संजय राय, भारत में लंबे समय से चर्चा में रहे श्रम सुधार अब 21 नवंबर से वास्तविक रूप ले चुके हैं। केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई चार नयी श्रम संहिताएँ—मजदूरी संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संहिता—देश के श्रमिक वर्ग तथा औद्योगिक क्षेत्र दोनों के लिए कामकाजी ढाँचे का एक बिल्कुल नया खाका तैयार करती हैं। स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा व्यापक संशोधन हुआ है, जो श्रमिक सुरक्षा, उद्यम की सरलता और रोजगार सृजन—इन तीनों को एक साथ जोड़ता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन सुधारों को “आज़ादी के बाद सबसे बड़े श्रमिक-केन्द्रित बदलाव” बताते हुए कहा है कि ये संहिताएँ आने वाले दशकों की कार्य-संस्कृति को नए मानक देंगी। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और अंतरराष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा संघ भी इन कानूनों को भारत की एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता चुके हैं।
क्यों ज़रूरी थे बड़े श्रम सुधार?
भारत में अधिकांश श्रम कानून आज़ादी से पहले या उसके तुरंत बाद बने थे। उस समय न उद्योगों की प्रकृति आज जैसी थी, न तकनीक, न नौकरी का ढाँचा। वैश्वीकरण और डिजिटल कामकाज के बाद दुनिया ने श्रम नीतियों में बड़ा बदलाव देखा, पर भारत पुराने ढाँचों के भार तले दबा रहा।
29 अलग-अलग केंद्रीय कानून, सैकड़ों जटिल नियम और उद्योगों के लिए अनुपालन का कठिन ढाँचा—ये स्थितियाँ रोजगार विस्तार में बड़ी बाधा बनती रहीं। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार इन कानूनों की उलझनों को दूर करने की सलाह दे चुका था।
नई संहिताएँ इन सभी बिखरे नियमों को चार सरल, आधुनिक और एकीकृत ढाँचों में बदल देती हैं।
नई श्रम संहिताओं से क्या बदलेगा?
- श्रमिकों के अधिकार और सुरक्षा मजबूत
सभी श्रमिकों को अब नियुक्ति-पत्र अनिवार्य।
न्यूनतम मजदूरी तय समय पर देने की बाध्यता।
40 वर्ष से ज्यादा आयु वाले कर्मचारियों के लिए मुफ़्त वार्षिक स्वास्थ्य जांच।
गिग व प्लेटफ़ॉर्म कामगार (जैसे स्विगी, ओला, अमेज़न डिलीवरी) पहली बार राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा के दायरे में।
ठेका/अस्थायी श्रमिकों को स्थायी कर्मचारियों के बराबर लाभ
ग्रेच्युटी का लाभ केवल 1 वर्ष काम करने के बाद भी संभव।
महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति, सुरक्षा प्रबंधों के साथ।
- उद्योग और निवेश के लिए सरलता
नई संहिताएँ उद्योगों को जटिल कागज़ी कार्रवाई से मुक्त करती हैं।
एकल पंजीकरण, एकल रिटर्न और कई पुराने फार्मों के स्थान पर सरल डिजिटल प्रक्रिया।
विवाद समाधान तंत्र अधिक तेज़ और पारदर्शी।
बड़े उद्योगों के लिए क्षमता विस्तार अब पहले से ज्यादा आसान।
आर्थिक प्रभाव: कितने रोजगार और कितनी रफ्तार?
उल्लेखनीय है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की हालिया रिपोर्ट का अनुमान है कि इन कानूनों के लागू होने के बाद मध्यम अवधि में लगभग 77 लाख नयी नौकरियाँ भारत में पैदा हो सकती हैं।
आज देश का औपचारिक कार्यबल लगभग 60 प्रतिशत के आसपास अनुमानित है। नई संहिताएँ इसे 75 प्रतिशत से ऊपर ले जा सकती हैं।
भारत में 44 करोड़ से अधिक लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें से लगभग 31 करोड़ ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं। यदि इनका सिर्फ एक-पाँचवां हिस्सा भी औपचारिक क्षेत्र में आ जाता है, तो लगभग 10 करोड़ श्रमिक नियमित लाभ, बीमा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ सकेंगे।
इससे—
खपत बढ़ेगी
घरेलू बचत मजबूत होगी
उत्पादन में स्थिरता आएगी
जो विकास दर को गति दे सकता है।
दुनिया से सबक और भारत का नया मार्ग
सिंगापुर, डेनमार्क, वियतनाम, न्यूज़ीलैंड जैसे देशों ने श्रम कानूनों को सरल बनाकर
तेज़ औद्योगीकरण
वैश्विक निवेश
रोजगार वृद्धि हासिल की है।
भारत अब उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यह बदलाव केवल तत्काल लाभ नहीं देगा, बल्कि भारत को वैश्विक उत्पादन केंद्र (मैन्युफैक्चरिंग हब) बनाने की नींव भी रखेगा।

सुधारों की राह में चुनौतियाँ भी नई संहिताओं को सफल बनाने के लिए— केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल डिजिटल अनुपालन की बेहतर प्रणाली
असंगठित क्षेत्र में व्यापक जागरूकता
श्रमिक संगठनों और उद्योगों के बीच सहयोग आवश्यक होगा।
कार्यान्वयन जितना मजबूत होगा, लाभ उतने व्यापक होंगे।
आगे का रास्ता: क्या होगा प्रभाव?
नई श्रम संहिताएँ कई नई संभावनाओं की नींव रखती हैं—
अधिक उत्पादक और सुरक्षित श्रमबल
तेज़ और लचीला उद्योग ढाँचा
सामाजिक सुरक्षा का विस्तार
रोजगार के अधिक अवसर
वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत
जैसे इनकम टैक्स और जीएसटी सुधारों ने अर्थव्यवस्था में नई गतिशीलता पैदा की थी, वैसे ही ये श्रम सुधार आने वाले वर्षों में भारत को 2027 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को भी बल देंगे।


