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बिहार विधानसभा चुनाव : मैदान में उतरे दिग्गज, मुकाबला होगा जी-जान से

संजय राय

बिहार की सियासत एक बार फिर तपने लगी है। विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, हर दल अपनी पूरी ताक़त झोंकने को तैयार दिख रहा है। इस बार का चुनाव सिर्फ़ सत्ता का नहीं, बल्कि साख और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है — जहाँ एनडीए अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में है, वहीं महागठबंधन सत्ता में वापसी के लिए हर चाल चल रहा है।

राज्य में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होता दिख रहा है। एक ओर एनडीए का मजबूत गठजोड़ है, जिसमें भाजपा और जदयू के साथ सहयोगी दल शामिल हैं। दूसरी ओर आरजेडी और कांग्रेस का महागठबंधन है, जिसे एकजुट करने के लिए राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पटना बुलाया गया। गहलोत की मध्यस्थता के बाद तेजस्वी यादव के नाम पर मुख्यमंत्री पद का चेहरा तय किया गया, लेकिन कांग्रेस के अंदर इस फैसले को लेकर मनमुटाव अब भी कायम बताया जा रहा है।

कांग्रेस और आरजेडी की यह खींचतान महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। राहुल गांधी की बिहार में अनुपस्थिति और लगातार विदेश दौरों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराया है। अब पार्टी प्रियंका गांधी को प्रचार की ज़िम्मेदारी सौंपने की तैयारी में है, ताकि संगठन में नई ऊर्जा भरी जा सके। गहलोत पटना पहुँचकर गुटबाज़ी के धागे सुलझाने की कोशिश कर चुके हैं, मगर ज़मीनी स्तर पर तालमेल अभी भी अधूरा लगता है।

वहीं एनडीए के खेमे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियाँ चुनावी अभियान की रीढ़ मानी जा रही हैं। 2020 के चुनाव में मोदी ने बिहार में 26 रैलियाँ की थीं, जिनमें से 61 प्रतिशत सीटों पर एनडीए ने जीत दर्ज की थी। इस बार भी प्रधानमंत्री की रैलियों को निर्णायक माना जा रहा है। समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और चंपारण में मोदी की सभाओं से एनडीए कार्यकर्ता उत्साह में हैं। मोदी ने कहा — “लालटेन के दौर की अब ज़रूरत नहीं है, अब बिहार मोबाइल की रोशनी में आगे बढ़ रहा है।”

नीतीश कुमार को एनडीए का चेहरा घोषित करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने भी गठबंधन की एकजुटता का संदेश दिया। नीतीश सरकार के विकास कार्यों — सड़क, बिजली, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और डिजिटल कनेक्टिविटी — को एनडीए अपने सबसे बड़े चुनावी हथियार के रूप में पेश कर रहा है।

महागठबंधन की ओर से कांग्रेस और आरजेडी ने साझा अभियान शुरू किया है, लेकिन कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट जैसी स्थिति बनी हुई है। अशोक गहलोत के हस्तक्षेप के बाद कुछ मतभेद ज़रूर सुलझे हैं, फिर भी कई जगह स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों के बीच तनातनी बनी हुई है।

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी का वोट कटवा प्रभाव कई सीटों पर महागठबंधन को नुकसान पहुँचा सकता है।

2020 के आंकड़ों की बात करें तो मोदी ने जिन क्षेत्रों में रैलियाँ कीं — उनमें से 110 सीटों पर मतदान हुआ था, और एनडीए ने 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार भी भाजपा की रणनीति साफ़ है — हर जिले में प्रधानमंत्री की मौजूदगी और विकास की कहानी के ज़रिए जनता तक सीधा संदेश पहुँचाना।

मोदी ने अपने समस्तीपुर के भाषण में कहा कि “जिनके नेता जमानत पर हैं, वे राज्य को कैसे दिशा देंगे?” इस दौरान उन्होंने मोबाइल की रोशनी जलाकर “लालटेन युग” के अंत का प्रतीकात्मक आह्वान भी किया।

बिहार में पहले चरण के मतदान से पहले 35 से अधिक बागी उम्मीदवार समीकरण बिगाड़ने के लिए मैदान में हैं। दानापुर से लेकर दरभंगा तक, हर सीट पर जातीय गणित और स्थानीय नाराज़गी चुनावी हवा को बदल सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर भी बिहार को संदेश भेजा है कि “नीतीश सरकार विकास की रफ़्तार को नई दिशा दे रही है, और एनडीए बिहार को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।” उधर, नीतीश कुमार ने लालू परिवार पर निशाना साधते हुए कहा कि “जब सत्ता हाथ से फिसली तो कुर्सी बचाने के लिए परिवारवाद का सहारा लिया गया।”

कुल मिलाकर, बिहार का यह चुनाव एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर है। सत्ता और विपक्ष दोनों ही के लिए यह ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति है। मतदाता अब तय करेंगे कि बिहार विकास की रोशनी में आगे बढ़ेगा या फिर सियासी लालटेन की छाया में लौटेगा।

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