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अवैध' संबंध और उससे उत्पन्न अपमान के चलते पति नें जहर खाकर आत्महत्या की

‘पत्नी’ जानकी के कथित ‘अवैध’ संबंध और उससे उत्पन्न अपमान के चलते पति नें जहर खाकर आत्महत्या कर ली !

उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में घाट कोटरा गांव की यह घटना एक सामान्य पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि समाज की गहरी जड़ों में फैले विश्वासघात, लैंगिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दर्दनाक प्रमाण है। डालचंद अहिरवार नामक युवक ने अपनी पत्नी जानकी के कथित अवैध संबंध और उससे उत्पन्न अपमान के चलते जहर खाकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले बनाए वीडियो में उसने पत्नी को दोषी ठहराते हुए कहा, “जानकी, मेरे जैसा धोखा किसी को मत देना।” यह वाक्य न केवल व्यक्तिगत पीड़ा की चीख है, बल्कि समाज में बढ़ते वैवाहिक धोखे और उसके परिणामों पर एक करारा तमाचा है। इस घटना से हमें सामाजिक स्तर पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है – क्यों वैवाहिक संस्था टूट रही है? क्यों पुरुषों की मानसिक पीड़ा को अनदेखा किया जाता है? और क्यों परिवार, कानून तथा समाज मिलकर ऐसे हादसों को रोकने में असफल हो रहे! भारतीय समाज में विवाह को पवित्र बंधन माना जाता है, जहां विश्वास और निष्ठा आधारस्तंभ हैं। लेकिन आधुनिकता के नाम पर बढ़ते अवैध संबंध इस बंधन को खोखला कर रहे हैं। डालचंद की कहानी में पत्नी का मकान मालिक से अफेयर, पति को पिटवाना और मोबाइल छीनना – ये केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि वैवाहिक विश्वासघात की उस श्रृंखला के अंग हैं जो तलाक, हिंसा और आत्महत्या को जन्म दे रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल हजारों आत्महत्याएं पारिवारिक विवादों से जुड़ी होती हैं, जिनमें वैवाहिक धोखा प्रमुख कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां डालचंद जैसे मजदूर वर्ग के पुरुष प्रवास पर जाते हैं, पत्नियां अकेली रहती हैं – वहां अवसरवाद और सामाजिक दबाव मिलकर धोखे को बढ़ावा देते हैं। समाज को चिंतन करना चाहिए क्या हमारी शिक्षा और संस्कार प्रणाली युवाओं को निष्ठा सिखा रही है, या सोशल मीडिया और शहरीकरण के प्रभाव में नैतिकता खो रही है। मीडिया और समाज अक्सर महिलाओं की घरेलू हिंसा पर चर्चा करता है, लेकिन पुरुषों का अपमान, धोखा और मानसिक यातना कहां दर्ज होती है। डालचंद ने हरियाणा में नौकरी की, परिवार को साथ रखा, पत्नी के नाम जमीन खरीदी – फिर भी विरोध करने पर पिटवाया गया। उसका रोना, एक महीने पहले ममेरे भाई के पास आकर फूटना, बताता है कि वह टूट चुका था। भारतीय कानून में दहेज प्रताड़ना या घरेलू हिंसा के प्रावधान महिलाओं के लिए मजबूत हैं, लेकिन पुरुषों के लिए कोई विशिष्ट संरक्षण नहीं। क्या यह लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं। समाज को स्वीकार करना होगा कि पुरुष भी भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुष आत्महत्या की दर महिलाओं से दोगुनी है, क्योंकि वे अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते – “मर्द को दर्द नहीं होता” वाली मानसिकता उन्हें अंदर से खा जाती है। समझौते की कमी
घटना में ससुराल वालों का पत्नी का साथ देना और जमीन बेचने का दबाव दर्शाता है कि परिवार अब संयुक्त नहीं, स्वार्थी इकाई बन गए हैं। डालचंद के बच्चे – 8 साल का बेटा और 7 साल की बेटी – अब अनाथ हो गए। क्या यह केवल पति-पत्नी का विवाद था, या परिवार की विफलता। ग्रामीण भारत में पंचायतें और बुजुर्ग समझौते कराते थे, लेकिन आज कानूनी हथियार और सामाजिक अलगाव बढ़ रहा है। पत्नी का मायके चले जाना और पति का अकेले रहना – यह प्रवासी मजदूरों की जिंदगी की कड़वी सच्चाई है। समाज को चिंतन करना चाहिए क्या हम परिवारों में संवाद की संस्कृति खो रहे हैं। काउंसलिंग सेंटर, सामुदायिक मध्यस्थता और स्कूलों में वैवाहिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। पुलिस ने जांच शुरू की है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है। आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC 306) के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, सरकार को वैवाहिक धोखे को गंभीर अपराध मानना चाहिए, पुरुषों के लिए हेल्पलाइन शुरू करनी चाहिए और मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय एजेंडा बनाना चाहिए। NCRB डेटा बताता है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पारिवारिक विवाद से आत्महत्याएं सबसे अधिक हैं – यह चेतावनी है। डालचंद की मौत एक व्यक्ति की नहीं, समाज की हार है। यह हमें सिखाती है कि विश्वास टूटने पर जीवन नहीं टूटना चाहिए। आइए, हम वैवाहिक निष्ठा को मजबूत करें, लैंगिक पूर्वाग्रह त्यागें और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। तभी ऐसी घटनाएं रुकेंगी, वरना हर “जानकी” और “डालचंद” की कहानी समाज की किताब में काली स्याही बनकर रहेगी। यह चिंतन का समय है – सुधार का नहीं, तो कम से कम संवेदना का।

  • इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
    indrayadavrti@gmail.com ……🖊️…..🙏
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