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महिलाओं की आजादी, एक सशक्तिकरण की दिशा या सामाजिक भ्रम ?

आज के दौर में समाज में महिलाओं की भूमिका और उनकी आजादी को लेकर बहसें छिड़ी हुई हैं। हाल ही में एक लेख में महिलाओं की “अश्लीलता” को आजादी के नाम पर बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है, जहां लेखक ने महिलाओं को सलाह दी है कि वे समाज में वैसा ही व्यवहार करें जैसा घर के परिजनों के साथ। यह दृष्टिकोण पुरातनवादी लगता है, जो महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश करता है। लेकिन क्या वाकई आजादी का मतलब सिर्फ “नंगा नाच” है, या यह एक गहरी सामाजिक क्रांति का हिस्सा है ?

सबसे पहले, आजादी के नाम पर क्या हो रहा है? एक लेखक का कहना है कि महिलाओं की “अश्लीलता” देश को गलत दिशा दे रही है। लेकिन “अश्लीलता” की परिभाषा क्या है? क्या मॉडर्न कपड़े पहनना, क्लब जाना या सोशल मीडिया पर अपनी राय रखना अश्लील है? इतिहास गवाह है कि महिलाओं की आजादी की लड़ाई हमेशा से सामाजिक मानदंडों के खिलाफ रही है। 19वीं सदी में जब महिलाएं वोट का अधिकार मांग रही थीं, तब भी उन्हें “असभ्य” कहा जाता था। भारत में सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ राजा राममोहन रॉय और सावित्रीबाई फुले जैसी महिलाओं ने आवाज उठाई, तो समाज ने उन्हें “अश्लील” ठहराया। आज की महिलाएं उसी क्रम में आगे बढ़ रही हैं – शिक्षा, करियर, और व्यक्तिगत चुनावों में स्वतंत्रता पा रही हैं।

लेखक का तर्क है कि हर चीज का “पैमाना” होना चाहिए, वरना जीवन व्यर्थ हो जाता है। सहमत हूं, लेकिन यह पैमाना पुरुषों द्वारा थोपा गया क्यों हो ? महिलाओं को क्यों हमेशा “समाज के लिए क्या हो” की याद दिलाई जाती है ? पुरुषों को क्लब जाना, देर रात बाहर रहना सामान्य लगता है, लेकिन महिलाओं के लिए यह “अश्लीलता” क्यों ? एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं की भागीदारी कार्यबल में केवल 25% है, जबकि पुरुषों की 80% से ज्यादा। यह असमानता आजादी की कमी से आती है, न कि ज्यादा आजादी से। यदि महिलाएं अपनी पसंद के कपड़े पहनें या अपनी सेक्सुअलिटी को एक्सप्रेस करें, तो यह समाज को कमजोर नहीं बनाता, बल्कि उसे समावेशी बनाता है।

अब बात “सरकारी सुविधा” की। लेखक कहते हैं कि अश्लीलता फैलाने के लिए मॉल और क्लब हैं। लेकिन क्या ये जगहें सिर्फ “अश्लीलता” के लिए हैं ? नहीं, ये आधुनिक जीवन के हिस्से हैं, जहां लोग सोशल इंटरैक्शन करते हैं। भारत जैसे देश में, जहां महिलाओं पर घरेलू हिंसा के मामले सालाना लाखों में हैं (एनसीआरबी डेटा के अनुसार), आजादी का मतलब सुरक्षा और समानता है। महिलाएं जब समाज में “घर के परिजनों जैसा” व्यवहार करेंगी, तो क्या पुरुष भी वैसा ही करेंगे? क्या वे महिलाओं को बराबरी का दर्जा देंगे, या सिर्फ नियंत्रण करेंगे ?

मानव जीवन की लंबाई पर सोचने की सलाह अच्छी है, लेकिन इसे सिर्फ महिलाओं पर क्यों लागू करें ? जीवन छोटा है, इसलिए हर व्यक्ति को अपनी पसंद से जीने का हक है – बिना किसी के फैसले के। सेक्सुअल आकर्षण को “ढोल पीटना” कहना गलत है; यह प्राकृतिक है और दोनों लिंगों में मौजूद है। समाज को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं की आजादी जरूरी है, क्योंकि शिक्षित और स्वतंत्र महिलाएं परिवार, समाज और देश को मजबूत बनाती हैं। उदाहरण के तौर पर, स्कैंडिनेवियाई देशों में महिलाओं की उच्च आजादी के कारण लिंग समानता सूचकांक में वे शीर्ष पर हैं, और उनका समाज अधिक खुशहाल है।

अंत में, महिलाओं की आजादी “नंगा नाच” नहीं, बल्कि सशक्तिकरण है। समाज को बदलने के लिए पुरानी सोच को छोड़ना होगा। महिलाएं घर में भी सम्मान पाएं और बाहर भी, तभी सच्ची प्रगति होगी। लेखक की बातों में सच्चाई हो सकती है अगर अति हो, लेकिन अति हर जगह बुरी है – चाहे आजादी में हो या नियंत्रण में। सोचिए, एक समान समाज कैसा होगा जहां महिलाएं बिना डर के जी सकें ? यही सच्ची आजादी है।

– इंद्र यादव ,स्वतंत्र लेखक, indrayadavrti@gmail.com

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