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निठारी हत्याकांड' ,सुप्रीम कोर्ट का फैसला और 'भारत' में किसी भी निर्दोष को जेल में सड़ाने की 'साजिश' !

नोएडा के निठारी गांव में 2005-2006 के दौरान हुईं बच्चियों की सामूहिक हत्याओं ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। दर्जनों मासूमों के अवशेष घर के बाहर गड्ढों से बरामद हुए, और मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन 10 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कोली को बरी करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि सबूतों की चेन टूटी हुई है, गवाहों के बयान अविश्वसनीय हैं, और जांच में भारी खामियां हैं। यह फैसला न केवल न्याय व्यवस्था की जीत है, बल्कि पुलिस, फॉरेंसिक और सरकारी तंत्र की घोर नाकामी को उजागर करता है। क्या हमारी जांच एजेंसियां इतनी अक्षम हैं कि 19 साल बाद भी सच्चाई दबकर रह जाती है?
जांच की शुरुआती लापरवाही: सबूतों का गायब होना
मामला सामने आने पर नोएडा पुलिस ने तुरंत घर की तलाशी ली, लेकिन फॉरेंसिक टीम को बुलाने में देरी की। अवशेषों को खुले में छोड़ दिया गया, जिससे बारिश और जानवरों ने उन्हें नष्ट कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि डीएनए सैंपल्स की चेन ऑफ कस्टडी टूटी हुई थी,कई सैंपल गायब हो गए या दूषित हो चुके थे। सीबीआई ने बाद में जांच संभाली, लेकिन उनकी रिपोर्ट में भी विरोधाभास थे। क्या यह महज लापरवाही थी या जानबूझकर सबूत मिटाने की साजिश! अगर पुलिस शुरुआत से ही प्रोफेशनल होती, तो कोली को दोषी ठहराने के लिए ठोस आधार मिलते। लेकिन सरकार ने जांच एजेंसियों को आधुनिक उपकरण और ट्रेनिंग क्यों नहीं दी ! कोर्ट ने कई गवाहों के बयान अविश्वसनीय करार दिए। कुछ गवाहों ने बाद में कबूल किया कि पुलिस दबाव में झूठ बोला गया। यह उत्तर प्रदेश पुलिस की पुरानी आदत है,मामलों को जल्दी सुलझाने के चक्कर में निर्दोषों को फंसाना या असली अपराधियों को बचाना। निठारी में घर के मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर को भी आरोपी बनाया गया, लेकिन बाद में बरी कर दिया। क्या जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव में काम करती हैं? 2006 में यूपी सरकार बदल रही थी, और यह केस सनसनी बन चुका था। मीडिया ट्रायल ने पुलिस को जल्दबाजी में फैसला लेने पर मजबूर किया, लेकिन सच्चाई की कीमत पीड़ित परिवारों ने चुकाई।/सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट्स पर सवाल उठाए। कई शवों की पहचान नहीं हो सकी, और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स अधर में लटक गईं। भारत में फॉरेंसिक लैब्स की हालत दयनीय है ! केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में सिर्फ 7 राष्ट्रीय स्तर की लैब्स हैं, जबकि हजारों मामले लंबित हैं। निठारी जैसे हाई-प्रोफाइल केस में भी डीएनए टेस्टिंग में महीनों लग गए। क्या यह संसाधनों की कमी है या प्राथमिकता की? अगर सरकार जांच एजेंसियों को बजट बढ़ाती, ट्रेनिंग देती, तो निर्दोष जेल में सड़ते नहीं ! यह फैसला केंद्र और राज्य सरकारों के लिए झटका है। निठारी के बाद कई कमीशन बने, लेकिन सुधार कहां हुए! पुलिस रिफॉर्म्स पर सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह जजमेंट को 19 साल हो गए, फिर भी लागू नहीं। सीबीआई को स्वायत्तता देने की बातें होती हैं, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप जारी है। पीड़ितों के परिवार आज भी इंसाफ की आस में हैं!/क्या सरकार उन्हें मुआवजा और पुनर्वास देगी! या फिर अगला स्कैंडल आने तक सब भूल जाएंगे!
निठारी हत्याकांड न्याय की जीत है, लेकिन जांच तंत्र की हार। सुप्रीम कोर्ट ने साबित कर दिया कि सबूतों के बिना सजा नहीं दी जा सकती। अब वक्त है कि सरकार पुलिस, सीबीआई और फॉरेंसिक सिस्टम को मजबूत करे। वरना ऐसे मामले दोहराते रहेंगे, और मासूमों की चीखें अनसुनी रह जाएंगी। क्या हम सीखेंगे, या फिर इंतजार करेंगे अगले निठारी का !

  • इंद्र यादव / ईशान टाइम्स
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