्शन’ और ‘नाली गैस’ जैसे अजीबो-गरीब तर्क थमा दिए जाते हैं।
महंगाई का तांडव और रसोई का गणित
गैस और पेट्रोल की कीमतें अब केवल आंकड़े नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग और गरीबों के घरों में मातम का कारण बन गई हैं। जिस देश में ईंधन के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार की दुहाई देकर बढ़ाए जाते हों, वहां आम आदमी यह समझने में नाकाम है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा उसकी जेब तक क्यों नहीं पहुँचता? रसोई गैस का सिलेंडर अब ‘शोपीस’ बनता जा रहा है और चूल्हा फिर से धुएँ की तरफ लौट रहा है।
रोजगार के नाम पर ‘पकौड़ा’ तंत्र
देश का युवा, जो हाथों में डिग्री लेकर सुनहरे भविष्य का सपना देखता है, उसे जब सत्ता के गलियारों से ‘पकौड़ा तलने’ की सलाह मिलती है, तो वह केवल एक आर्थिक मशविरा नहीं बल्कि उसकी मेहनत का अपमान होता है।
नाले पर ढाबा: ‘गटर से गैस’ निकालने जैसे वैज्ञानिक दावों ने बौद्धिक विमर्श को मजाक बना दिया है।
पकौड़ा डिप्लोमेसी: क्या करोड़ों युवाओं का भविष्य कड़ाही के
खौलते तेल में ही सिमटा रहेगा
जब नीतियां रोजगार पैदा करने में विफल होती हैं, तो ऐसे ही ‘जुमलों’ का सहारा लेकर विफलता को ढंकने की कोशिश की जाती है।
अंधभक्ति बनाम राष्ट्रभक्ति
आज समाज दो धड़ों में बंट गया है। एक तरफ वे हैं जो ‘अद्धा’ (सीमित ज्ञान और अंध समर्थन) लेकर घूम रहे हैं, जिन्हें महंगाई में भी मास्टरस्ट्रोक नजर आता है। दूसरी तरफ ‘हाय मोदी’ का विलाप है। इस शोर-शराबे में वह ‘राष्ट्रभक्ति’ कहीं खो गई है जो सत्ता से सवाल पूछती थी।
“लोकतंत्र तब मर जाता है जब सवाल पूछने वाली जुबानें खामोश हो जाती हैं और तालियां बजाने वाले हाथ सत्ता के रक्षक बन जाते हैं।”
प्राण खतरे में हैं: यह जुमला नहीं, हकीकत है
देश चिल्ला रहा है क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा और सुरक्षा के बुनियादी ढांचे चरमरा रहे हैं। जब सत्ता का पूरा ध्यान केवल छवि चमकाने और विरोधियों को कुचलने पर हो, तो जनता के ‘प्राण’ वाकई खतरे में पड़ जाते हैं। चिल्लाता हुआ देश दरअसल अपनी पहचान और वजूद बचाने की गुहार लगा रहा है।
जागने का वक्त
सार यह है कि सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन जो मुद्दे आज कड़ाही में तले जा रहे हैं, वे कल देश की नींव को खोखला कर देंगे। हमें ‘अंधभक्ति’ के चश्मे उतारकर यह देखना होगा कि क्या वाकई हम तरक्की कर रहे हैं या सिर्फ नारों के शोर में अपनी बर्बादी का जश्न मना रहे हैं।


