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भदोही जहाँ जाम 'राजा' है और अधिकारी 'रानी' सो रही हैं!लेकिन असली 'क्लाइमेक्स' तो तब आता है जब एंबुलेंस फंस जाती है!

भदोही,(उत्तरप्रदेश)। आजकल कालीन नगरी भदोही शहर का लिप्पन तिराहा किसी जंगल की भूलभुलैया से कम नहीं। यहाँ वाहनों की लंबी-लंबी कतारें ऐसी लगती हैं मानो कोई ‘ट्रैफिक महाकाव्य’ लिखा जा रहा हो – बस, इसमें हीरो की जगह हॉर्न बजाने वाले ड्राइवर हैं और विलेन हैं वो अतिक्रमणकारी दुकानदार जो सड़क को अपनी ‘प्राइवेट पार्किंग’ समझ बैठे हैं। लेकिन असली ‘क्लाइमेक्स’ तो तब आता है जब एंबुलेंस फंस जाती है – जी हाँ, वो एंबुलेंस जो किसी की जान बचाने दौड़ रही होती है, लेकिन यहाँ तो वो भी ‘ट्रैफिक सिग्नल’ की तरह रुक जाती है। कल्पना कीजिए: मरीज तड़प रहा है, सायरन चीख रही है, लेकिन अधिकारी महोदयों के कानों में जूँ तक नहीं रेंग रही!पिछले हफ्ते ही, 1 नवंबर को, लिप्पन तिराहे और गजिया ओवरब्रिज पर ऐसा ही तमाशा हुआ। आम आदमी के साथ-साथ बड़े-बड़े अधिकारी भी घंटों फंसे रहे – हाँ, वही अधिकारी जो ‘यातायात सुधार’ के नाम पर मीटिंग्स में चाय पीते हैं। एंबुलेंस फंसी, स्कूली बच्चे रोते-बिलखते, लेकिन ट्रैफिक पुलिस के जवान तो जैसे ‘जादूगर’ बन गए – कड़ी मशक्कत के बाद जाम खुला, लेकिन अगले दिन फिर वही पुरानी कहानी। क्या यह ओवरब्रिज बनवाने का मतलब था! कि जाम को ‘उन्नत’ स्तर पर ले जाया जाए? फरवरी में तो कई अखबारों ने भी चिल्ला-चिल्लाकर कहा था कि ‘ओवरब्रिज ही समस्या बन गया है’, लेकिन सरकार के कानों पर तो जैसे ‘साइलेंसर’ लगा है – कुछ सुनाई ही नहीं देता!?अब जरा सोचिए, हमारे माननीय अधिकारियों का क्या हाल होगा। वो तो एसी कारों में घूमते हैं, जहाँ जाम का मतलब है ‘जल्दी अमीर’ होना! लिप्पन तिराहे पर जाम लगे तो वो सोचते होंगे, “अरे, ये तो जनता का ‘एक्सरसाइज’ है – रोजाना वॉकिंग ट्रेनिंग!” या फिर, “ओवरब्रिज बन गया, अब तो सब सेट। बाकी तो ड्राइवरों की गलती है।” हाँ भाई, गलती तो हमारी ही है जो हम टैक्स देते हैं, लेकिन सड़कें बनाने की बजाय ‘सेल्फी पॉइंट्स’ बनवा देते हैं। जुलाई में तो तीन घंटे स्कूली वाहन फंसे थे – बच्चे तो डर से काँप रहे होंगे, लेकिन शिक्षा विभाग के बाबूजी शायद ‘ऑनलाइन क्लास’ की योजना बना रहे होंगे। और सरकार। अरे वाह! ‘उत्तर प्रदेश विकास का इंजन’ – लेकिन यह इंजन तो लिप्पन तिराहे पर ही पटरी से उतर गया। चुनावी वादों में ‘स्मार्ट सिटी’ का जाप तो करते हैं, लेकिन यहाँ तो ‘स्मार्ट जाम’ चल रहा है – हर दिन नया रिकॉर्ड तोड़ता। क्या कोई मंत्री साहब कभी पैदल चलकर देख लें। या फिर, ट्रैफिक पुलिस को ‘सुपरपावर’ दे दें – जैसे, जाम को ‘हाइप्नोटाइज’ करने की। नहीं तो जनता की कराहें तो जारी रहेंगी, और अधिकारी महोदयों के ‘कान साफ’ करने का इंतजार ही करते रहेंगे। कहते हैं न, ‘जब तक जूँ न रेंगे, तब तक कान न खुजलाएँगे।’ लेकिन भदोही की जनता के लिए तो ये जूँ ही नहीं, पूरा ‘ट्रैफिक सर्कस’ रेंग रहा है! कब सुधरेंगे ये ‘विकास के पहिए’। या फिर, अगले चुनाव तक इंतजार करें – तब शायद ‘जाम-मुक्त भदोही’ का वादा फिर सुनाई दे। तब तक, हॉर्न बजाते रहिए, भाइयों-बहनों। क्योंकि यही तो हमारा ‘राष्ट्रीय गान’ बन गया है!

  • इंद्र यादव ,ईशान टाइम्स
    indrayadavrti@gmail.com ……🖊️…..🙏
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