
- संजय राय
महाराष्ट्र एक बार फिर किसानों के ग़ुस्से का केंद्र बन गया है। चुनावी मंचों पर किए गए वादे अब किसानों के लिए धुएं में उड़ते दिख रहे हैं। सत्ता में आए दस महीने बीत चुके हैं, लेकिन कर्जमाफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और फसल बीमा योजनाओं से जुड़ी घोषणाएँ अब तक ज़मीन पर नहीं उतर पाई हैं।
सरकार कहती है — “राज्य आर्थिक संकट में है।”
लेकिन किसानों का कहना है — “हमारा संकट उससे भी बड़ा है।”
कर्जमाफी का अधूरा वादा
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल ही में साफ कहा कि फिलहाल पूर्ण कर्जमाफी संभव नहीं।
यह बयान उन लाखों किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा था जो मानसून और बाजार दोनों से हार चुके हैं।
राज्य की वित्तीय हालत पर सरकार चिंता जता रही है — लेकिन किसानों का तर्क है कि अगर उद्योगों के लिए राहत पैकेज दिए जा सकते हैं, तो खेतों के लिए क्यों नहीं?
फसल बीमा बना कंपनियों का लाभ खेल
फसल बीमा योजना को किसानों ने अब “कंपनी बीमा योजना” कहना शुरू कर दिया है।
किसान कह रहे हैं कि दावों के नाम पर उन्हें केवल आश्वासन मिलता है, जबकि बीमा कंपनियाँ अरबों का मुनाफ़ा कमा रही हैं।
सरकार ने 1 रुपए की प्रतीकात्मक प्रीमियम सहायता तक बंद कर दी है, जिससे लगभग 5000 करोड़ रुपए की बचत बताई जा रही है — लेकिन इस “बचत” की कीमत किसानों की निराशा बन गई है।
नागपुर में किसानों का ‘यलगार’
इन्हीं हालातों ने महाराष्ट्र के नागपुर में किसानों को सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दिया।
करीब डेढ़ लाख किसानों ने नागपुर में चक्का जाम कर सरकार के खिलाफ ‘यलगार’ का ऐलान किया।
पूर्व मंत्री बच्चू कडू और उनकी प्रहार जनशक्ति पार्टी इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही है।
सड़कों पर बैठे किसानों का संदेश साफ है — “वादे पूरे करो या खेत छोड़ो।”
बॉम्बे हाईकोर्ट को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा और आदेश दिया कि सड़कों से भीड़ हटाई जाए, लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक सरकार ठोस जवाब नहीं देती, ‘यलगार’ रुकेगा नहीं।
राजनीति और जनभावना का संगम
कई राजनीतिक विश्लेषक इस आंदोलन को केवल किसान असंतोष नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक स्वरूप के रूप में देख रहे हैं।
देवेंद्र फडणवीस, नितिन गडकरी और संघ मुख्यालय — तीनों नागपुर से जुड़े हैं।
ऐसे में यह आंदोलन केवल खेतों की बात नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र तक एक सीधा संदेश है।
फडणवीस सरकार के लिए यह चेतावनी है कि किसानों के मुद्दों को अब “वायदा” नहीं, “वास्तविकता” बनाना ही होगा।
कर्ज का जाल और बढ़ती आत्महत्याएँ
महाराष्ट्र सरकार पर वर्तमान में लगभग 8.4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है, और राज्य का हर नागरिक औसतन 72,000 रुपए का कर्जदार है।
लेकिन विडंबना यह है कि सबसे ज्यादा कर्ज उसी किसान पर है जो देश का अन्नदाता है।
जनवरी से मार्च 2025 के बीच ही 767 किसानों ने आत्महत्या की है, जिनमें से 257 पश्चिमी विदर्भ के हैं — वही इलाका जो दशकों से किसान आत्महत्याओं का प्रतीक बन चुका है।
अब समाधान कौन देगा?
केंद्र सरकार एमएसपी तय करती है, इसलिए पहल वहीं से होनी चाहिए।
यदि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य और समय पर सहायता नहीं मिली, तो महाराष्ट्र का यह आंदोलन “दिल्ली किसान आंदोलन” की तरह देशव्यापी रूप ले सकता है।
किसान अब केवल राहत नहीं, सम्मानजनक नीति परिवर्तन की मांग कर रहे हैं।
महाराष्ट्र का यह “यलगार” केवल कर्जमाफी का संघर्ष नहीं है।
यह उस व्यवस्था के खिलाफ चेतावनी है जो हर चुनाव में किसानों को “अन्नदाता” कहती है, और हर सत्ता परिवर्तन के बाद उन्हें भूल जाती है।
सवाल यह नहीं कि सरकार कितनी गरीब है, सवाल यह है कि किसान को गरीब बनाए रखने की राजनीति कब तक चलेगी?



