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बुझ गई घोसी चीनी मिल की चिमनी, किसानों के चूल्हे ठंडे होने की कगार पर!

मऊ (इंद्र यादव ,विशेष संवाददाता) घोसी।उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की घोसी चीनी मिल की पहचान कभी यहाँ की खुशहाली से होती थी, इस मिल को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्व.कल्पनाथ राय ने किसानों की खुशहाली और क्षेत्र के विकाश के लिए लगवाया था ।लेकिन आज वहां का मंजर किसी मातम से कम नहीं है। मिल के बाहर खड़ी सैकड़ों गन्ना लदी ट्रालियां केवल फसल नहीं, बल्कि किसानों की उम्मीदें ढो रही हैं, जिन्हें अब ‘मिल बंदी’ के फरमान ने मिट्टी में मिला दिया है। अब केवल किसानों के गन्ना की तोल और पर्ची देने तक सीमित रह गई है। नेता लोग राजनीति कर रहे ।स्थानीय नेताओं के दबाव में तौल शुरू हो पाई नहीं तो मिल की ओर से फरमान जारी था कि आप अपने खर्च पर दूसरी चीनी मिल आजमगढ़ जिले की सठियाव ले जाएं भारी विरोध हुआ सरकार बैक फुट पर चली गईं ।लखनऊ दिल्ली तक लोग दौड़े ।जिससे इस बार तो गन्ना उतरा और सरकार खुद ले जाएगी जहां मर्जी वहां लेकिन अगली बार क्या होगा ये सवाल खड़ा है ?

खेतों में मेहनत, मिल पर आंसू !

कड़ाके की धूप और हाड़ कंपा देने वाली ठंड में गन्ने की फसल तैयार करने वाला किसान आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। मिल के गेट पर कतार में खड़े किसानों की आंखों में गुस्सा भी है और बेबसी भी।
एक बुजुर्ग किसान की रुआंसी आवाज इस दर्द को साफ बयां करती है:

“हमने अपना खून-पसीना एक कर के गन्ना उगाया कि बच्चों की स्कूल फीस भरेंगे, बेटी की शादी करेंगे। लेकिन यहाँ तो मिल ही बंद कर दी गई। अब इस गन्ने को हम कहाँ ले जाएं? क्या इसे जला दें”

सत्ता की बेरुखी और व्यवस्था का शोषण !

यह आरोप आम है कि अधिकारियों और नीति निर्माताओं की मिलीभगत और गलत नीतियों ने इस चलती हुई मिल को दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह केवल घाटे का सौदा नहीं, बल्कि उन रसूखदारों की साजिश है जिन्हें गरीब किसान के संघर्ष से कोई सरोकार नहीं है।
सैकड़ों ट्रालियां लावारिस: मिल परिसर में गन्ने से लदी गाड़ियां खड़ी-खड़ी सूख रही हैं।
बर्बादी की आहट: मिल बंद होने का मतलब है हजारों मजदूरों की बेरोजगारी और किसानों का आर्थिक पतन।
जनता का आक्रोश: लोगों में इस कदर नाराजगी है कि वे इसे ‘व्यवस्था द्वारा किया गया कत्ल’ करार दे रहे हैं।

परिणाम : श्राप या चेतावनी!
जब पेट की आग और मेहनत की बर्बादी एक साथ मिलती है, तो वह ‘श्राप’ बनकर निकलती है। आज घोसी का हर वो किसान जिसके घर में मिल बंदी के कारण अंधेरा छा गया है, वह उन चेहरों को कोस रहा है जिन्होंने अपनी फाइलों में एक दस्तखत के साथ हजारों जिंदगियों को दांव पर लगा दिया।

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