कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है… कि ये पैसे कहाँ गये!
दिल्ली में वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से निपटने के लिए मंगलवार को भाजपा सरकार नें कृत्रिम बारिश कराने का प्रयास किया , लेकिन यह कोशिश सफल नहीं हो सकी बल्कि फुसकी सुरसुरी साबित हुई। सेसना विमान ने पहले आईआईटी कानपुर की हवाई पट्टी से उड़ान भरी, फिर मेरठ की हवाई पट्टी से, और दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में ‘क्लाउड सीडिंग’ की तकनीक अपनाई गई। विमानों ने खेकड़ा, बुराड़ी, उत्तरी करोल बाग, मयूर विहार, सादकपुर, भोजपुर सहित अन्य इलाकों में हाइग्रोस्कोपिक नमक वाले फ्लेयर छोड़े। दिल्ली की जहरीली हवा में सांस लेते-लेते हम सब ‘गदर’ मचाने को तैयार हैं, लेकिन भाजपा सरकार ने तो ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ स्टाइल में क्लाउड सीडिंग करवा दी! 28 अक्टूबर को कानपुर से उड़कर आया प्लेन, दिल्ली के आसमान में फ्लेयर छोड़ते हुए बोला, “ये रिश्ता क्या कहलाता है। बारिश का!” लेकिन नतीजा। कुछ इलाकों में हल्की बूंदाबांदी, जैसे ‘शोले’ में बसंती का डांस – जोरदार लगने वाला, लेकिन पानी तो फिस्स! भाजपा सरकार, जो हर समस्या का हल ‘अच्छे दिन’ लाने का दावा करती है, ने प्रदूषण से लड़ने के नाम पर 3.21 करोड़ रुपये मंजूर किए थे पांच ट्रायल के लिए। यानी हर बारिश के ‘अटेंप्ट’ पर 64 लाख! एक वर्ग किलोमीटर के लिए एक लाख रुपये – दिल्ली के पूरे आसमान पर अगर हिसाब लगाओ तो ‘लगान’ फिल्म का टैक्स भी फीका पड़ जाए। और असर? नोएडा बॉर्डर पर दो बूंदें गिरीं, जैसे ‘मिस्टर इंडिया’ में अदृश्य हीरो की कोशिश – दिखा तो नहीं, लेकिन खर्चा हो गया! सोचिए, सिल्वर आयोडाइड छिड़ककर बादलों को ‘कहो ना प्यार है’ बोलना सिखाया, लेकिन वो तो ‘बादल’ फिल्म के हीरो की तरह भारी होकर नहीं गिरे। सरकार कहती है, “ये तो ट्रायल था!” अरे भाई, ट्रायल में भी ‘दबंग’ स्टाइल अपनाओ – सलमान खान की तरह जोर से मारो, न कि ‘प्यार का पंचनामा’ की तरह बस बातें! 70 लाख के आसपास खर्च हो गया इस ‘कुछ बूंदों’ के लिए, जबकि दिल्लीवासी 17 दिनों से स्मॉग की चादर में लिपटे ‘कहानी’ जी रहे हैं – बिना हीरोइन के!/भाजपा वाले तो ‘राजनीति’ खेलते हैं, लेकिन ये क्या ‘मकड़ी’ बुन ली? प्रदूषण कम करने का दावा, लेकिन AQI अभी भी ‘तेजस’ की स्पीड से ऊपर! जनता पूछ रही है, “ये कैसी जंग है भाई?” सरकार जवाब देती है, “अगली बार ज्यादा बारिश होगी!” वाह, जैसे ‘बजरंगी भाईजान’ में पाकिस्तान पहुँचने का वादा – रास्ता लंबा, खर्चा ज्यादा, मंजिल धुंधली। अंत में, दिल्लीवालों, हवा साफ करने के लिए मास्क लगाओ, और सरकार से कहो “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!” लेकिन अगली बार ये करोड़ों का ‘सपना’ मत देखना, वरना हम सब ‘अंदाज अपना अपना’ में फँस जाएंगे!

- इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
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