बिहार चुनाव 2025: जनता के फैसले पर टिकी विकास की नई परिभाषा

बिहार एक बार फिर चुनावी रंग में रंग चुका है। सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक हर ओर राजनीति की गूंज है। 6 नवम्बर को पहले चरण का मतदान है, और इस बार का मुद्दा जातीय समीकरणों से अधिक, विकास, रोजगार और जनकल्याण के इर्द-गिर्द घूमता दिख रहा है।
पिछले एक दशक में बिहार ने बुनियादी ढांचे, शिक्षा और बिजली जैसी सेवाओं में सुधार ज़रूर देखा है, लेकिन बेरोज़गारी, पलायन और किसानों की समस्याएँ अब भी गहराई में मौजूद हैं। ऐसे में मतदाता अब सिर्फ़ नारों से नहीं, बल्कि नतीजों से जवाब चाहते हैं।
🔹 सत्ता पक्ष की रणनीति : “विकास के निरंतरता” का नारा
सत्तारूढ़ दल भाजपा ने इस चुनाव को “विकास की निरंतरता बनाम अवरोध” की लड़ाई का रूप दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शीर्ष नेतृत्व लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि केंद्र और राज्य में एक जैसी विचारधारा की सरकार होने से योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आई है।
एनडीए के घोषणा-पत्र में कई बड़े वादे शामिल हैं —
प्रत्येक परिवार को 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली,
महिलाओं के लिए ‘लखपति योजना’ के तहत ₹2 लाख तक सहायता,
हर ज़िले में औद्योगिक विनिर्माण इकाई,
एक करोड़ युवाओं को रोजगार,
और 50 लाख पक्के मकान का निर्माण।
इन वादों के ज़रिए भाजपा ने कोशिश की है कि जनता को यह भरोसा दिलाया जाए कि केंद्र की योजनाओं और राज्य की ज़रूरतों का संयोजन ही बिहार की असली ताकत है।
🔹 विपक्ष की चुनौती : “विकास अधूरा है”
दूसरी ओर राजद और कांग्रेस गठबंधन ने इस चुनाव में सरकार को घेरने के लिए महंगाई, रोजगार और भ्रष्टाचार के मुद्दों को मुख्य हथियार बनाया है।
तेजस्वी यादव बेरोज़गारी को चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनाकर युवा वर्ग को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि बिहार में “जंगलराज” नहीं, बल्कि “रोज़गार राज” चाहिए।
कांग्रेस, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति के हाशिए पर रही है, इस बार खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों बिहार में सक्रिय हैं, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर पार्टी अभी भी कमजोर दिख रही है।
🔹 जनता की नज़र में चुनाव
मतदाता अब जागरूक हैं। वे जानते हैं कि योजनाएँ कितनी धरातल पर उतरीं और कितनी सिर्फ़ घोषणा-पत्र में रह गईं।
बिहार की जनता अब नए अवसरों, बेहतर शिक्षा और स्थायी रोजगार चाहती है।
युवाओं के बीच यह भावना स्पष्ट है कि राज्य को अब राजनीति नहीं, नीति चाहिए।
महिलाओं में आत्मनिर्भरता और सुरक्षा को लेकर अपेक्षाएँ भी बढ़ी हैं। ग्रामीण इलाकों में जनकल्याणकारी योजनाओं का असर तो है, पर असमानता अब भी एक बड़ी चुनौती है।
🔹 तकनीकी और पारदर्शिता पर फोकस
चुनाव आयोग ने इस बार पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए सख्त कदम उठाए हैं।
मतदान केंद्रों पर सुरक्षा बढ़ाई गई है और सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ की निगरानी के लिए विशेष सेल बनाए गए हैं।
फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप अब राजनीतिक युद्धभूमि बन चुके हैं, जहाँ हर दल अपनी रणनीति के साथ मतदाताओं तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है।
उम्मीदों का बिहार
बिहार चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विकास की दिशा तय करने वाला फैसला है।
यह चुनाव बताएगा कि क्या बिहार जातीय राजनीति की पुरानी सीमाओं से आगे निकलकर विकास की नई परिभाषा लिखने को तैयार है या नहीं।
सवाल अब यह नहीं कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि कौन बिहार को आगे ले जाएगा — योजनाओं के वादों से परे, नीतियों की सच्चाई तक।



